राजीव मित्तल
बॅब, देश के लिये एक बड़ी बुरी खबर है। सुषमा स्वराज ने कहा है कि अगर सोनिया प्रधानमंμाी बनी तो वह अपने पति के साथ राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर सिर्फ रोटी बेलेंगी। सोनिया के प्रधानमंμाी बनने से उसे क्या परेशानी हो रही है चैनली? बॅाब, स्वराज दम्पति, मुख्तार अब्बास नकवी और प्रमोद महाजन तीनों हिन्दुत्व के मारे कुछ उसी तरह शर्मसार हैं जैसे 18वीं शताब्दी में पुणे का ब्राहमण समाज हुआ था। क्यों, तब भी सोनिया का ही कोई मामला था क्या? नहीं, पर उस जैसा ही। तब बाजीराव पेशवा एक मलेच्छ के साथ घर बसाना चाहते थे, जो पुरोधाओं को मंजूर न था। अपने समाज की क्रूरता से बाजीराव इस कदर आहत हुए कि बीमार पड़ गये और बीमारी में ही दम तोड़ दिया। मैं तुम्हें यह इसलिये बता रही हूं कि उस समय बाजीराव मराठाओं के लिये ही नहीं पूरे भारतवर्ष के लिये कि बेहद जरूरी थे। उनके मरते ही अंग्रेजों ने चारों तरफ हाथ-पांव मारने शुरू कर दिये थे। यही हरकत नाना फड़नवीस ने की थी, जिन्होंने मलेच्छ हैदरअली के बजाये अंग्रेजों को सगा समझा। रुक चैनली, जिसका हम आज भी गुणगान करते हैं वो कनिष्क भारतीय मूल का तो नहीं था न? नहीं, उसका सम्बंध कुषाण वंश से था, जो चीन की ही कोई उपजाति थी। और मदर टेरेसा? वो युगोस्लाव थीं। और एनी बेसेंट, जिनका तिलक बेहद सम्मान करते थे और जो कांग्रेस की अध्यक्ष भी रही थीं? वो आयरिश थीं। और सिस्टर निवेदिता, जिन्हें सन्यासी अरबिन्दो ने अपने सबसे करीब पाया और बाद में उन्हें पांडेचेरी आश्रम का कर्ताधर्ता बना दिया? वो फ्रांसीसी थीं। तो इन बेवकूफों को सोनिया में इतालवी रक्त ही क्यों ठाठे मारता नजर आ रहा है? क्योंकि अब इन सबको गांधी जी याद आ रहे हैं और यह भी याद आ रहा है कि उन्होंने विदेशियों को बाहर निकालने के लिये आंदोलन चलाया था। अरे तो उनकी आत्मकथा पढ़ कर जी बहलायें, चर्खा कातें, किसी कोढ़ी के शरीर पे तेल की मालिश करें। ये कीमती वस्μा उतार कर बोरे से तन ढापें। खैर वो सब छोड़ो, राज्यसभा कैसे चलेगी बगैर सुषमा के? अरे जितनी जल्दी छोड़े उतना अच्छा है, तुम्हारे चैनलों को बड़ी पसंद है उसकी मुस्कान और तोते की सी बोली। लेकिन बॉब, सोनिया का सत्ता में आना राष्ट्रीय स्वाभिमान, और अलमारी में सजा वो 10 हजार साल पुराना देश का गौरव इत्यादि की मिट्टी कर देगा। चैनली, विदेशमंμाी की हैसियत से जब जसवंत सिंह अपनी गोद में बैठा कर चाकलेट खिलाते हुएखूँखार आतंकवादियों को उनके माई-बाप को सौंपने जा रहे थे तब क्या देश का गौरव छतरी ताने साथ-साथ चल रहा था? जब नेशनल डीफेंस एकेडमी से एक दिन पहले प्रशिक्षण पाकर निकले नौजवान अफसर कारगिल युद्ध में झोंक दिये गये तो उनके लोथड़े क्या स्वाभिमान का समां बांध रहे थे? कुछ नहीं चैनली, यह जमावड़ा जनता को एक बार फिर बेवकूफ बनाने से चूक गया इसलिये जिसके जो मन में आये बक रहा है। इनके पोषित एग्जिट पोल धरे के धरे रह गये। मतदाता इनके ठस्सपन से आजिज आ चुका था। इनके फीलगुडों, इनके शाइनिंग भारत, इनकी उदय याμााओं को मतदाता ने अपना उपहास समझा। फिर दद्दू ने तो और भी चालबाजी दिखायी। मुलायम सिंह को अपना दसियों साल पहले किसी मेले में खोया भतीजा मान लिया। स्क्रिप्ट ढंग से नहीं लिखी गयी वरना एक बार फिर चल जाती। और फिर धूल में सने नमी खाये बोफर्स के कागजों को दियासलाई दिखा फूंक मार-मार कर धुआं उटाने की कोशिश करने लगे। हां बॉब, अब बैठे-बैठे बुदबुदा रहे हैं कि कम्बख्तों से कुछ दिन मुंह सीके नहीं बैठा जाता।
बुधवार, 8 दिसंबर 2010
क्या-क्या हुआ हंगामा-ए-जुनूं ये नहीं मालूम
राजीव मित्तल
मटके फोड़े, सुराहियां तोड़ीं, कुएं में छलांग लगा दी, बाल मुंडवा लिये, भौंहें तक साफ करा लीं-ये सब एक विदेशन के प्रधानमंμाी बनने की ओर बढ़ते कदमों की वजह से या हार न पचा पाने का वायुदोष! ये हरकतें तो बलबन और उसके साथियों ने भी नहीं की थीं जब रजिया सुल्तान गद्दी पर बैठ रही थी। हालांकि उस औरत की हुकूमत बहुत दिन नहीं झेल पाये मर्द लोग। लेकिन इन बेवकूफों ने यह कैसे सोच लिया कि उनके सिर मंुडाने से सोनिया ने प्रधानमंμाी बनने से मना कर दिया। इस देश में 40 साल गुजार कर और इस देश की राजनीति का एक-एक पन्ना बूझ कर ही उन्होंने यह फैसला राजीव गांधी के मरने के बाद ही ले लिया था। अगर कांग्रेस अपने दम पर बहुमत में आती तो भी वह यही करतीं। इस फैसले का कारण है भारतीय चरिμा में रोम-रोम तक धंसा वो ब्राहमणत्व, जिसने बौद्ध धर्म में पलीता लगाया, जिसे मौर्यों का शासन इसलिये बर्दाश्त नहीं था क्योंकि वे नीची जीति के थे, जिसने शैव्यों और वैष्णवों में श्रेष्ठता को लेकर सदियों खून-खराबा मचवाया, जिसके चलते देश और समाज इस कदर कमजोर हो गये कि महमूद गजनवी से लेकर मोहम्मद गौरी तक सबने इस देश को रौंदा और बाद में तुर्क तो शासक ही बन बैठे। यही चारिμिाक विशेषता आज भी जेबों में ठुसी है। अब तुम ही बताओ चैनली, अगर सोेनिया के पास ब्रिटेन या अमेरिका में बसे मित्तलों, बंसलों, पटेलों और सिखों जितनी सम्पदा होती तो अब तक बीसियों घोटाले इस इतालवी औरत के मत्थे न मढ़ दिये गये होते? लक्ष्मी चंद मित्तल अगर ब्रिटेन में सबसे महंगा घर रखने और सबसे अमीर आदमी होने का दम भरता है तो इसलिये क्योंकि वह ब्रिटेन है। इस बात का अंग्रेजों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। इटली के एक कस्बानुमा शहर से निकल किसी तरह लंदन में पढ़ी सोनिया भारत में स्वराज पाल बनने की सोच भी सकती है? उसके मुंह पर अब तक कालिख नहीं पोती गयी यह उसका सौभाग्य है। जरा कैफ और सौरभ के दिल से पूछो कि विश्वकप में उनके घरों का क्या हाल किया गया था। तुम्हें नहीं लगता कि ब्लेयर और बुश को भी सिर मंुडवा लेना चाहिये क्योंकि उनके यहां भारतीय मूल के कई लोग वहां की सत्ता की कुछ सीढ़ियों पर पद्मासन लगा कर बैठ गये हैं। हिन्दू धर्म अपने को बहुत सहज, सरल, सहनशील, दयालू और पता नहीं क्या-क्या मानता आ रहा है इसलिये कि हमें पास्ट में रहने में ही सुख मिलता है। हम यह भूल जाते हैं फूलों सा खिला-खिला हिन्दू धर्मदो-ढाई हजार साल पहले तक ही था । उसके बाद तो वर्तमान से हमें बेदिली रही और भविष्य कहीं कंदराओं में घुसा रहा। हमें हमारा इतिहास भी कुछ भलेमानुष अंग्रेजोें से पता चला, नहीं तो हम अशोक की लाट को आगे के भी सैंकड़ों साल तक भीम की गदा मानते रहते। हमारे पुरुषत्व की यह मजबूरी है कि हम सीता की जन्मस्थली को शौचालय बनायें रखें और राम की जन्मस्थली को लेकर बावेला खड़ा करते रहें। हम गुलाम हैं इसका बोध व्यापक तौर पर डेढ़ सौ साल पहले हुआ। हालांकि देश के किसी दूरदराज के गांव में जाकर कहोगी कि हमें आजाद हुए 55 साल हो गये हैं तो सवाल होगा कि अब किसका राज है। तो ऐसे आत्ममुग्ध देश में एक विदेशन का प्रधानमंμाी न बनने का फैसला बहुत अचरज की बात नहीं है।बॉब, मैं तुमसे आज सच कहूं कि मुझे अपने देश के मीडिया पर शर्म महसूस हो रही है। पिछले ढाई महीने में खबरों के नाम पर सिर्फ अफवाहें फैलाने का काम किया है इसने। एक चैनल की कारस्तानी बताऊं-माधव राव सिंधिया के साथ हादसे में मरे एक फμाकार के यहां कैमरों की टोली पहुंच गयी। वहां एक चैलू उसके दुखियारे पिता के मुंह में माइक घुसेड़ कर पूछ रहा था-आपको कैसा लग रहा है सर! जैसे वह दुखियारा बाप इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल में कोई फिल्म देख कर निकला हो।
मटके फोड़े, सुराहियां तोड़ीं, कुएं में छलांग लगा दी, बाल मुंडवा लिये, भौंहें तक साफ करा लीं-ये सब एक विदेशन के प्रधानमंμाी बनने की ओर बढ़ते कदमों की वजह से या हार न पचा पाने का वायुदोष! ये हरकतें तो बलबन और उसके साथियों ने भी नहीं की थीं जब रजिया सुल्तान गद्दी पर बैठ रही थी। हालांकि उस औरत की हुकूमत बहुत दिन नहीं झेल पाये मर्द लोग। लेकिन इन बेवकूफों ने यह कैसे सोच लिया कि उनके सिर मंुडाने से सोनिया ने प्रधानमंμाी बनने से मना कर दिया। इस देश में 40 साल गुजार कर और इस देश की राजनीति का एक-एक पन्ना बूझ कर ही उन्होंने यह फैसला राजीव गांधी के मरने के बाद ही ले लिया था। अगर कांग्रेस अपने दम पर बहुमत में आती तो भी वह यही करतीं। इस फैसले का कारण है भारतीय चरिμा में रोम-रोम तक धंसा वो ब्राहमणत्व, जिसने बौद्ध धर्म में पलीता लगाया, जिसे मौर्यों का शासन इसलिये बर्दाश्त नहीं था क्योंकि वे नीची जीति के थे, जिसने शैव्यों और वैष्णवों में श्रेष्ठता को लेकर सदियों खून-खराबा मचवाया, जिसके चलते देश और समाज इस कदर कमजोर हो गये कि महमूद गजनवी से लेकर मोहम्मद गौरी तक सबने इस देश को रौंदा और बाद में तुर्क तो शासक ही बन बैठे। यही चारिμिाक विशेषता आज भी जेबों में ठुसी है। अब तुम ही बताओ चैनली, अगर सोेनिया के पास ब्रिटेन या अमेरिका में बसे मित्तलों, बंसलों, पटेलों और सिखों जितनी सम्पदा होती तो अब तक बीसियों घोटाले इस इतालवी औरत के मत्थे न मढ़ दिये गये होते? लक्ष्मी चंद मित्तल अगर ब्रिटेन में सबसे महंगा घर रखने और सबसे अमीर आदमी होने का दम भरता है तो इसलिये क्योंकि वह ब्रिटेन है। इस बात का अंग्रेजों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। इटली के एक कस्बानुमा शहर से निकल किसी तरह लंदन में पढ़ी सोनिया भारत में स्वराज पाल बनने की सोच भी सकती है? उसके मुंह पर अब तक कालिख नहीं पोती गयी यह उसका सौभाग्य है। जरा कैफ और सौरभ के दिल से पूछो कि विश्वकप में उनके घरों का क्या हाल किया गया था। तुम्हें नहीं लगता कि ब्लेयर और बुश को भी सिर मंुडवा लेना चाहिये क्योंकि उनके यहां भारतीय मूल के कई लोग वहां की सत्ता की कुछ सीढ़ियों पर पद्मासन लगा कर बैठ गये हैं। हिन्दू धर्म अपने को बहुत सहज, सरल, सहनशील, दयालू और पता नहीं क्या-क्या मानता आ रहा है इसलिये कि हमें पास्ट में रहने में ही सुख मिलता है। हम यह भूल जाते हैं फूलों सा खिला-खिला हिन्दू धर्मदो-ढाई हजार साल पहले तक ही था । उसके बाद तो वर्तमान से हमें बेदिली रही और भविष्य कहीं कंदराओं में घुसा रहा। हमें हमारा इतिहास भी कुछ भलेमानुष अंग्रेजोें से पता चला, नहीं तो हम अशोक की लाट को आगे के भी सैंकड़ों साल तक भीम की गदा मानते रहते। हमारे पुरुषत्व की यह मजबूरी है कि हम सीता की जन्मस्थली को शौचालय बनायें रखें और राम की जन्मस्थली को लेकर बावेला खड़ा करते रहें। हम गुलाम हैं इसका बोध व्यापक तौर पर डेढ़ सौ साल पहले हुआ। हालांकि देश के किसी दूरदराज के गांव में जाकर कहोगी कि हमें आजाद हुए 55 साल हो गये हैं तो सवाल होगा कि अब किसका राज है। तो ऐसे आत्ममुग्ध देश में एक विदेशन का प्रधानमंμाी न बनने का फैसला बहुत अचरज की बात नहीं है।बॉब, मैं तुमसे आज सच कहूं कि मुझे अपने देश के मीडिया पर शर्म महसूस हो रही है। पिछले ढाई महीने में खबरों के नाम पर सिर्फ अफवाहें फैलाने का काम किया है इसने। एक चैनल की कारस्तानी बताऊं-माधव राव सिंधिया के साथ हादसे में मरे एक फμाकार के यहां कैमरों की टोली पहुंच गयी। वहां एक चैलू उसके दुखियारे पिता के मुंह में माइक घुसेड़ कर पूछ रहा था-आपको कैसा लग रहा है सर! जैसे वह दुखियारा बाप इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल में कोई फिल्म देख कर निकला हो।
जब छोड़ना था तो गले ही क्यों लगाया
राजीव मित्तल
चैनली अपने सारे काम करते हुए भी बर्बरीक को याद करती रहती है। उसके साथ भारतीय राजनीति पर ढाई महीने तक हुई चखचख का एक-एक शब्द उसके आगे-पीछे घूमता रहता है। आज उसके आसपास अगर बर्बरीक होता तो वह फिर एक सवाल जरूर उछालती कि बॅाब, विधानसभा हो या लोकसभा कुछ नेता दो-दो सीटों पर क्यों चुनाव लड़ते हैं। क्या दूसरी सीट पुरुष समाज की छिछोरी कहावत साली आधी घरवाली का सा मजा देती है! या यह कि अगर एक से हार गये तो दूसरी इज्जत बचा लेगी! इस बार राजग को केंद्र से उखाड़ फेंकने में सबसे आगे रहे बिहार और उत्तरप्रदेश के दोनों बालमुकुंदों ने ऐसा चुनाव लड़ा कि दोनों राज्यों की एक-एक सांसदी सीट विधवाओं की मानिंद स्यापा कर रही है। बिहार के गबरू लालू प्रसाद मधेपुरा से पिछला हिसाब चुकाने को खड़े हुए तो छपरा से इसलिये कि कहीं शरद यादव फिर पटकनी न दे दें। खैर, इस बार के उनके लाजवाब चुनावी प्रबंधन ने राजग की ऐसी की तैसी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और वह मधेपुरा के साथ-साथ छपरा से भी जीत गये। अब सवाल यह उठता है कि क्या वह दोनों जगह का प्रतिधिनित्व करते संसद में। नहीं न, सो उन्होंने मधेपुरा की सीट से अपना झंडा समेट लिया। कोई उनसे पूछने वाला है कि ऐसा कर उन्होंने वहां के मतदाताओं से ऐसा मजाक क्यों किया। जवाब में हालांकि यही सुनने को मिलेगा कि दो क्या चार-चार सीटों पर चुनाव लड़ने का हक है हमें। पर, लालू जी इतना तो सोचिये कि मधेपुरा सीट पर फिर चुनाव होगा, जिसका खर्च 25-30 करोड़ से क्य कम बैठेगा, यह किसकी जेब से जायेगा। और जब तक चुनाव नहीं होगा मधेपुरा की जनता उस औरत की तरह दरवाजे पर आंख लगाये रहेगी, जिसका पति रात में किसी और के यहां मुंह मारने चला गया है। यह पहली बार नहीं हो रहा है, 1952 में हुए पहले चुनाव से यह खेल चल रहा है पर, इसका कहीं न कहीं कभी तो अंत होना चाहिये। बेसिरपैर की ऐसी पुरानी रवायतों से किसका भला होना है। कम से कम बेचारी जनता का तो नहीं ही। कोई मधेपुरा के लोगों के दिल से पूछे तो यही सुनायी देगा कि हमारे दरवज्जे पर क्या करने आये थे लालू जी! अब हम न घर के रहे न घाट के। यही काम उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने दूसरे तरीके से किया। लगता है कि भाई जी को किसी ज्योतिषी ने समझा दिया होगा कि कब तक एक सूबे पर ही हाथ फेरते रहोगे, दिल्ली जाओ, प्रधानमंμाी की कुर्सी आपके लिये बिलख रही है। आव देखा न ताव लड़ लिये मैनपुरी से और जीत भी गये। पर उनकी इस जीत से मैनपुरी की जनता को क्या मिला-फिर एक चुनाव न! आपने तो बलराम सिंह यादव को पटकनी दे कर मन की मुराद पूरी कर ली पर, जब देखा कि दिल्लीकी गलियों में भटकने से तो सूबेदारी ही भली, तो इस्तीफा देकर फिर विधायकी के दुपट्टे से खेलने लगे। महानुभावों, आप दोनों ने क्या-क्या वायदे नहीं किये होंगे मधेपुरा और मैनपुरी की जनता से। कैसे जोशीले भाषण दिये होंगे कि आपके साथ-साथ वहां की जनता की भी रग-रग फड़क गयी होगी। आपने तो एक छोड़ दूसरी को पकड़ पूरा मजा ले लिया और अब उन नेकबख्तों के मत्थे अपने किसी जिगर के टुकड़े या करीबी चिरकुट को मढ़ देंगे पर वोट तो आपने मांगे थे अपने लिये, न जाने कौन-कौन से सब्जबाग दिखा कर। लेकिन आपके सामने रोने से क्या फायदा, रोया उनके सामने जाये जो बोरी में धरे बास मार रहे ऐसे नियम कायदों को सड़े आलू की तरह निकाल फेंकें।
चैनली अपने सारे काम करते हुए भी बर्बरीक को याद करती रहती है। उसके साथ भारतीय राजनीति पर ढाई महीने तक हुई चखचख का एक-एक शब्द उसके आगे-पीछे घूमता रहता है। आज उसके आसपास अगर बर्बरीक होता तो वह फिर एक सवाल जरूर उछालती कि बॅाब, विधानसभा हो या लोकसभा कुछ नेता दो-दो सीटों पर क्यों चुनाव लड़ते हैं। क्या दूसरी सीट पुरुष समाज की छिछोरी कहावत साली आधी घरवाली का सा मजा देती है! या यह कि अगर एक से हार गये तो दूसरी इज्जत बचा लेगी! इस बार राजग को केंद्र से उखाड़ फेंकने में सबसे आगे रहे बिहार और उत्तरप्रदेश के दोनों बालमुकुंदों ने ऐसा चुनाव लड़ा कि दोनों राज्यों की एक-एक सांसदी सीट विधवाओं की मानिंद स्यापा कर रही है। बिहार के गबरू लालू प्रसाद मधेपुरा से पिछला हिसाब चुकाने को खड़े हुए तो छपरा से इसलिये कि कहीं शरद यादव फिर पटकनी न दे दें। खैर, इस बार के उनके लाजवाब चुनावी प्रबंधन ने राजग की ऐसी की तैसी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और वह मधेपुरा के साथ-साथ छपरा से भी जीत गये। अब सवाल यह उठता है कि क्या वह दोनों जगह का प्रतिधिनित्व करते संसद में। नहीं न, सो उन्होंने मधेपुरा की सीट से अपना झंडा समेट लिया। कोई उनसे पूछने वाला है कि ऐसा कर उन्होंने वहां के मतदाताओं से ऐसा मजाक क्यों किया। जवाब में हालांकि यही सुनने को मिलेगा कि दो क्या चार-चार सीटों पर चुनाव लड़ने का हक है हमें। पर, लालू जी इतना तो सोचिये कि मधेपुरा सीट पर फिर चुनाव होगा, जिसका खर्च 25-30 करोड़ से क्य कम बैठेगा, यह किसकी जेब से जायेगा। और जब तक चुनाव नहीं होगा मधेपुरा की जनता उस औरत की तरह दरवाजे पर आंख लगाये रहेगी, जिसका पति रात में किसी और के यहां मुंह मारने चला गया है। यह पहली बार नहीं हो रहा है, 1952 में हुए पहले चुनाव से यह खेल चल रहा है पर, इसका कहीं न कहीं कभी तो अंत होना चाहिये। बेसिरपैर की ऐसी पुरानी रवायतों से किसका भला होना है। कम से कम बेचारी जनता का तो नहीं ही। कोई मधेपुरा के लोगों के दिल से पूछे तो यही सुनायी देगा कि हमारे दरवज्जे पर क्या करने आये थे लालू जी! अब हम न घर के रहे न घाट के। यही काम उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने दूसरे तरीके से किया। लगता है कि भाई जी को किसी ज्योतिषी ने समझा दिया होगा कि कब तक एक सूबे पर ही हाथ फेरते रहोगे, दिल्ली जाओ, प्रधानमंμाी की कुर्सी आपके लिये बिलख रही है। आव देखा न ताव लड़ लिये मैनपुरी से और जीत भी गये। पर उनकी इस जीत से मैनपुरी की जनता को क्या मिला-फिर एक चुनाव न! आपने तो बलराम सिंह यादव को पटकनी दे कर मन की मुराद पूरी कर ली पर, जब देखा कि दिल्लीकी गलियों में भटकने से तो सूबेदारी ही भली, तो इस्तीफा देकर फिर विधायकी के दुपट्टे से खेलने लगे। महानुभावों, आप दोनों ने क्या-क्या वायदे नहीं किये होंगे मधेपुरा और मैनपुरी की जनता से। कैसे जोशीले भाषण दिये होंगे कि आपके साथ-साथ वहां की जनता की भी रग-रग फड़क गयी होगी। आपने तो एक छोड़ दूसरी को पकड़ पूरा मजा ले लिया और अब उन नेकबख्तों के मत्थे अपने किसी जिगर के टुकड़े या करीबी चिरकुट को मढ़ देंगे पर वोट तो आपने मांगे थे अपने लिये, न जाने कौन-कौन से सब्जबाग दिखा कर। लेकिन आपके सामने रोने से क्या फायदा, रोया उनके सामने जाये जो बोरी में धरे बास मार रहे ऐसे नियम कायदों को सड़े आलू की तरह निकाल फेंकें।
ऐलान मत कीजिये, जनता के कान पक गये हैं
राजीव मित्तल
नयी निवेली सरकार ने अंगड़ाई लेनी शुरू कर दी है। बयानों और ऐलानों का चौतरफा जोर है। वित्तमंμाी चिदम्बरम हों या विदेशमंμाी नटवरसिंह, सब अपने रंग में आते जा रहे हैं। शुरुआत में ही नटवर जी का हाल अटल जी जैसा हो चला है यानी बोलना कुछ चाहते हैं मुंह से निकलता कुछ और है। सोनिया और राहुल रायबरेली में मुलायम सरकार पर ऐसी टिप्पणी कर आये कि दोनों तरफ से तलवारें खिंच गयीं, और अटल जी ने भी यह कड़वी गोली निगल ही ली कि गुजरात के दंगे फीलुगड पर भारी पड़े । हालांकि उनके इस बयान पर तोगड़िया ने आंखें तरेर कर पूर्व प्रधानमंμाी के मनाली प्रवास में खटास डाल दी है। सांसद शहाबुद्दीन भी पीछे क्यों रहते, उन्होंने अपनी तुलना सिकंदर महान से कर दी। पर इन सब भारियों पर भारी पड़े रेलवे मंμाी लालू प्रसाद यादव, जिनका एक-एक ऐलान उनके कुछ कर गुजरने का आभास दे रहा है। सबसे शानदार काम तो उन्होंने रेलवे में प्लास्टिक कपों पर रोक लगा कर किया। प्लास्टिक कचरा एक दु ज्स्वप्न बन चला है और जिससे बचने को लेकर पिछले पांच साल से सरकारी आभियान छिड़ा हुआ था, पर अन्य सरकारी अभियानों की तरह इसका भी टायर पंक्चर कर गया था। लेकिन अब कुल्हड़ों में चाय पिलवा कर लालू ने पंक्चर हुए अभियान की गाड़ी फिर आगे बढ़ा दी है। अब वह एसी दर्जे के रेलयाμिायों के लिये उस खादी को ओढ़ना-बिछौना बनाने पर तुले हैं, जो किसी फैशन शो का मोहताज हो चली थी। जिससे बनी टोपी तक नेताओं के सिर से उतर गयी थी। एक और नायाब योजना बेरोजगार युवकों को हिल्ले से लगाने को रेलवे स्टेशनों पर एएच व्हीलर के नाम का बरसों से चला आ रहा बुकस्टालों का साम्राज्य खत्म करना है। और इससे भी नायाब वह योजना है, जिसने 12-13 साल पहले विदेशियों तक के कान खड़े कर दिये थे यानी देश भर में चरवाहा स्कूल शुरू करने की बात। हालांकि इसका ऐलान इस योजना के प्रणेता लालू प्रसाद ने खुद नहीं किया। पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि यह कहने वाली उनकी करीबी मानव संसाधन राज्यमंμाी कांति सिंह हैं और जिसे जुबान फिसलना तो नहीं ही कहा जा सकता। ऐसे क्रांतिकारी कदम उठाने के लिये केवल साधुवाद ही निकलता मुंह से अगर दुनिया के पहले पहल खुले चरवाहा स्कूल की हालत न देख ली होती, न जान ली होती। 1992 में मुजफ्फरपुर के तुर्की के छाजन गांव में सबसे पहले खुले उस स्कूल में हर साल करीब सौ बच्चों की भर्ती होनी थी, मुफ्त में उनकी खिलाई-पिलाई होनी थी, उनकी गाय-भैेंसे भी स्कूल के आसपास चरा करतीं। शायद उन्हें कुछ पैसा भी मिलता। लेकिन आज उसका या हर जिले के कई प्रखंडों में खुले उस जैसे अन्य चरवाहा स्कूलों का वही हाल है, जो बिहार के राजमार्गों का है। यानी इस चरवाहा स्कूल के सिर्फ उद्घाटन पट बचे हैं। कहीं-कहीं वह भी उखड़ कर सिल-बट्टे का काम देरहा है। पूरे बिहार में इन स्कूलों ने खुलते ही दम तोड़ना शुरू कर दिया था। कोई 10 दिन चला, कोई महीना भर। साल भर तो शायद ही कोई चला हो। अब चारा, चरवाहे, गाय-भैसें, स्कूल और उनमें पढ़ाने वाले सब एक-दूसरे से छिटक कर अपनी-अपनी जगह पहुंच गये हैं। अपराधी और बेखौफ हैं। बिजली और अंधेरे में चली गयी है। पर लालू प्रसाद मीडिया की निगाहों का केंद्र बने हुए हैं क्योंकि वह कुछ करना चाहते हैं। कभी-कभार वह एक निगाह अपने राज्य पर भी डाल लिया करें।
नयी निवेली सरकार ने अंगड़ाई लेनी शुरू कर दी है। बयानों और ऐलानों का चौतरफा जोर है। वित्तमंμाी चिदम्बरम हों या विदेशमंμाी नटवरसिंह, सब अपने रंग में आते जा रहे हैं। शुरुआत में ही नटवर जी का हाल अटल जी जैसा हो चला है यानी बोलना कुछ चाहते हैं मुंह से निकलता कुछ और है। सोनिया और राहुल रायबरेली में मुलायम सरकार पर ऐसी टिप्पणी कर आये कि दोनों तरफ से तलवारें खिंच गयीं, और अटल जी ने भी यह कड़वी गोली निगल ही ली कि गुजरात के दंगे फीलुगड पर भारी पड़े । हालांकि उनके इस बयान पर तोगड़िया ने आंखें तरेर कर पूर्व प्रधानमंμाी के मनाली प्रवास में खटास डाल दी है। सांसद शहाबुद्दीन भी पीछे क्यों रहते, उन्होंने अपनी तुलना सिकंदर महान से कर दी। पर इन सब भारियों पर भारी पड़े रेलवे मंμाी लालू प्रसाद यादव, जिनका एक-एक ऐलान उनके कुछ कर गुजरने का आभास दे रहा है। सबसे शानदार काम तो उन्होंने रेलवे में प्लास्टिक कपों पर रोक लगा कर किया। प्लास्टिक कचरा एक दु ज्स्वप्न बन चला है और जिससे बचने को लेकर पिछले पांच साल से सरकारी आभियान छिड़ा हुआ था, पर अन्य सरकारी अभियानों की तरह इसका भी टायर पंक्चर कर गया था। लेकिन अब कुल्हड़ों में चाय पिलवा कर लालू ने पंक्चर हुए अभियान की गाड़ी फिर आगे बढ़ा दी है। अब वह एसी दर्जे के रेलयाμिायों के लिये उस खादी को ओढ़ना-बिछौना बनाने पर तुले हैं, जो किसी फैशन शो का मोहताज हो चली थी। जिससे बनी टोपी तक नेताओं के सिर से उतर गयी थी। एक और नायाब योजना बेरोजगार युवकों को हिल्ले से लगाने को रेलवे स्टेशनों पर एएच व्हीलर के नाम का बरसों से चला आ रहा बुकस्टालों का साम्राज्य खत्म करना है। और इससे भी नायाब वह योजना है, जिसने 12-13 साल पहले विदेशियों तक के कान खड़े कर दिये थे यानी देश भर में चरवाहा स्कूल शुरू करने की बात। हालांकि इसका ऐलान इस योजना के प्रणेता लालू प्रसाद ने खुद नहीं किया। पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि यह कहने वाली उनकी करीबी मानव संसाधन राज्यमंμाी कांति सिंह हैं और जिसे जुबान फिसलना तो नहीं ही कहा जा सकता। ऐसे क्रांतिकारी कदम उठाने के लिये केवल साधुवाद ही निकलता मुंह से अगर दुनिया के पहले पहल खुले चरवाहा स्कूल की हालत न देख ली होती, न जान ली होती। 1992 में मुजफ्फरपुर के तुर्की के छाजन गांव में सबसे पहले खुले उस स्कूल में हर साल करीब सौ बच्चों की भर्ती होनी थी, मुफ्त में उनकी खिलाई-पिलाई होनी थी, उनकी गाय-भैेंसे भी स्कूल के आसपास चरा करतीं। शायद उन्हें कुछ पैसा भी मिलता। लेकिन आज उसका या हर जिले के कई प्रखंडों में खुले उस जैसे अन्य चरवाहा स्कूलों का वही हाल है, जो बिहार के राजमार्गों का है। यानी इस चरवाहा स्कूल के सिर्फ उद्घाटन पट बचे हैं। कहीं-कहीं वह भी उखड़ कर सिल-बट्टे का काम देरहा है। पूरे बिहार में इन स्कूलों ने खुलते ही दम तोड़ना शुरू कर दिया था। कोई 10 दिन चला, कोई महीना भर। साल भर तो शायद ही कोई चला हो। अब चारा, चरवाहे, गाय-भैसें, स्कूल और उनमें पढ़ाने वाले सब एक-दूसरे से छिटक कर अपनी-अपनी जगह पहुंच गये हैं। अपराधी और बेखौफ हैं। बिजली और अंधेरे में चली गयी है। पर लालू प्रसाद मीडिया की निगाहों का केंद्र बने हुए हैं क्योंकि वह कुछ करना चाहते हैं। कभी-कभार वह एक निगाह अपने राज्य पर भी डाल लिया करें।
बूढ़ी काकी की दर्दनाक मौत
राजीव मित्तल
प्रेमचंद की कहानी में सारी जमीन-जायदाद हड़प कर जाने वाले भतीजे के यहां दावत वाले दिन देर रात भूख से बेहाल बूढ़ी काकी को रेंग-रेंग कर झूठे पत्तल चाटता देख भतीजा बहू के मन में इस कदर संताप हुआ कि आंखों से बहते आंसुओं के साथ वह तुरंत पकवानों की थाली सजा कर लायी और अपने सामने बैठ कर काकी को खिलाया। भतीजे को भी दुख हुआ। लेकिन काकी से कई गुना उम्रदराज खटिया पर सैंकड़ों बरसों से पड़ी बाबरी मसजिद का ध्वंस करने में किसी तरह की दया नहीं दिखायी गयी।
कानपुर से रात को चल कर छह दिसम्बर 1992 की सुबह जब अयोध्या पहुंचे तो औंघायी सी पड़ी थीं कस्बे की सड़कें-गलियां। कुछ बड़ा घटने का दूर-दूर तक आभास नहीं था। जीप को सड़क के किनारे लगा कर जहां कारसेवा होनी थी, वहां तक पहुंचने के लिये कई टीले फलांदने पड़े। कारसेवा स्थल पर देश-विदेश के पत्रकार और फोटोग्राफरों का जमावड़ा मौजूद था। धूप खिलते ही हलचल बढ़ने लगी। मंच पर संघ परिवार के कई बड़े नेता-लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार और साधवी ऋतम्भरा वगैरह मौजूद थे। साध्वी का जोशीला प्रवचन चल रहा था। कारसेवकों की एक के बाद एक खेप स्थल पर पहुंच रही थी।
कुछ देर बाद पुलिस वाले उन्हें दूसरे रास्ते से निकाल देते। बाबरी की छत पर सीमा सुरक्षा बल के रायफलधारी जवानों की सुरक्षा में मजिस्ट्रेट कार्यस्थल की निगरानी कर रहे थे। 10 बजते-बजते भाषण आग उगलने लगे और माहौल तेजी से गरमाने लगा। तब तक कारसेवकों का एक बड़ा जत्था हाथों में हथौड़े, छड़ें, बेलचे और तोड़-फोड़ में काम आने वाला कैसा भी औजार लिये वहां आ धमका। कुछ देर पुलिस से उनकी धींगामुश्ती चली, लेकिन जुनून सारे वातावरण पर छाता जा रहा था। आडवाणी ने एकाध बार मीठे अंदाज में शांत रहने की अपील की, लेकिन सब बेकार। सारी व्यवस्था चरमारा गयी और कारसेवक मसजिद की दीवारों, खम्भों और गुम्बदों पर रेंग-रेंग कर चढ़ गये और उन्हें तोड़ने लगे। पल भर में मजिस्ट्रेट और उनके साथ सौ से ऊपर सीमा सुरक्षा बल के जवान वहां से भाग लिये।
अब सब कुछ कारसेवकों के हाथ में था। पत्रकार बिरादरी भी डर कर भाग खड़ी हुई। मंच पर खुशी के नारे लगाये जाने लगे। उमा भारती और साध्वी जोशी जी के गले लिपट गयीं। मंच से कहा जाने लगा-हजार साल की गुलामी की जंजीरें आज तोड़ दी गयीं। आडवाणी जी बोले-अब आप सब प्रसाद खा कर जाएं। उधर तोड़ -फोड़ का उन्माद जारी था। ऐसे में अपने को बिल्कुल अकेला पाकर घबराहट होने लगी। यहां-वहां भटकने के बाद धूल-धक्कड़ में बड़ी मुश्किल से एक चेहरा पहचाना सा लगा। वो थे दिलीप शुक्ला। सैंकड़ों पत्रकार कारसेवा स्थल के नजदीक बने एक भवन की छत से नजारा देख रहे थे और नीचे ताला मार दिया गया था।
शुक्ला जी के साथ ही एक घंटे तक घूम-घूम कर मसजिद ढहते देखी। सभी कारसेवकों को पूड़ी-सब्जी के पैकेट मिले थे। भूख जोर से लगी थी। कारसेवक समझ अपने को भी एक पैकेट थमा दिया गया। दिन के 12 बज चुके थे। इस बात का पूरा अंदेशा था कि अब सेना आने वाली है, सो तुरंत जीप की तरफ भागा। रास्ता पता नहीं चल रहा था। भटकते हुए कारसेवकों के शिविर में पहुंच गया, जहां घेर लिया गया। पिछले कई दिन से वहां पत्रकार पिट रहे थे, फोटोग्राफरों के कै मरे तोड़े जा रहे थे। मार्क टुली और रघु राय को भी नहीं बख्शा गया था। मान लिया कि आज अपनी भी पिटाई तय है। कई सवालों के जवाब देकर किसी तरह उन्हें संतुष्ट किया और भागा वहां से।
जीप तक पहुंच कर जान में जान आयी। कुछ देर में अपने सभी साथी आ गये। तुरंत जीप भगायी। रास्ते में सामने से फौज की टुकड़ियां आती दिखायी दीं। जीप को खेतों में उतार कर दौड़ाया। शाम सात बजते-बजते कानपुर पहुंचे। कानपुर में हिंसा शुरू हो गयी थी। गोलियों के धमाके और जगह-जगह आगजनी। मेस्टन रोड के हालात बेहद नाजुक थे, जहां के एक लॉज में अपना डेरा था। सामान उठा कर दफ्तर के बगल के एक होटल में कमरा लिया। कर्फ्यू लग चुका था और कानपुर ही नही,ं अगले सात दिन के लिये पूरा देश बलवाइयों के हवाले था।
प्रेमचंद की कहानी में सारी जमीन-जायदाद हड़प कर जाने वाले भतीजे के यहां दावत वाले दिन देर रात भूख से बेहाल बूढ़ी काकी को रेंग-रेंग कर झूठे पत्तल चाटता देख भतीजा बहू के मन में इस कदर संताप हुआ कि आंखों से बहते आंसुओं के साथ वह तुरंत पकवानों की थाली सजा कर लायी और अपने सामने बैठ कर काकी को खिलाया। भतीजे को भी दुख हुआ। लेकिन काकी से कई गुना उम्रदराज खटिया पर सैंकड़ों बरसों से पड़ी बाबरी मसजिद का ध्वंस करने में किसी तरह की दया नहीं दिखायी गयी।
कानपुर से रात को चल कर छह दिसम्बर 1992 की सुबह जब अयोध्या पहुंचे तो औंघायी सी पड़ी थीं कस्बे की सड़कें-गलियां। कुछ बड़ा घटने का दूर-दूर तक आभास नहीं था। जीप को सड़क के किनारे लगा कर जहां कारसेवा होनी थी, वहां तक पहुंचने के लिये कई टीले फलांदने पड़े। कारसेवा स्थल पर देश-विदेश के पत्रकार और फोटोग्राफरों का जमावड़ा मौजूद था। धूप खिलते ही हलचल बढ़ने लगी। मंच पर संघ परिवार के कई बड़े नेता-लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार और साधवी ऋतम्भरा वगैरह मौजूद थे। साध्वी का जोशीला प्रवचन चल रहा था। कारसेवकों की एक के बाद एक खेप स्थल पर पहुंच रही थी।
कुछ देर बाद पुलिस वाले उन्हें दूसरे रास्ते से निकाल देते। बाबरी की छत पर सीमा सुरक्षा बल के रायफलधारी जवानों की सुरक्षा में मजिस्ट्रेट कार्यस्थल की निगरानी कर रहे थे। 10 बजते-बजते भाषण आग उगलने लगे और माहौल तेजी से गरमाने लगा। तब तक कारसेवकों का एक बड़ा जत्था हाथों में हथौड़े, छड़ें, बेलचे और तोड़-फोड़ में काम आने वाला कैसा भी औजार लिये वहां आ धमका। कुछ देर पुलिस से उनकी धींगामुश्ती चली, लेकिन जुनून सारे वातावरण पर छाता जा रहा था। आडवाणी ने एकाध बार मीठे अंदाज में शांत रहने की अपील की, लेकिन सब बेकार। सारी व्यवस्था चरमारा गयी और कारसेवक मसजिद की दीवारों, खम्भों और गुम्बदों पर रेंग-रेंग कर चढ़ गये और उन्हें तोड़ने लगे। पल भर में मजिस्ट्रेट और उनके साथ सौ से ऊपर सीमा सुरक्षा बल के जवान वहां से भाग लिये।
अब सब कुछ कारसेवकों के हाथ में था। पत्रकार बिरादरी भी डर कर भाग खड़ी हुई। मंच पर खुशी के नारे लगाये जाने लगे। उमा भारती और साध्वी जोशी जी के गले लिपट गयीं। मंच से कहा जाने लगा-हजार साल की गुलामी की जंजीरें आज तोड़ दी गयीं। आडवाणी जी बोले-अब आप सब प्रसाद खा कर जाएं। उधर तोड़ -फोड़ का उन्माद जारी था। ऐसे में अपने को बिल्कुल अकेला पाकर घबराहट होने लगी। यहां-वहां भटकने के बाद धूल-धक्कड़ में बड़ी मुश्किल से एक चेहरा पहचाना सा लगा। वो थे दिलीप शुक्ला। सैंकड़ों पत्रकार कारसेवा स्थल के नजदीक बने एक भवन की छत से नजारा देख रहे थे और नीचे ताला मार दिया गया था।
शुक्ला जी के साथ ही एक घंटे तक घूम-घूम कर मसजिद ढहते देखी। सभी कारसेवकों को पूड़ी-सब्जी के पैकेट मिले थे। भूख जोर से लगी थी। कारसेवक समझ अपने को भी एक पैकेट थमा दिया गया। दिन के 12 बज चुके थे। इस बात का पूरा अंदेशा था कि अब सेना आने वाली है, सो तुरंत जीप की तरफ भागा। रास्ता पता नहीं चल रहा था। भटकते हुए कारसेवकों के शिविर में पहुंच गया, जहां घेर लिया गया। पिछले कई दिन से वहां पत्रकार पिट रहे थे, फोटोग्राफरों के कै मरे तोड़े जा रहे थे। मार्क टुली और रघु राय को भी नहीं बख्शा गया था। मान लिया कि आज अपनी भी पिटाई तय है। कई सवालों के जवाब देकर किसी तरह उन्हें संतुष्ट किया और भागा वहां से।
जीप तक पहुंच कर जान में जान आयी। कुछ देर में अपने सभी साथी आ गये। तुरंत जीप भगायी। रास्ते में सामने से फौज की टुकड़ियां आती दिखायी दीं। जीप को खेतों में उतार कर दौड़ाया। शाम सात बजते-बजते कानपुर पहुंचे। कानपुर में हिंसा शुरू हो गयी थी। गोलियों के धमाके और जगह-जगह आगजनी। मेस्टन रोड के हालात बेहद नाजुक थे, जहां के एक लॉज में अपना डेरा था। सामान उठा कर दफ्तर के बगल के एक होटल में कमरा लिया। कर्फ्यू लग चुका था और कानपुर ही नही,ं अगले सात दिन के लिये पूरा देश बलवाइयों के हवाले था।
सोमवार, 6 दिसंबर 2010
अब तो मीत बन जाओ
राजीव मित्तल
हफ्ते-दस दिन में बिहार की सत्ता किसी न किसी को मिल ही जाएगी, न सही एक को, तो एक झुंड को मिल जाएगी। बहरहाल, जो भी सत्ता में आए, उसे यह सोच कर आना है कि बस, अब और नहीं। बरबाद करने की भी एक हद होती है और वह हद पार हो चुकी है। चुनाव के तीनों चरणों में बिहार हथियारों का जखीरा बना रहा। घर की बहु-बेटियों के गहने, खेत और मकान बेच कर हथियार खरीदे गये, क्योंकि सालों से इस राज्य में चुनाव का मतलब है दहशत और आतंक, जो कायम ही इसलिये किया जाता है ताकि दुनिया को पता चले कि बिहार में लाठी ही होती है, भैंस तो कब की मैदान से हट चुकी है।
बिहार आज अकाल वाली जमीन की तरह पपड़ाया हुआ है, जिसकी हर परत के नीचे से चाहे स्वास्थ्य सेवा हो, चाहे जैसा भी उद्योग हो, सड़क हो, पुल हो, स्कूल या कॉलेज हो, रेलवे लाइन हो, बांध हो, कचहरी हो, अदालत हो, बुनकर हों, भागलपुर का रेशम हो, हाजीपुर के केले हों, मुजफ्फरपुर की लीची हो, बुद्ध कालीन लिच्छवी हो, अशोक कालीन मगध हो, भिखारी ठाकुर का भोजपुर हो, राजा जनक का विदेह या उनकी बिटिया की जन्म स्थलियां हों, विद्यापति हों और बाबा नागार्जुन या मखाने का मिथिलांचल, रेणु का फारबिसगंज हो, गांधी का चम्पारण हो या राजेन्द्र बाबू का छपरा या अंगराज कर्ण का मुंगेर हो-हर तरफ से एक ऐसी शोक धुन सुनायी पड़ रही है, जो शरीर को कंपकंपा जाती है, बिल्कुल टाइटन फिल्म की वो धुन जो जहाज में पानी भरने पर शुरू हुई। जिस राज्य के माμा 93 विधानसभा क्षेμाों में मतदान कराने के लिये पांच सौ कम्पनी सुरक्षा बल की जरूरत पड़ती हो, उसके बावजूद मुख्यमंμाी के चुनाव क्षेμा में यादवों का कहर बरपा रहे, पारू और बरुराज में होमगार्ड खैनी मलते रहें और किसी का वोट कोई और डालता रहे तो यही लगता है कि मरीज को इंटेसिव केयर यूनिट में डाल उसके नाक और मुंह में नली ठूंसने की जरूरत आन पड़ी है और मरीज के शरीर का कौन से हिस्से में जीने की लालसा है उसे तलाशने की जरूरत है। हो सकता है इस बार फिर 15 साल से बिहार के सर्वेसर्वा बने रहे लालू प्रसाद ही एक बार फिर भाग्यविधाता बनें, हो सकता है 15 साल पहले धकिया कर हटायी गयी कांग्रेस के नसीब में फिर सत्तारोहण लिखा हो, हो सकता है इस बार केवल छूने भर को नहीं बल्कि पकड़ कर बैठने की लालसा पाले नीतीश कुमार सत्ता पर काबिज हों, जिनके गठबंधन की नौ महीने पहले केन्द्रीय सरकार में विदेशमंμाी से लेकर वित्तमंμाी, रक्षामंμाी, स्वास्थ्य मंμाी, सूचना प्रसारण मंμाी यानी कुल मिलाकर 13 मंμाी इसी धरा के थे, पर जो अपने पिता बिम्बसार को जेल में सड़ा मारने वाले अजातशμाु साबित हुए या फिर मसीहाई को बेताब रामविलास पासवान शासन की बागडोर संभालें-कम से कम अब बिहार को उसका कोई माई-बाप तो मिले, जिसका किसी स्कूल में नाम लिखवाते समय वल्दियत का पता चल सके।
उस स्कूल के बाहर दाखिले के इंतजार में पचास लाख बच्चे न खड़े हों, उस स्कूल में कोई प्रधानाचार्य भी हो, उस स्कूल में कोई पढ़ाने वाला भी हो, उस स्कूल के करीब लगे पेड़ों पर पक्षी चहचहाएं, न कि परीक्षा के समय मां-बाप चढ़ कर अपने बच्चे को नकल कराएं, उस स्कूल के पास खाने का सामान बिकता हो, तमंचा-बंदूक नहीं, किसी राष्ट्रीय पर्व पर उस स्कूल में तिरंगा उल्टा न लहराया जाता हो, उस स्कूल के हर बच्चे के घर में चूल्हा जलता हो, पर जिसमें पेट भरने के लिये केवल चूहा या घोंघा न पकता हो, घरों में लालटेन हो तो मिट्टी का तेल भी हो, बल्ब हो तो बिजली भी हो, जिसके घर में कालाजार का रोगी हो तो किसी ताक पर फंगीजोन भी धरी हो, केला सड़क पर न सड़े, लीची नाली में न फिंके, अस्पताल में रोगी हो न हो, लेकिन दवाइयों से लैस डाक्टर तो हो, सड़क ऐसी तो हो, जिस पर कोई भी वाहन बैलगाड़ी से होड़ ले सके, बांध नदियां को उनकी हद में रखने के लिये हो न कि लोगों को बसाने के लिये-अगर पांच साल भी किसी भी सरकार ने इतना इंतजाम भी कर दिया तो बिहार को सांस आने लगेगी। भले ही उसकी आंखों के सामने मुंह पर कपड़ा बांध कर हुजूम का हुजूम विधायकी करने आ गया हो।
हफ्ते-दस दिन में बिहार की सत्ता किसी न किसी को मिल ही जाएगी, न सही एक को, तो एक झुंड को मिल जाएगी। बहरहाल, जो भी सत्ता में आए, उसे यह सोच कर आना है कि बस, अब और नहीं। बरबाद करने की भी एक हद होती है और वह हद पार हो चुकी है। चुनाव के तीनों चरणों में बिहार हथियारों का जखीरा बना रहा। घर की बहु-बेटियों के गहने, खेत और मकान बेच कर हथियार खरीदे गये, क्योंकि सालों से इस राज्य में चुनाव का मतलब है दहशत और आतंक, जो कायम ही इसलिये किया जाता है ताकि दुनिया को पता चले कि बिहार में लाठी ही होती है, भैंस तो कब की मैदान से हट चुकी है।
बिहार आज अकाल वाली जमीन की तरह पपड़ाया हुआ है, जिसकी हर परत के नीचे से चाहे स्वास्थ्य सेवा हो, चाहे जैसा भी उद्योग हो, सड़क हो, पुल हो, स्कूल या कॉलेज हो, रेलवे लाइन हो, बांध हो, कचहरी हो, अदालत हो, बुनकर हों, भागलपुर का रेशम हो, हाजीपुर के केले हों, मुजफ्फरपुर की लीची हो, बुद्ध कालीन लिच्छवी हो, अशोक कालीन मगध हो, भिखारी ठाकुर का भोजपुर हो, राजा जनक का विदेह या उनकी बिटिया की जन्म स्थलियां हों, विद्यापति हों और बाबा नागार्जुन या मखाने का मिथिलांचल, रेणु का फारबिसगंज हो, गांधी का चम्पारण हो या राजेन्द्र बाबू का छपरा या अंगराज कर्ण का मुंगेर हो-हर तरफ से एक ऐसी शोक धुन सुनायी पड़ रही है, जो शरीर को कंपकंपा जाती है, बिल्कुल टाइटन फिल्म की वो धुन जो जहाज में पानी भरने पर शुरू हुई। जिस राज्य के माμा 93 विधानसभा क्षेμाों में मतदान कराने के लिये पांच सौ कम्पनी सुरक्षा बल की जरूरत पड़ती हो, उसके बावजूद मुख्यमंμाी के चुनाव क्षेμा में यादवों का कहर बरपा रहे, पारू और बरुराज में होमगार्ड खैनी मलते रहें और किसी का वोट कोई और डालता रहे तो यही लगता है कि मरीज को इंटेसिव केयर यूनिट में डाल उसके नाक और मुंह में नली ठूंसने की जरूरत आन पड़ी है और मरीज के शरीर का कौन से हिस्से में जीने की लालसा है उसे तलाशने की जरूरत है। हो सकता है इस बार फिर 15 साल से बिहार के सर्वेसर्वा बने रहे लालू प्रसाद ही एक बार फिर भाग्यविधाता बनें, हो सकता है 15 साल पहले धकिया कर हटायी गयी कांग्रेस के नसीब में फिर सत्तारोहण लिखा हो, हो सकता है इस बार केवल छूने भर को नहीं बल्कि पकड़ कर बैठने की लालसा पाले नीतीश कुमार सत्ता पर काबिज हों, जिनके गठबंधन की नौ महीने पहले केन्द्रीय सरकार में विदेशमंμाी से लेकर वित्तमंμाी, रक्षामंμाी, स्वास्थ्य मंμाी, सूचना प्रसारण मंμाी यानी कुल मिलाकर 13 मंμाी इसी धरा के थे, पर जो अपने पिता बिम्बसार को जेल में सड़ा मारने वाले अजातशμाु साबित हुए या फिर मसीहाई को बेताब रामविलास पासवान शासन की बागडोर संभालें-कम से कम अब बिहार को उसका कोई माई-बाप तो मिले, जिसका किसी स्कूल में नाम लिखवाते समय वल्दियत का पता चल सके।
उस स्कूल के बाहर दाखिले के इंतजार में पचास लाख बच्चे न खड़े हों, उस स्कूल में कोई प्रधानाचार्य भी हो, उस स्कूल में कोई पढ़ाने वाला भी हो, उस स्कूल के करीब लगे पेड़ों पर पक्षी चहचहाएं, न कि परीक्षा के समय मां-बाप चढ़ कर अपने बच्चे को नकल कराएं, उस स्कूल के पास खाने का सामान बिकता हो, तमंचा-बंदूक नहीं, किसी राष्ट्रीय पर्व पर उस स्कूल में तिरंगा उल्टा न लहराया जाता हो, उस स्कूल के हर बच्चे के घर में चूल्हा जलता हो, पर जिसमें पेट भरने के लिये केवल चूहा या घोंघा न पकता हो, घरों में लालटेन हो तो मिट्टी का तेल भी हो, बल्ब हो तो बिजली भी हो, जिसके घर में कालाजार का रोगी हो तो किसी ताक पर फंगीजोन भी धरी हो, केला सड़क पर न सड़े, लीची नाली में न फिंके, अस्पताल में रोगी हो न हो, लेकिन दवाइयों से लैस डाक्टर तो हो, सड़क ऐसी तो हो, जिस पर कोई भी वाहन बैलगाड़ी से होड़ ले सके, बांध नदियां को उनकी हद में रखने के लिये हो न कि लोगों को बसाने के लिये-अगर पांच साल भी किसी भी सरकार ने इतना इंतजाम भी कर दिया तो बिहार को सांस आने लगेगी। भले ही उसकी आंखों के सामने मुंह पर कपड़ा बांध कर हुजूम का हुजूम विधायकी करने आ गया हो।
जब हर शाख लदी हो तो गुलिस्तां के क्या कहने
सीता हो या जनता, सड़क हो या पुल सब वनवास में
राजीव मित्तल
सीतामढ़ी-शिवहर। अगर आप नेता या अभिनेता नहीं हैं तो इसका मतलब आप उड़नखटोले पर नहीं हैं, तब आपके लिये सीतामढ़ी और शिवहर के हालात समझना बहुत आसान है और जब हालात से चार-पांच घंटे में रुबरु हो लेें तो मन में एक ही सवाल कौंधेगा कि अब तक होते रहे कैसे भी चुनाव क्या सीतामढ़ी और शिवहर की जनता के साथ मजाक नहीं हैं? आज की तारीख में उड़नखटोले पर बैठ किसी खेत को हेलिपैड बना कर यहां उतरने वाला कोई भी नेता वोट किस मुंह से मांग रहा है, इस पर अचरज होता है। अचरज तो अभी और भी हैं-मसलन जिस देवी के नाम पर इस इलाके का नाम सीतामढ़ी पड़ा, वह सीता जी पुन्हारा धाम में राजा जनक को एक खेत से नवजात शिशु के रूप में मिली थीं, लेकिन भाई लोगों की श्रद्धा ने यहीं दम नहीं साधा, सीता जी को शहर के भीतर एक पोखर से भी जन्मवा दिया। सीता जी के जन्म के ये दोनों स्थल उतनी ही शर्मनाक हालत में हैं, जितना खुद सीतामढ़ी। पर शर्म न तो रामभक्तों को है न उन जन प्रतिनिधियों को जो पिछले 53 साल में चौदहवीं बार फिर गला फाड़-फाड़ कर वोट मांग रहे हैं और उससे भी ज्यादा शर्मनाक है उनकी सभाओं में जुटती लोगों की भीड़ का, जिसने हर हालत में जीये जाने की कसम खा ली है। सीतामढ़ी वो जिला है, जिसका गेयर 30 साल से फंसा पड़ा है। पुराने लोग बताते हैं कि 1977 तक शहर और जिले का सारा कामकाज सामान्य स्थिति में चल रहा था। उसके बाद से चाहे जिस पार्टी का विधायक रहा हो या सांसद सब बस चुनाव में ही दिखायी देते हैं। 1994 में रघुनाथ झा ने लालू प्रसाद का साथ निभाने की एवज में अपने चुनाव क्षेμा शिवहर को जिला बनवा तो लिया, पर हाल वही किया जैसे कुंती ने कर्ण को जन्म देते ही नदी में बहा दिया था।दो किलोमीटर के इलाके को अगर जिला मुख्यालय कहा जा सकता है तो बिहार में कुछ भी असंभव नहीं। एक जिला मुख्यालय लायक सारी औपचारिकताओं से सजा दिया गया है लेकिन अब जरा ध्यान दें- कोर्ट के कमरे हैं, लेकिन कोई अदालत नहीं, जेल है पर कैदी नहीं, जेल में कैदी इसलिये नहीं कि उसके ऊपर से 11 हजार वोल्ट का तार जा रहा है, जिसको शिफ्ट करने के लिये बिजली विभाग तीन लाख रुपये मांगता है जो पीडब्लूडी विभाग दे नहीं पा रहा, और भी कई सारे भवन खड़े हुए हैं, पर जहां रात को शर्तिया अड्डेबाजी होती होगी, क्योंकि दिन में ही उनमें चिमगादड़ उड़ते हैं क्योंकि किसी कमरे में दरवाजा नहीं। सन् 32 और सन् 42 के सातशहीदों के नाम वाला एक संगमरमरी बोर्ड कुछ इस तरह खड़ा है, जैसे पूछ रहा हो कि शहीद होने की क्या जरूरत थी। शिवहर हर साल जून से दिसम्बर तक सिर्फ मुजफ्फरपुर जाने वाले एक रास्ते को छोड़ कर नाव पर आ जाता है और फिर एक समय वह भी आता है जब नाव भी तौबा बोल जाती है। बागमती इस पूरे क्षेμा के लिये ंिहदी फिल्मों की सौतेली मां के समान है, जिसके चलते इन दोनों जिलों के जर्रे-जर्रे पर पुल-पुलिया झोंक दी गयी हैं। इनकी संख्या अगर हम 777 मान लें तो इनमें 776 अंग्रेजों के समय की हैं और तब से अब तक 775 की लोहे की रेंिलग बेच कर खायी जा चुकी है और जाते समय अगर वह पुल या पुलिया नदी या नाले में नहीं है तो दो घंटे बाद लौटते समय किस्मत को दोष देने की जरूरत नहीं। इलाके में डायवर्सन की भरमार है क्योंकि अंग्रेजों की सौगात कब तक साथ देती। सीतामढ़ी को शिवहर से जोड़ने वाला बागमती पर बना पुल इतिहास बन गया है।उस पुल के कुछ अवशेष पानी में से झांकते नजर आ जाते हैं। तब से नया पुल निविदाओं, जालसाज कम्पनियों, जनप्रतिनिधियों के वादों की गर्द में धंसा पड़ा है।इस टेल ऑफ टु सिटीज की कोई भी दास्तां नेशनल हाईवे का जिक्र किये बगैर पूरी नहीं हो सकती। वैसे तो पूरे बिहार में ही नेशनल हाईवे पगडंडी बना पड़ा है। इन्हें बनवाने में जिन ठेकेदारों का हाथ रहा होगा, उन्होंने कई बातों का ख्याल रखा-जैसे कहां-कहां उसे कीचड़ में लोटपोट करना है, कहां-कहां उसके चीथड़े उतरवाने हैं, कहां-कहां उसे नदी-नाले में नहाते दिखाना है, कहां-कहां उसे गड्ढे में डालना है, आधी चौड़ाई की कमाई उन्होंने दान खाते में डाल दी, फुटपाथ इसलिये नहीं बनवाया कि नेता लोग नहीं चाहते थे कि इन सड़कों पर कोई अपने पांव से चले और दो-दो हजार फुट सड़क इसलिये नहीं है कि चालकवाहन चलाते-चलाते कहीं सो न जाए। लेकिन वोट मांगने वालों की कमी नहीं, उस रीगा में भी, जहां का थाना प्रथम विश्वयुद्ध की बैरेकों की याद दिलाता है। जहां नक्सली परचा भेज कर पुलिसियों की नींद हराम किये रहते हैं कि हम रात का खाना तुम्हारे साथ खाएंगे और जो सीतामढ़ी से केवल सात किलोमीटर दूर है। लेकिन आज यहां सब उमड़ पड़े हैं क्योंकि सीतामढ़ी और शिवहर जिले विधानसभा में नौ और संसद में दो की बढ़ोतरी करते हैं, जो सरकार गिराने और बनाने में हाथ बंटाते हैं, जिनका बाजार भाव दो-चार करोड़ तो होगा ही।
राजीव मित्तल
सीतामढ़ी-शिवहर। अगर आप नेता या अभिनेता नहीं हैं तो इसका मतलब आप उड़नखटोले पर नहीं हैं, तब आपके लिये सीतामढ़ी और शिवहर के हालात समझना बहुत आसान है और जब हालात से चार-पांच घंटे में रुबरु हो लेें तो मन में एक ही सवाल कौंधेगा कि अब तक होते रहे कैसे भी चुनाव क्या सीतामढ़ी और शिवहर की जनता के साथ मजाक नहीं हैं? आज की तारीख में उड़नखटोले पर बैठ किसी खेत को हेलिपैड बना कर यहां उतरने वाला कोई भी नेता वोट किस मुंह से मांग रहा है, इस पर अचरज होता है। अचरज तो अभी और भी हैं-मसलन जिस देवी के नाम पर इस इलाके का नाम सीतामढ़ी पड़ा, वह सीता जी पुन्हारा धाम में राजा जनक को एक खेत से नवजात शिशु के रूप में मिली थीं, लेकिन भाई लोगों की श्रद्धा ने यहीं दम नहीं साधा, सीता जी को शहर के भीतर एक पोखर से भी जन्मवा दिया। सीता जी के जन्म के ये दोनों स्थल उतनी ही शर्मनाक हालत में हैं, जितना खुद सीतामढ़ी। पर शर्म न तो रामभक्तों को है न उन जन प्रतिनिधियों को जो पिछले 53 साल में चौदहवीं बार फिर गला फाड़-फाड़ कर वोट मांग रहे हैं और उससे भी ज्यादा शर्मनाक है उनकी सभाओं में जुटती लोगों की भीड़ का, जिसने हर हालत में जीये जाने की कसम खा ली है। सीतामढ़ी वो जिला है, जिसका गेयर 30 साल से फंसा पड़ा है। पुराने लोग बताते हैं कि 1977 तक शहर और जिले का सारा कामकाज सामान्य स्थिति में चल रहा था। उसके बाद से चाहे जिस पार्टी का विधायक रहा हो या सांसद सब बस चुनाव में ही दिखायी देते हैं। 1994 में रघुनाथ झा ने लालू प्रसाद का साथ निभाने की एवज में अपने चुनाव क्षेμा शिवहर को जिला बनवा तो लिया, पर हाल वही किया जैसे कुंती ने कर्ण को जन्म देते ही नदी में बहा दिया था।दो किलोमीटर के इलाके को अगर जिला मुख्यालय कहा जा सकता है तो बिहार में कुछ भी असंभव नहीं। एक जिला मुख्यालय लायक सारी औपचारिकताओं से सजा दिया गया है लेकिन अब जरा ध्यान दें- कोर्ट के कमरे हैं, लेकिन कोई अदालत नहीं, जेल है पर कैदी नहीं, जेल में कैदी इसलिये नहीं कि उसके ऊपर से 11 हजार वोल्ट का तार जा रहा है, जिसको शिफ्ट करने के लिये बिजली विभाग तीन लाख रुपये मांगता है जो पीडब्लूडी विभाग दे नहीं पा रहा, और भी कई सारे भवन खड़े हुए हैं, पर जहां रात को शर्तिया अड्डेबाजी होती होगी, क्योंकि दिन में ही उनमें चिमगादड़ उड़ते हैं क्योंकि किसी कमरे में दरवाजा नहीं। सन् 32 और सन् 42 के सातशहीदों के नाम वाला एक संगमरमरी बोर्ड कुछ इस तरह खड़ा है, जैसे पूछ रहा हो कि शहीद होने की क्या जरूरत थी। शिवहर हर साल जून से दिसम्बर तक सिर्फ मुजफ्फरपुर जाने वाले एक रास्ते को छोड़ कर नाव पर आ जाता है और फिर एक समय वह भी आता है जब नाव भी तौबा बोल जाती है। बागमती इस पूरे क्षेμा के लिये ंिहदी फिल्मों की सौतेली मां के समान है, जिसके चलते इन दोनों जिलों के जर्रे-जर्रे पर पुल-पुलिया झोंक दी गयी हैं। इनकी संख्या अगर हम 777 मान लें तो इनमें 776 अंग्रेजों के समय की हैं और तब से अब तक 775 की लोहे की रेंिलग बेच कर खायी जा चुकी है और जाते समय अगर वह पुल या पुलिया नदी या नाले में नहीं है तो दो घंटे बाद लौटते समय किस्मत को दोष देने की जरूरत नहीं। इलाके में डायवर्सन की भरमार है क्योंकि अंग्रेजों की सौगात कब तक साथ देती। सीतामढ़ी को शिवहर से जोड़ने वाला बागमती पर बना पुल इतिहास बन गया है।उस पुल के कुछ अवशेष पानी में से झांकते नजर आ जाते हैं। तब से नया पुल निविदाओं, जालसाज कम्पनियों, जनप्रतिनिधियों के वादों की गर्द में धंसा पड़ा है।इस टेल ऑफ टु सिटीज की कोई भी दास्तां नेशनल हाईवे का जिक्र किये बगैर पूरी नहीं हो सकती। वैसे तो पूरे बिहार में ही नेशनल हाईवे पगडंडी बना पड़ा है। इन्हें बनवाने में जिन ठेकेदारों का हाथ रहा होगा, उन्होंने कई बातों का ख्याल रखा-जैसे कहां-कहां उसे कीचड़ में लोटपोट करना है, कहां-कहां उसके चीथड़े उतरवाने हैं, कहां-कहां उसे नदी-नाले में नहाते दिखाना है, कहां-कहां उसे गड्ढे में डालना है, आधी चौड़ाई की कमाई उन्होंने दान खाते में डाल दी, फुटपाथ इसलिये नहीं बनवाया कि नेता लोग नहीं चाहते थे कि इन सड़कों पर कोई अपने पांव से चले और दो-दो हजार फुट सड़क इसलिये नहीं है कि चालकवाहन चलाते-चलाते कहीं सो न जाए। लेकिन वोट मांगने वालों की कमी नहीं, उस रीगा में भी, जहां का थाना प्रथम विश्वयुद्ध की बैरेकों की याद दिलाता है। जहां नक्सली परचा भेज कर पुलिसियों की नींद हराम किये रहते हैं कि हम रात का खाना तुम्हारे साथ खाएंगे और जो सीतामढ़ी से केवल सात किलोमीटर दूर है। लेकिन आज यहां सब उमड़ पड़े हैं क्योंकि सीतामढ़ी और शिवहर जिले विधानसभा में नौ और संसद में दो की बढ़ोतरी करते हैं, जो सरकार गिराने और बनाने में हाथ बंटाते हैं, जिनका बाजार भाव दो-चार करोड़ तो होगा ही।
यदु अटल हैं, राम कम, रहीम ज्यादा भ्रमित
राजीव मित्तल
दरभंगा। शाम साढे¸ छह बजे टीवी पर एक चैनल शहर के अंदर पब्लिक को इकट्ठा कर एक-दूसरे के सामने ताल ठोक रहे दो दलों के नेताओं को आपस में भिड़ाने की परम्परागत फिराक में है। एक नेता हैं वर्तमान के केंद्रीय मंμाी तो दूसरे भूतकाल के। दोनों नेता मिथिलांचल में किये अपने जनहित कार्यो को बखानने में एक दूसरे को उसी तरह मात देने में लगे हैं जैसे सर्कस में आंखों पर पट्टी बांध कर चाकू निशाने पर फेंके जाने की प्रतियोगिता चल रही हो। कुछ ही देर में यह प्रतियोगिता एक फूहड़ प्रदर्शन बन कर रह गयी, दर्शकों की अदालत मारपीट का अखाड़ा बन गयी और देर तक चीखने-चिल्लाने के बाद वे दोनों नेता मिथिलांचल की धरती को जन्नत बनाने के अभियान पर एक बार फिर निकल पड़े। यह तमाशा देखने के बाद, जो दिन भर भटकते हुए देखा तो स्पष्ट हो गया कि मिथिलांचल के दिन बहुरने की कोई आस फिलहाल तो नहीं ही है।कमला नदी, जो इन दिनों नाला बनी हुई है, उसके साथ लगे गांव, वहां तक पहुंचने के रास्ते अब भी बाढ़ से हुई तबाही की दास्तां कह रहे हैं। इस समय नाला बनी यही कमला रानी विभिषिका बन इन गांवों में घुसी थी। और प्रशासन उसी तबाही पर हाथ पे हाथ धरे बैठा है कि 10-11 महीने के लिये पैसा फूंकने से क्या फायदा, बाढ़ तो फिर आनी है। और शासन-प्रशासन की इस मानसिकता को खाद पानी दे रहे हैं इस तरफ के यादव बहुल गांव। यादवों ने अपना लोक-परलोक सब कुछ लालू प्रसाद के हवाले कर दिया है। कबड़िया गांव के सुहाग यादव हों या शिक्षक तनुकलाल यादव, लालू उनके लिये सब कुछ हैं। उनके लिये ही नहीं उनसे बातचीत करते समय जो महिलाएं घास के पूले लेकर जा रही थीं, या घास काट रही थीं उन्होंने भी अपना काम-धाम रोक बस एक ही बात कही कि गांव का सारा वोट राजद को ही गिरेगा। बदहाली उनके लिये जैसे आत्म सम्मान बन गयी है। 15 को मतदान के दिन ड्यूटी पर जाने की तैयारी कर रहे तनुकलाल तो तुनक कर कहते हैं-बताइये क्या नहीं है? पंद्रह साल में लालू ने हमें सड़क दी, फोन दिया, बिजली दी, टीवी देखने के लिये केबिल दिया, और हमें क्या चाहिये। कैसा विकास? भरतलाल यादव पूछते हैं। लालू को काम ही कहां करने दिया गया, हमेशा एक पैर जेल में, गद्दी पर भी नहीं रहने दिया। यही सब कहना है गौंसाघाट के ग्रामीणों का भी। इसी मानसिकता के चलते यादव समुदाय का एकमुश्त वोट लालू के नाम। लेकिन इन्हीं गांवों में दलित सिर पर लोजपा की टोपी पहन कर खुले आम घूम रहे हैं, जाहिर है कि लालू के हाथ से इस समुदाय का वोट एकमुश्त तो नहीं पर काफी कुछ खिसक सकता है। इन गांवों में कुछ वोट कुम्हार और दास जाति के भी हैं लेकिन वे यादवों की दबंगई के आगे खामोश हैं। कई चुनावों से उनका वोट नहीं गिर रहा है। कुल मिला कर मिथिलांचल में आज यादव वही कर रहे हैं, जो कभी ब्राहमण समाज किया करता था कि पूरे गांव के वोट का अधिकार अपनी जेब में रखना। लेकिन इस बार का सबसे महत्वपूर्ण वोटर मुसलिम समुदाय भ्रमित दिख रहा है। लवाम, खड़वा और इस्लामपुर में बातचीत करने से यही अहसास हुआ कि भले ही सामने वाला वोट राजद को देने की बात कर रहा है, लेकिन उसके दिमाग में कोई और नाम भी घूम रहा है। यह स्पष्ट होता है शहर की मसजिद से जुमे की नमाज पढ़ कर बाहर निकलते लोगों से बातचीत करने के बाद। जो काफी सोच कर जवाब देते है- देखिये अभी कोई फैसला नहीं किया है, एक दो दिन में हो जाएगा। इस बार हमारे बीच राम विलास पासवान का नाम भी उठ रहा है। लेकिन ब्राहमण वोटर को तिनके का भी सहारा नहीं है। जबसे कांग्रेस का इस क्षेμा से सफाया हुआ है, वह अपने को लुटा-पिटा पा रहा है। इस बार उसकी निगाह मुसलमान वोट बैंक पर है कि अगर उसका झुकाव लोजपा की तरफ हो जाए तोराजद कमजोर पड़ जाएगा और राजग की पौबारह हो जाएगी। गोविंदपुर गांव की एक झोंपड़ी में कई सारे लोग बैठे हैं, वे सब और बाहर पान बीड़ी बेच रहा दुकानदार बहुत हिचकते हुए जुबान खोलते हैं कि राजग उम्मीदवार को वोट डालने की सोचे हैं। सब झा और चौधरी निकले। शाम को शहर के एक चौराहे पर कुछ स्थानीय पμाकारों से चर्चा होती है तो उनका यही कहना है कि दरभंगा मंडल की 30 में से 21 सीटें 2000 के चुनाव में राजद के हाथ लगी थीं, इस बार अगर मुसलमान और पासवान वोटर का रुझान कमोबेश लालू की तरफ ही रहा तो वही स्थिति रहेगी। दो-चार सीटों का फर्क कोई मायने नहीं रखता। सबसे बड़ी बात है कि बस, मिथिलांचल इसी तरह विकास को भूला रहे।
दरभंगा। शाम साढे¸ छह बजे टीवी पर एक चैनल शहर के अंदर पब्लिक को इकट्ठा कर एक-दूसरे के सामने ताल ठोक रहे दो दलों के नेताओं को आपस में भिड़ाने की परम्परागत फिराक में है। एक नेता हैं वर्तमान के केंद्रीय मंμाी तो दूसरे भूतकाल के। दोनों नेता मिथिलांचल में किये अपने जनहित कार्यो को बखानने में एक दूसरे को उसी तरह मात देने में लगे हैं जैसे सर्कस में आंखों पर पट्टी बांध कर चाकू निशाने पर फेंके जाने की प्रतियोगिता चल रही हो। कुछ ही देर में यह प्रतियोगिता एक फूहड़ प्रदर्शन बन कर रह गयी, दर्शकों की अदालत मारपीट का अखाड़ा बन गयी और देर तक चीखने-चिल्लाने के बाद वे दोनों नेता मिथिलांचल की धरती को जन्नत बनाने के अभियान पर एक बार फिर निकल पड़े। यह तमाशा देखने के बाद, जो दिन भर भटकते हुए देखा तो स्पष्ट हो गया कि मिथिलांचल के दिन बहुरने की कोई आस फिलहाल तो नहीं ही है।कमला नदी, जो इन दिनों नाला बनी हुई है, उसके साथ लगे गांव, वहां तक पहुंचने के रास्ते अब भी बाढ़ से हुई तबाही की दास्तां कह रहे हैं। इस समय नाला बनी यही कमला रानी विभिषिका बन इन गांवों में घुसी थी। और प्रशासन उसी तबाही पर हाथ पे हाथ धरे बैठा है कि 10-11 महीने के लिये पैसा फूंकने से क्या फायदा, बाढ़ तो फिर आनी है। और शासन-प्रशासन की इस मानसिकता को खाद पानी दे रहे हैं इस तरफ के यादव बहुल गांव। यादवों ने अपना लोक-परलोक सब कुछ लालू प्रसाद के हवाले कर दिया है। कबड़िया गांव के सुहाग यादव हों या शिक्षक तनुकलाल यादव, लालू उनके लिये सब कुछ हैं। उनके लिये ही नहीं उनसे बातचीत करते समय जो महिलाएं घास के पूले लेकर जा रही थीं, या घास काट रही थीं उन्होंने भी अपना काम-धाम रोक बस एक ही बात कही कि गांव का सारा वोट राजद को ही गिरेगा। बदहाली उनके लिये जैसे आत्म सम्मान बन गयी है। 15 को मतदान के दिन ड्यूटी पर जाने की तैयारी कर रहे तनुकलाल तो तुनक कर कहते हैं-बताइये क्या नहीं है? पंद्रह साल में लालू ने हमें सड़क दी, फोन दिया, बिजली दी, टीवी देखने के लिये केबिल दिया, और हमें क्या चाहिये। कैसा विकास? भरतलाल यादव पूछते हैं। लालू को काम ही कहां करने दिया गया, हमेशा एक पैर जेल में, गद्दी पर भी नहीं रहने दिया। यही सब कहना है गौंसाघाट के ग्रामीणों का भी। इसी मानसिकता के चलते यादव समुदाय का एकमुश्त वोट लालू के नाम। लेकिन इन्हीं गांवों में दलित सिर पर लोजपा की टोपी पहन कर खुले आम घूम रहे हैं, जाहिर है कि लालू के हाथ से इस समुदाय का वोट एकमुश्त तो नहीं पर काफी कुछ खिसक सकता है। इन गांवों में कुछ वोट कुम्हार और दास जाति के भी हैं लेकिन वे यादवों की दबंगई के आगे खामोश हैं। कई चुनावों से उनका वोट नहीं गिर रहा है। कुल मिला कर मिथिलांचल में आज यादव वही कर रहे हैं, जो कभी ब्राहमण समाज किया करता था कि पूरे गांव के वोट का अधिकार अपनी जेब में रखना। लेकिन इस बार का सबसे महत्वपूर्ण वोटर मुसलिम समुदाय भ्रमित दिख रहा है। लवाम, खड़वा और इस्लामपुर में बातचीत करने से यही अहसास हुआ कि भले ही सामने वाला वोट राजद को देने की बात कर रहा है, लेकिन उसके दिमाग में कोई और नाम भी घूम रहा है। यह स्पष्ट होता है शहर की मसजिद से जुमे की नमाज पढ़ कर बाहर निकलते लोगों से बातचीत करने के बाद। जो काफी सोच कर जवाब देते है- देखिये अभी कोई फैसला नहीं किया है, एक दो दिन में हो जाएगा। इस बार हमारे बीच राम विलास पासवान का नाम भी उठ रहा है। लेकिन ब्राहमण वोटर को तिनके का भी सहारा नहीं है। जबसे कांग्रेस का इस क्षेμा से सफाया हुआ है, वह अपने को लुटा-पिटा पा रहा है। इस बार उसकी निगाह मुसलमान वोट बैंक पर है कि अगर उसका झुकाव लोजपा की तरफ हो जाए तोराजद कमजोर पड़ जाएगा और राजग की पौबारह हो जाएगी। गोविंदपुर गांव की एक झोंपड़ी में कई सारे लोग बैठे हैं, वे सब और बाहर पान बीड़ी बेच रहा दुकानदार बहुत हिचकते हुए जुबान खोलते हैं कि राजग उम्मीदवार को वोट डालने की सोचे हैं। सब झा और चौधरी निकले। शाम को शहर के एक चौराहे पर कुछ स्थानीय पμाकारों से चर्चा होती है तो उनका यही कहना है कि दरभंगा मंडल की 30 में से 21 सीटें 2000 के चुनाव में राजद के हाथ लगी थीं, इस बार अगर मुसलमान और पासवान वोटर का रुझान कमोबेश लालू की तरफ ही रहा तो वही स्थिति रहेगी। दो-चार सीटों का फर्क कोई मायने नहीं रखता। सबसे बड़ी बात है कि बस, मिथिलांचल इसी तरह विकास को भूला रहे।
पटना को पटना ही क्यों नहीं बनाते प्यारे
राजीव मित्तल
पिछले तीन-चार चुनावों से नेताओं ने खास कर अपने-अपने क्षेμाों के राष्ट्रीय प्रत्याशियों ने एक चलन शुरू किया है कि बिहार के इस शहर को मुम्बई बना देंगे-दिल्ली बना देंगे, उसको लंदन बना देंगे, फलाने को पेरिस बना देंगे। शायद इस टोटकेबाजी से कुछ जीत भी गए, लेकिन कुछ नहीं बना, बल्कि जो बना हुआ था वह भी चौपट हो गया। हमारे एक आला नेता जार्ज फर्नांडीज ने इस बार से पहले के किसी संसदीय चुनाव के दौरान मुजफ्फरपुर की किसी सभा में ताल ठोकते हुए कहा था कि बस, अब मैं आ गया हूं, इस शहर का अंतरराष्ट्रीय जगत में बाजा बजेगा, यह कह कर वो मुजफ्फरपुर की सीट भी पा गये। पता चला कि पांच साल बाद शहर और बदसूरत हो गया है। सड़ांध कुछ इतनी तीखी उठने लगी कि जार्ज नाक पर रूमाल रख यहां से दूसरी सीट पर शिफ्ट कर गये। वहां पर भी उन्होंने यही कहा कि इसके आगे तो मुम्बई और दिल्ली भी पानी भरेंगे। उस क्षेμा का भी तिया-पांचा हो गया। इस बार फिर जार्ज मुजफ्फरपुर के सांसद हैं। पर इस बार उन्होंने मुजफ्फरपुर की मुजफ्फरपुरता कायम रखने का भी वायदा नहीं किया इसलिये वह किसी भी इल्जाम से बरी हैं।पिछले दिनों भाई राम जतन सिन्हा ने भी मुम्बई-दिल्ली का राग छेड़ दिया। इस बार क्योंकि वह पटना मध्य से उम्मीदवार हैं इसलिये जाहिर है उनके दिमाग में पटना ही रहा होगा और उसे मुम्बई-दिल्ली जैसा बनाने का विचार भी उनके दिमाग में हिलोरे खा रहा होगा। उस विचार को उन्होंने पहले तो अपने मुखारबिंद से बाहर निकाला और अब यह विचार बाकायदा परचे पर छाप कर मतदाताओं के घर-घर पहुंचाया जा रहा है। सवाल यह है कि पटना को जिन दो शहरों जैसा बनाने का यह आलौकिक विचार उनके दिमाग में दौड़ रहा है, खुद वह शहर कैसे हो गये हैं, इस पर भी तो उन्हें ध्यान देना चाहिये। उन दोनों शहरों की नारकीय समस्याओं के विस्तार में न जाकर सिन्हा जी से बस इतना कहने को मन कर रहा है कि वह पटना को पटना के दायरे में रख कर पटना ही क्यों नहीं रहने देते। कई साल पहले उनके ही एक बिरादर ने पटना की सड़कों को हेमामलिनी के गाल सरीखे बनाने का ऐलान किया था। बाद में वो तो अपने बयान से ही मुकर गये और पटना की सड़कों ने उनकी लाज रखते हुए हेमा के गालों को भूल मरहूम ललिता पवार सरीखे रूप से समझैता कर लिया।बहुत पहले जब टीवी नहीं हुआ करता था तो गर्मी की दुपहरिया काटने के लिये घरों के अंदर एक खेला जाता था उसका नाम था व्यापार। उसमें लुडो जैसे बोर्ड के चौखानों पर कई शहरों के नाम लिखे होते थे। बम्बई, दिल्ली, कलकत्ता, मद्रास, बेंगलौर, श्रीनगर, भोपाल, लखनऊ, अहमदाबाद, जमशेदपुर, रांची के साथ-साथ पटना भी। खेल के नियमों के अनुसार पटना की कीमत तीन हजार रुपये हुआ करती थी, जो किसी भी पांच महानगरों से एक-डेढ़ हजार रुपये कम थी। और उसके साथ जिन शहरों का जो जोड़ बैठता था, वह बड़ा लाभकारी होता था। इसलिये सब खिलाड़ियों की निगाह पटना को हासिल करने में लगी रहती थी। आज यही शहर अपने रेलवे स्टेशन से गुजरती किसी भी ट्रेन के याμाी को कंपकंपाता है, उसका जी धड़काता है, जो ईश्वर से मनाता है कि रेलगाड़ी पटना स्टेशन से ही नहीं बिहार से भी जितनी जल्दी हो बाहर हो जाए। सिन्हा जी, आप बस इतना करो कि रेलयाμिायों के मन से यह डर निकाल दो, समझ लो आपका इस शहर के मध्य से चुनाव लड़ना सार्थक हुआ। तभी काक भुशुण्डि ने गरुड को चौथी बार आवाज लगायी- अरे कितनी बार शौच जाएगा, पटना नहीं चलना है क्या!
पिछले तीन-चार चुनावों से नेताओं ने खास कर अपने-अपने क्षेμाों के राष्ट्रीय प्रत्याशियों ने एक चलन शुरू किया है कि बिहार के इस शहर को मुम्बई बना देंगे-दिल्ली बना देंगे, उसको लंदन बना देंगे, फलाने को पेरिस बना देंगे। शायद इस टोटकेबाजी से कुछ जीत भी गए, लेकिन कुछ नहीं बना, बल्कि जो बना हुआ था वह भी चौपट हो गया। हमारे एक आला नेता जार्ज फर्नांडीज ने इस बार से पहले के किसी संसदीय चुनाव के दौरान मुजफ्फरपुर की किसी सभा में ताल ठोकते हुए कहा था कि बस, अब मैं आ गया हूं, इस शहर का अंतरराष्ट्रीय जगत में बाजा बजेगा, यह कह कर वो मुजफ्फरपुर की सीट भी पा गये। पता चला कि पांच साल बाद शहर और बदसूरत हो गया है। सड़ांध कुछ इतनी तीखी उठने लगी कि जार्ज नाक पर रूमाल रख यहां से दूसरी सीट पर शिफ्ट कर गये। वहां पर भी उन्होंने यही कहा कि इसके आगे तो मुम्बई और दिल्ली भी पानी भरेंगे। उस क्षेμा का भी तिया-पांचा हो गया। इस बार फिर जार्ज मुजफ्फरपुर के सांसद हैं। पर इस बार उन्होंने मुजफ्फरपुर की मुजफ्फरपुरता कायम रखने का भी वायदा नहीं किया इसलिये वह किसी भी इल्जाम से बरी हैं।पिछले दिनों भाई राम जतन सिन्हा ने भी मुम्बई-दिल्ली का राग छेड़ दिया। इस बार क्योंकि वह पटना मध्य से उम्मीदवार हैं इसलिये जाहिर है उनके दिमाग में पटना ही रहा होगा और उसे मुम्बई-दिल्ली जैसा बनाने का विचार भी उनके दिमाग में हिलोरे खा रहा होगा। उस विचार को उन्होंने पहले तो अपने मुखारबिंद से बाहर निकाला और अब यह विचार बाकायदा परचे पर छाप कर मतदाताओं के घर-घर पहुंचाया जा रहा है। सवाल यह है कि पटना को जिन दो शहरों जैसा बनाने का यह आलौकिक विचार उनके दिमाग में दौड़ रहा है, खुद वह शहर कैसे हो गये हैं, इस पर भी तो उन्हें ध्यान देना चाहिये। उन दोनों शहरों की नारकीय समस्याओं के विस्तार में न जाकर सिन्हा जी से बस इतना कहने को मन कर रहा है कि वह पटना को पटना के दायरे में रख कर पटना ही क्यों नहीं रहने देते। कई साल पहले उनके ही एक बिरादर ने पटना की सड़कों को हेमामलिनी के गाल सरीखे बनाने का ऐलान किया था। बाद में वो तो अपने बयान से ही मुकर गये और पटना की सड़कों ने उनकी लाज रखते हुए हेमा के गालों को भूल मरहूम ललिता पवार सरीखे रूप से समझैता कर लिया।बहुत पहले जब टीवी नहीं हुआ करता था तो गर्मी की दुपहरिया काटने के लिये घरों के अंदर एक खेला जाता था उसका नाम था व्यापार। उसमें लुडो जैसे बोर्ड के चौखानों पर कई शहरों के नाम लिखे होते थे। बम्बई, दिल्ली, कलकत्ता, मद्रास, बेंगलौर, श्रीनगर, भोपाल, लखनऊ, अहमदाबाद, जमशेदपुर, रांची के साथ-साथ पटना भी। खेल के नियमों के अनुसार पटना की कीमत तीन हजार रुपये हुआ करती थी, जो किसी भी पांच महानगरों से एक-डेढ़ हजार रुपये कम थी। और उसके साथ जिन शहरों का जो जोड़ बैठता था, वह बड़ा लाभकारी होता था। इसलिये सब खिलाड़ियों की निगाह पटना को हासिल करने में लगी रहती थी। आज यही शहर अपने रेलवे स्टेशन से गुजरती किसी भी ट्रेन के याμाी को कंपकंपाता है, उसका जी धड़काता है, जो ईश्वर से मनाता है कि रेलगाड़ी पटना स्टेशन से ही नहीं बिहार से भी जितनी जल्दी हो बाहर हो जाए। सिन्हा जी, आप बस इतना करो कि रेलयाμिायों के मन से यह डर निकाल दो, समझ लो आपका इस शहर के मध्य से चुनाव लड़ना सार्थक हुआ। तभी काक भुशुण्डि ने गरुड को चौथी बार आवाज लगायी- अरे कितनी बार शौच जाएगा, पटना नहीं चलना है क्या!
ऐसे भी क्या हल्ले मचाना
राजीव मित्तल
जैसे नयी-नयी बहु घर के किसी भी मर्द के सामने पड़ जाने पर बिदक कर भागती है, उसी तरह उन्होंने पता नहीं ऐसा क्या कह दिया कि बहुएं पुरानी होते हुए भी बिदक ही नहीं रहीं, रार भी मचा रही हैं। काक भुशुंण्डि ने गरुड के डैनों पर अपनी चोंच फेरते हुए कहा कि वैसे तो चुनाव के समय कोई क्या बोलता है उसकी शुद्धता की जांच किसी भी लेबोरेटरी में नहीं हो सकती लेकिन पासवान ने तालाब में जो कंकड़ फेंका है उससे माहौल बड़ा रोमानी हो गया है। हमने यह किया-वो किया, यह करेंगे-वो करेंगे की चखचख से जरा हट कर पासवान के बोल देश की ऐतिहासिक और भौगोलिक सच्चाइयों की कड़वाहट से रुबरु कराते हंै। पंजाब में आतंकवाद के दिनों में पता नहीं कितने साल राष्ट्रपति शासन चला, क्योंकि उस समय उसकी ही जरूरत थी, बीच में बरनाला को आजमाया गया, लेकिन हालत और बदतर हो गये, लेकिन बेअंतसिंह की सरकार बनते ही आतंकवाद बेमौत मर गया। क्या बिहार की हालत उन दिनों के हालात से कम बुरी नहीं है! पंजाब का आतंकवाद तो बाहर से पोसा जा रहा था। हालांकि उसके लिये जैलसिंह-दरबारा सिंह का कई राउंड में चला दंगल भी काफी हद तक जिम्मेदार था, लेकिन बिहार तो अपने ही कारणों से आतंकवाद, उग्रवाद, रंगदारीवाद, ठेकेदारीवाद, दरिद्रतावाद, नेतावाद, जातिवाद और सरकारवाद का बरसों से मारा हुआ है। आठ सौ करोड़ रुपये फूंकने के बाद उसे मिर्गी का रोगी मान अगर चमड़ा सुंघाने की याद अब आ रही है तो ऐसी अक्कल दाढ़ के क्या कहने। वैसे μिाशंकू का कोई इलाज है भी नहीं। विश्वामिμा लाख कोशिश करने के बाद पल्ला झाड़ गये थे। लालू जी, नितीश जी, जेटली जी जब रोग बेकाबू हो रहा हो तो क्या किया जा सकता है? μिाशंकू की स्थिति में विधायकों की या तो नीलामी लगेगी, या पूरा दल ही नीलाम हो जाएगा, उस हालत में भी रोगी तो बिस्तर से उठ खड़ा होने से रहा, जब स्पेशलिस्ट कुछ नहीं कर पाया, तो अब जो फौज जुटेगी वो क्या कर लेगी। रोगी को ठीक करने के बजाये हर कोई रोग बढ़ने का दोष एक-दूसरे पर थोपता नजर आएगा, रोगी कराह नहीं चिंघाड़ रहा होगा और डाक्टरों में जूतम-पैजार चल रही होगी। राजा राम मोहन राय के वक्त जैसे बंगाल में कोई विधवा सिर्फ सती ही होती थी, तो अब तो जमाना कहां से कहां पहुंच गया है, अब सती होने की जरूरत नहीं, रंगीन साड़ी भी चलेगी, तो कुछ दिन घर की खिड़की खोल उससे बाहर का नजारा देखने में क्या हर्ज है। हो सकता बिहार कोमा से बाहर आ जाए और आप सबको फिर उसे कोमा में पहुंचाने का मौका हाथ लग जाए। श्री कृष्ण भी मौका पड़ने पर रणछोड़ कर भाग लिये थे और गोमांतक की पहाड़ियों पर अगले युद्ध की तैयारी में लगे रहे थे। कुछ तो सबक जिन्हें भगवान मानते हो उनसे भी लो, क्यों मैं कुछ गलत तो नहीं कह रहा हूं गरुड? पर गरुड इतनी चैन की नींद में था कि जैसे बिहार में राष्ट्रपति शासन लग ही गया हो।
जैसे नयी-नयी बहु घर के किसी भी मर्द के सामने पड़ जाने पर बिदक कर भागती है, उसी तरह उन्होंने पता नहीं ऐसा क्या कह दिया कि बहुएं पुरानी होते हुए भी बिदक ही नहीं रहीं, रार भी मचा रही हैं। काक भुशुंण्डि ने गरुड के डैनों पर अपनी चोंच फेरते हुए कहा कि वैसे तो चुनाव के समय कोई क्या बोलता है उसकी शुद्धता की जांच किसी भी लेबोरेटरी में नहीं हो सकती लेकिन पासवान ने तालाब में जो कंकड़ फेंका है उससे माहौल बड़ा रोमानी हो गया है। हमने यह किया-वो किया, यह करेंगे-वो करेंगे की चखचख से जरा हट कर पासवान के बोल देश की ऐतिहासिक और भौगोलिक सच्चाइयों की कड़वाहट से रुबरु कराते हंै। पंजाब में आतंकवाद के दिनों में पता नहीं कितने साल राष्ट्रपति शासन चला, क्योंकि उस समय उसकी ही जरूरत थी, बीच में बरनाला को आजमाया गया, लेकिन हालत और बदतर हो गये, लेकिन बेअंतसिंह की सरकार बनते ही आतंकवाद बेमौत मर गया। क्या बिहार की हालत उन दिनों के हालात से कम बुरी नहीं है! पंजाब का आतंकवाद तो बाहर से पोसा जा रहा था। हालांकि उसके लिये जैलसिंह-दरबारा सिंह का कई राउंड में चला दंगल भी काफी हद तक जिम्मेदार था, लेकिन बिहार तो अपने ही कारणों से आतंकवाद, उग्रवाद, रंगदारीवाद, ठेकेदारीवाद, दरिद्रतावाद, नेतावाद, जातिवाद और सरकारवाद का बरसों से मारा हुआ है। आठ सौ करोड़ रुपये फूंकने के बाद उसे मिर्गी का रोगी मान अगर चमड़ा सुंघाने की याद अब आ रही है तो ऐसी अक्कल दाढ़ के क्या कहने। वैसे μिाशंकू का कोई इलाज है भी नहीं। विश्वामिμा लाख कोशिश करने के बाद पल्ला झाड़ गये थे। लालू जी, नितीश जी, जेटली जी जब रोग बेकाबू हो रहा हो तो क्या किया जा सकता है? μिाशंकू की स्थिति में विधायकों की या तो नीलामी लगेगी, या पूरा दल ही नीलाम हो जाएगा, उस हालत में भी रोगी तो बिस्तर से उठ खड़ा होने से रहा, जब स्पेशलिस्ट कुछ नहीं कर पाया, तो अब जो फौज जुटेगी वो क्या कर लेगी। रोगी को ठीक करने के बजाये हर कोई रोग बढ़ने का दोष एक-दूसरे पर थोपता नजर आएगा, रोगी कराह नहीं चिंघाड़ रहा होगा और डाक्टरों में जूतम-पैजार चल रही होगी। राजा राम मोहन राय के वक्त जैसे बंगाल में कोई विधवा सिर्फ सती ही होती थी, तो अब तो जमाना कहां से कहां पहुंच गया है, अब सती होने की जरूरत नहीं, रंगीन साड़ी भी चलेगी, तो कुछ दिन घर की खिड़की खोल उससे बाहर का नजारा देखने में क्या हर्ज है। हो सकता बिहार कोमा से बाहर आ जाए और आप सबको फिर उसे कोमा में पहुंचाने का मौका हाथ लग जाए। श्री कृष्ण भी मौका पड़ने पर रणछोड़ कर भाग लिये थे और गोमांतक की पहाड़ियों पर अगले युद्ध की तैयारी में लगे रहे थे। कुछ तो सबक जिन्हें भगवान मानते हो उनसे भी लो, क्यों मैं कुछ गलत तो नहीं कह रहा हूं गरुड? पर गरुड इतनी चैन की नींद में था कि जैसे बिहार में राष्ट्रपति शासन लग ही गया हो।
नदियों पर बांध यानी आ सांड़ मुझे मार
राजीव मित्तल
इस चुनाव में बांध कोई मुद्दा नहीं है, उसी तरह जैसे विकास से जुड़ा कोई भी मुद्दा किसी शाख पे लटका सूख रहा होगा। हालांकि बोलने को सब बोल रहे हैं कि हमें इस बार अगर सत्ता सुख ( यह एक ऐसी भावना है जिसे व्यक्त करते हर किसी को लाज लगती है )भोगने को मिला तो विकास को बिस्तरबंद में लपेट कर लाएंगे। हर चुनाव के बाद बिस्तरबंद खुलते हैं। उसमें चादर-तकिया तो निकलता है पर विकास को किसी डिब्बे में डाल किसी मालगाड़ी में बुक करा दिया जाता है और उस मालगाड़ी का इंजन अपने प्रस्थान करने वाली जगह पर ही शंटिंग करता रहता है। इस तरह विकास के न जाने कितने पार्सल उसी मालगाड़ी के जर्रे-जर्रे में लदे हैं, जिसका इंजन बरसों से शंटिंग कर रहा है। यहां बांध की बात करना थोड़ा इसलिये जरूरी हो गया है क्योंकि बिहार के लाखों लोगों के लिये बांध और नदी की लड़ाई या नूरां-कुश्ती देखना मजबूरी बन गया है। यह कहना कि सांड़ लाल कपड़े से भड़कता है, आधा सच है। वह तो हर उकसाने वाली हरकत से भड़कता है। ठीक वही हाल बिहार की नदियों का है, जो अपने किनारों पर मिट्टी के लौंदे के तरह पड़े बांधों को देख कर बेकाबू हो जाती हैं। किसी भी बरसात में नदियों को फलता-फूलता देख बांध की तख्ती लगाये कोई भी टीला विश्वामिμा बन डोलने लगता है। पर मेनका बनीं नदियां पूरी निष्ठा के साथ अपना काम करती हैं और हजारों एकड़ खेत, हजारों मकान-झोंपड़े अपने दामन में लपेट कर नाला बन जाती हैं। इधर, थर-थर कांपते बांध नदियों की उजाड़ी दुनिया को ‘हमीं ने दर्द दिया हमीं दवा देंगे’ गाते हुई बसाने में लग जाते हैं और बन जाते हैं केयर ऑफ फलाना या ढिमाका टीला। इन बांधों पर हुई बसावट एक ऐसी दुनिया बन जाती है, जिसका काम केवल सांस लेना और सांस छोड़ना है। मरने पर कोई संताप नहीं और जन्मने पर किसी ढोलक पे थाप नहीं। हर छोटे-बड़े शहर में ऐसी बस्तियों की भरमार होती है, जो शहर के चेहरे को बदरंग बनाती हंै पर उन बस्तियों के इंसान किसी नागरिक अधिकार से महरूम नहीं रहते। चाहे वे उसे झपट कर लें या छीन कर। वे वोट भी देते हैं, जब उनकी बस्ती तोड़ी जा रही होती है तो टीन-टप्पर वाले कमरे की जगह पक्की छत वाला मकान वसूलते हैं, उनके पास लाल-हरा-नीला-पीला राशनकार्ड भी होता है, उनके बच्चे स्कूल जाते हैं। उन बस्तियों में स्वंयसेवी संस्थाओं के भी चक्कर लगते रहते हैं और चुनाव-बेचुनाव नेता-मंμाी भी पिकनिक मनाने वहां चले जाते हैं। यह सब इसलिये क्योंकि वह बस्ती एक वोट बैंक भी होती है। लेकिन बिहार के बांधों पर पड़े जीवों को कोई पूछने वाला नहीं। चाहे बाढ़ 1979 की हो या 1987 की या 2004 की या इससे पहले के या इन बीच के सालों में किसी भी सन् की, उनकी जमीन, उनके खेत, उनके मकान नदी डकार चुकी होती है और बाकी जिंदगी काटने को बचता है वही बांध, जिसने उनकी दुनिया ही उजाड़ कर रख दी है। नेता, जो किसी चुनाव में भगवान का छप्पर फटने से विधायक बन गया है, हर बाढ़ में हवा में आता है और हवा में ही चला जाता है जैसे बड़ा मनभावन नजारा देखने आया हो। आम दिनों में और चुनाव के खास दिनों में भी उसे बांध के उस जीव से कोई मतलब नहीं रह जाता जो अब एक जन्तु में तब्दील हो चुका होता है। फरवरी आधी बीत चुकी है, बरसात के पांच महीने बाकी बचे हैं। अब देखना है कि इन बांधों की जिंदगी से कच्ची डोर की तरह जुड़ा कोई नेता या विधायक इस बारिश में उठ रहे क्रंदन में कौन सा संगीत तलाशता है।
इस चुनाव में बांध कोई मुद्दा नहीं है, उसी तरह जैसे विकास से जुड़ा कोई भी मुद्दा किसी शाख पे लटका सूख रहा होगा। हालांकि बोलने को सब बोल रहे हैं कि हमें इस बार अगर सत्ता सुख ( यह एक ऐसी भावना है जिसे व्यक्त करते हर किसी को लाज लगती है )भोगने को मिला तो विकास को बिस्तरबंद में लपेट कर लाएंगे। हर चुनाव के बाद बिस्तरबंद खुलते हैं। उसमें चादर-तकिया तो निकलता है पर विकास को किसी डिब्बे में डाल किसी मालगाड़ी में बुक करा दिया जाता है और उस मालगाड़ी का इंजन अपने प्रस्थान करने वाली जगह पर ही शंटिंग करता रहता है। इस तरह विकास के न जाने कितने पार्सल उसी मालगाड़ी के जर्रे-जर्रे में लदे हैं, जिसका इंजन बरसों से शंटिंग कर रहा है। यहां बांध की बात करना थोड़ा इसलिये जरूरी हो गया है क्योंकि बिहार के लाखों लोगों के लिये बांध और नदी की लड़ाई या नूरां-कुश्ती देखना मजबूरी बन गया है। यह कहना कि सांड़ लाल कपड़े से भड़कता है, आधा सच है। वह तो हर उकसाने वाली हरकत से भड़कता है। ठीक वही हाल बिहार की नदियों का है, जो अपने किनारों पर मिट्टी के लौंदे के तरह पड़े बांधों को देख कर बेकाबू हो जाती हैं। किसी भी बरसात में नदियों को फलता-फूलता देख बांध की तख्ती लगाये कोई भी टीला विश्वामिμा बन डोलने लगता है। पर मेनका बनीं नदियां पूरी निष्ठा के साथ अपना काम करती हैं और हजारों एकड़ खेत, हजारों मकान-झोंपड़े अपने दामन में लपेट कर नाला बन जाती हैं। इधर, थर-थर कांपते बांध नदियों की उजाड़ी दुनिया को ‘हमीं ने दर्द दिया हमीं दवा देंगे’ गाते हुई बसाने में लग जाते हैं और बन जाते हैं केयर ऑफ फलाना या ढिमाका टीला। इन बांधों पर हुई बसावट एक ऐसी दुनिया बन जाती है, जिसका काम केवल सांस लेना और सांस छोड़ना है। मरने पर कोई संताप नहीं और जन्मने पर किसी ढोलक पे थाप नहीं। हर छोटे-बड़े शहर में ऐसी बस्तियों की भरमार होती है, जो शहर के चेहरे को बदरंग बनाती हंै पर उन बस्तियों के इंसान किसी नागरिक अधिकार से महरूम नहीं रहते। चाहे वे उसे झपट कर लें या छीन कर। वे वोट भी देते हैं, जब उनकी बस्ती तोड़ी जा रही होती है तो टीन-टप्पर वाले कमरे की जगह पक्की छत वाला मकान वसूलते हैं, उनके पास लाल-हरा-नीला-पीला राशनकार्ड भी होता है, उनके बच्चे स्कूल जाते हैं। उन बस्तियों में स्वंयसेवी संस्थाओं के भी चक्कर लगते रहते हैं और चुनाव-बेचुनाव नेता-मंμाी भी पिकनिक मनाने वहां चले जाते हैं। यह सब इसलिये क्योंकि वह बस्ती एक वोट बैंक भी होती है। लेकिन बिहार के बांधों पर पड़े जीवों को कोई पूछने वाला नहीं। चाहे बाढ़ 1979 की हो या 1987 की या 2004 की या इससे पहले के या इन बीच के सालों में किसी भी सन् की, उनकी जमीन, उनके खेत, उनके मकान नदी डकार चुकी होती है और बाकी जिंदगी काटने को बचता है वही बांध, जिसने उनकी दुनिया ही उजाड़ कर रख दी है। नेता, जो किसी चुनाव में भगवान का छप्पर फटने से विधायक बन गया है, हर बाढ़ में हवा में आता है और हवा में ही चला जाता है जैसे बड़ा मनभावन नजारा देखने आया हो। आम दिनों में और चुनाव के खास दिनों में भी उसे बांध के उस जीव से कोई मतलब नहीं रह जाता जो अब एक जन्तु में तब्दील हो चुका होता है। फरवरी आधी बीत चुकी है, बरसात के पांच महीने बाकी बचे हैं। अब देखना है कि इन बांधों की जिंदगी से कच्ची डोर की तरह जुड़ा कोई नेता या विधायक इस बारिश में उठ रहे क्रंदन में कौन सा संगीत तलाशता है।
चूं-चूं करती आयी चिड़िया
राजीव मित्तल
चिड़िया और रेलगाड़ी का इंजन अक्सर एक ही सी अठखेलियां करते हैं। चिड़िया दाल का दाना देख कर किसी के आंगन में पेड़ से उतरती है और रेलगाड़ी का इंजन किसी स्टेशन को देख कर वहां रुकता है। बीच में कहीं सिग्नल न मिलने पर ठहर जाना तो तफरीह में गिना जाएगा न! लेकिन यहां मुद्दा यह है कि चिड़िया को उड़ने के लिये किसी पटरी की जरूरत नहीं पड़ती। पंख फैलाए और हवा में। लेकिन रेलगाड़ी के इंजन के साथ एक दिक्कत है कि जब तक अगल-बगल बिछी लोहे की दो पटरियां न हों, बेजान सा खड़ा रहता है बेचारा। सड़क पर भी नहीं दौड़ सकता। उत्तर बिहार में हर जगह चिड़िया उड़ भी रही हैं और आंगन में उतर कर दाल का दाना भी चुग रही हैं लेकिन इंजन बेचारा क्या करे, उसकी छाती पर तो रेल मंμाालय का मय नेताओं और अफसरान के एक ऐसा गट्ठर सवार है कि बेचारे की सांस तक बंद पड़ी है। वैसे हाल इतने बुरे भी नहीं है। हर बार कोई न कोई रेलमंμाी उसकी नब्ज अपने हाथ में लेता है और कहता है-चलेगा, जरूर चलेगा। अभी कोमा में है, 2007 तक या उससे पहले भी या उसके बाद किसी भी साल इसकी सांस चलने लगेगी। उसकी सांस चलने की आस लगाए एक के आगे न जाने कितने शून्यों के जोड़ वाली जनता अपने शहर, या अपने गांव के उस भवन या टप्पर को निहार रही है, जिसे आधुनिक भाषा में रेलवे स्टेशन कहा जाता है। सब पर कोई न कोई तख्ती लटकी है, जिस पर सुनहरे शब्दों में लिखा है-श्री..जी के कर कमलों से 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में या 21 सदी के पूवार्ध (2005 से पहले) में इसका शिलान्यास हुआ। उत्साहित जन शिलान्यास होते ही स्वंयरोजगार को प्रोत्साहन देते हुए चाय की गुमटी तक डाल कर बैठ गये कि बस अब पटरी बिछीं और अब हुआ इलाका रौनकदार। रौनक का तो पता नहीं लेकिन जिस पत्थर पर उस महान इंसान का नाम सुनहरे अक्षरों में कुरेदा गया था, उस पर जरूर समय की मार पड़ चुकी होती है। उदाहरण के लिये शहीद जुब्बा सहनी स्टेशन न जाने कितने स्टेशनों की तरह बना पड़ा है पर वहां रेलगाड़ी तो क्या, बैलगाड़ी भी खड़ी नहीं होती। इसके पीछे उस शख्स की भी ज्यादा गल्ती नहीं, जिसने चांदी के खोंचे से शिलान्यास वाली जगह पर गुलाबजल मिले सीमेंट से आधारशिला रखी थी और गल्ती उन महानुभावों की भी नहीं, जो पटरी बिछाने वाले ठेकेदारों से रंगदारी वसूलते हैं और ठेकेदार पटरी बिछाने के लिये खोदी गयी मिट्टी ट्रकों में भरवा कर कोई श्मशानघाट या कब्रिस्तान बनवा देते हैं। मिट्टी तो खराब नहीं हुई न! भई, जैसे ठेकेदारी वैसे ही रंगदारी-दोनों ही इस धरती पर नाम रौशन करने आए हैं तो काम अधूरा तो छोड़ने वाले हैं नहीं। फिर उनका भी तो परिवार है और उन सबका पेट पालना उनका कर्तव्य है। शिलान्यास कोई उनसे पूछ कर तो हुआ नहीं था और हो गया तो जिसने किया चिंता उसे होनी चाहिये। इसलिये चाहे मुजफ्फरपुर से सीतामढ़ी के बीच की लोहे की पटरियां हों, जो परियोजना के तहत केवल 54 किलोमीटर लम्बी होनी चाहिये। अब नारा लगाइये-एक साल में एक किलोमीटर। तो साहब, कितने साल में पूरी हुई यह परियोजना! उसका आधा, उसका भी आधा-अब इतना समय तो एक परियोजना को देना ही पड़ेगा न! ऐसी परियोजनाएं जब तक दो-चार चुनाव और इतने ही मंμाी न देख लें उनका मन नहीं भरता। उत्तर बिहार में इसके अलावा और भी कई परि-परि योजनाएं हैं जिन पर काम चल रहा है। उन्हें मंμाालय भी देख रहा है, अफसर भी, ठेकेदार भी, नेता भी, विधायक भी और रंगदार भी। जब इतने लोग देखने वाले हों तो कभी न कभी तो रेलगाड़ी का इंजन पटरी पर दौड़ेगा ही। बस, हर स्टेशन को पेशेंस के साथ इंतजार करते रहना चाहिये चूं-चूं करती आयी चिड़िया का। यही पेशेंस ही तो इस देश का प्राचीन गौरव है-काक भुशुंण्डि ने गरुड की तान के साथ ठेका लगाया।
चिड़िया और रेलगाड़ी का इंजन अक्सर एक ही सी अठखेलियां करते हैं। चिड़िया दाल का दाना देख कर किसी के आंगन में पेड़ से उतरती है और रेलगाड़ी का इंजन किसी स्टेशन को देख कर वहां रुकता है। बीच में कहीं सिग्नल न मिलने पर ठहर जाना तो तफरीह में गिना जाएगा न! लेकिन यहां मुद्दा यह है कि चिड़िया को उड़ने के लिये किसी पटरी की जरूरत नहीं पड़ती। पंख फैलाए और हवा में। लेकिन रेलगाड़ी के इंजन के साथ एक दिक्कत है कि जब तक अगल-बगल बिछी लोहे की दो पटरियां न हों, बेजान सा खड़ा रहता है बेचारा। सड़क पर भी नहीं दौड़ सकता। उत्तर बिहार में हर जगह चिड़िया उड़ भी रही हैं और आंगन में उतर कर दाल का दाना भी चुग रही हैं लेकिन इंजन बेचारा क्या करे, उसकी छाती पर तो रेल मंμाालय का मय नेताओं और अफसरान के एक ऐसा गट्ठर सवार है कि बेचारे की सांस तक बंद पड़ी है। वैसे हाल इतने बुरे भी नहीं है। हर बार कोई न कोई रेलमंμाी उसकी नब्ज अपने हाथ में लेता है और कहता है-चलेगा, जरूर चलेगा। अभी कोमा में है, 2007 तक या उससे पहले भी या उसके बाद किसी भी साल इसकी सांस चलने लगेगी। उसकी सांस चलने की आस लगाए एक के आगे न जाने कितने शून्यों के जोड़ वाली जनता अपने शहर, या अपने गांव के उस भवन या टप्पर को निहार रही है, जिसे आधुनिक भाषा में रेलवे स्टेशन कहा जाता है। सब पर कोई न कोई तख्ती लटकी है, जिस पर सुनहरे शब्दों में लिखा है-श्री..जी के कर कमलों से 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में या 21 सदी के पूवार्ध (2005 से पहले) में इसका शिलान्यास हुआ। उत्साहित जन शिलान्यास होते ही स्वंयरोजगार को प्रोत्साहन देते हुए चाय की गुमटी तक डाल कर बैठ गये कि बस अब पटरी बिछीं और अब हुआ इलाका रौनकदार। रौनक का तो पता नहीं लेकिन जिस पत्थर पर उस महान इंसान का नाम सुनहरे अक्षरों में कुरेदा गया था, उस पर जरूर समय की मार पड़ चुकी होती है। उदाहरण के लिये शहीद जुब्बा सहनी स्टेशन न जाने कितने स्टेशनों की तरह बना पड़ा है पर वहां रेलगाड़ी तो क्या, बैलगाड़ी भी खड़ी नहीं होती। इसके पीछे उस शख्स की भी ज्यादा गल्ती नहीं, जिसने चांदी के खोंचे से शिलान्यास वाली जगह पर गुलाबजल मिले सीमेंट से आधारशिला रखी थी और गल्ती उन महानुभावों की भी नहीं, जो पटरी बिछाने वाले ठेकेदारों से रंगदारी वसूलते हैं और ठेकेदार पटरी बिछाने के लिये खोदी गयी मिट्टी ट्रकों में भरवा कर कोई श्मशानघाट या कब्रिस्तान बनवा देते हैं। मिट्टी तो खराब नहीं हुई न! भई, जैसे ठेकेदारी वैसे ही रंगदारी-दोनों ही इस धरती पर नाम रौशन करने आए हैं तो काम अधूरा तो छोड़ने वाले हैं नहीं। फिर उनका भी तो परिवार है और उन सबका पेट पालना उनका कर्तव्य है। शिलान्यास कोई उनसे पूछ कर तो हुआ नहीं था और हो गया तो जिसने किया चिंता उसे होनी चाहिये। इसलिये चाहे मुजफ्फरपुर से सीतामढ़ी के बीच की लोहे की पटरियां हों, जो परियोजना के तहत केवल 54 किलोमीटर लम्बी होनी चाहिये। अब नारा लगाइये-एक साल में एक किलोमीटर। तो साहब, कितने साल में पूरी हुई यह परियोजना! उसका आधा, उसका भी आधा-अब इतना समय तो एक परियोजना को देना ही पड़ेगा न! ऐसी परियोजनाएं जब तक दो-चार चुनाव और इतने ही मंμाी न देख लें उनका मन नहीं भरता। उत्तर बिहार में इसके अलावा और भी कई परि-परि योजनाएं हैं जिन पर काम चल रहा है। उन्हें मंμाालय भी देख रहा है, अफसर भी, ठेकेदार भी, नेता भी, विधायक भी और रंगदार भी। जब इतने लोग देखने वाले हों तो कभी न कभी तो रेलगाड़ी का इंजन पटरी पर दौड़ेगा ही। बस, हर स्टेशन को पेशेंस के साथ इंतजार करते रहना चाहिये चूं-चूं करती आयी चिड़िया का। यही पेशेंस ही तो इस देश का प्राचीन गौरव है-काक भुशुंण्डि ने गरुड की तान के साथ ठेका लगाया।
वाटरलू में बिहारी राजनीति के नेपोलियन
बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण का मतदान इतनी शांति से निपट गया कि सब सनाका खाये बैठे हैं कि बुद्ध और महावीर की धरती पर यह क्या हो गया। खैर, अब जबसे हंग की आशंका बढ़ी है तबसे दावे भी उसी तेजी से बढ़े हैं और कहीं-कहीं तो वाटरलू का इस्तेमाल भी हुआ है। आप पूछेंगे कि यह वाटरलू क्या बला है तो वाटरलू हमारी राजनीति का एक भावनाप्रधान शब्द है, जो किसी पराजय का प्रतीक है। किसी जमाने में हमारे ऋषि-मुनि वक्त-बेवक्त किसी के भी दरवाजे पर पहुंच कर डोरबेल बजाना शुरू कर दिया करते थे और थोड़ा देर से खुलने पर अगले को देखते ही उनके मुंह से यही निकलता-तू नरक का वासी हो। इस तरह की शब्दावली के लिये दुर्वासा मुनि तो विश्वविख्यात थे। वह भले चंगे इंसान को-चाहे वह औरत हो या मर्द-नरक में भेजने के बजाय क्षण भर में पत्थर का डला बना दिया करते थे। तो इस वासंती मौसम में वाटरलू वाला श्राप भी फिजां में गुंजाएमान है, जो किसी अमराई से लेकर शहर की गलियों तक में कूका जा रहा है। वैसे वाटरलू उस जगह का नाम है जहां नेपोलियन ने अपनी आखिरी लड़ाई हारी थी। वह ब्रितानी फौजों के हाथों कैद हुआ और कैद में ही चल बसा। वह तो चला गया लेकिन हमारे नेताओं को वाटरलू का रास्ता दिखा गया, जहां वे अक्सर एक-दूसरे को पहुंचाया करते हैं। कल्पना कीजिये कि तीसरे और अंतिम चरण के मतदान के बाद वे तीनों वाटरलू पहुंच जाते हैं। एक के हाथ में तीर है, पर धनुष नहीं, एक के हाथ में लालटेन है तो किरासन नहीं और एक के हाथ में प्लास्टर ऑफ पेरिस का बना फिल्मी झोंपड़ी सा मकान है, पर छप्पर नहीं। तीनों के पास एक-दूसरे को कोसने के लिये मन में गुबार भरा है पर बोल कुछ नहीं रहे क्योंकि तीनों ने ही एक-दूसरे के लिये यही कहा था कि अबकी बार का चुनाव उसके लिये वाटरलू साबित होगा। जरा समतल सी जमीन देख उस पर वो झोंपड़ी रख दी गयी, उसी में कहीं लालटेन टांग दी गयी और बगैर धनुष का तीर दांत खोदने के काम आने लगा। झोंपड़ी वाले सज्जन ने बगल वाले से कहा-बगैर किरासन के ही चल दिये! क्या सोच के चले थे कि यहां मिट्टी के तेल का भंडार मिलेगा! देखिये, हमारे मुंह न लगें, हम तो इसे पानी भर कर जला लेंगे, आप क्या सोच कर यह नमूना उठा लाए कि सिर पर छप्पर तक नहीं है। इन्हें देखिये, खाली तीर लेकर निकल पड़े जैसे सुदर्शन चक्र हो। तीसरे के मुंह से कोई करारा जवाब निकलता कि शोरगुल सुन नेपोलियन साहब वहां तलवार घुमाते आ गये और आते ही बरस पड़े तीनों पर-भारतीय राजनीति की ही उपज हो न तुम लोग! अक्सर कोई न कोई आता रहता है वहां से। वाटरलू से तुम लोगों को इतना लगाव क्यों है? अरे कहीं और जाओ न! तुम्हारे देश में भी तो पानीपत जैसी कई जगह हैं, जहां विदेशी आक्रमणकारी तुम लोगों की मिट्टी पलीद किया करते थे। तुम लोगों को अपने देश से इतनी दूर बेल्जियम की यही जगह क्यों याद आती है? अब तीनों यहां से निकल लो नहीं तो खैर नहीं। अचानक बाहर से नारे लगा रही भीड़ में कोई चिल्लाया- हमारा नेता कैसा हो! कानों में यह शोर पड़ते ही तीनों हड़बड़ा कर उठे तो पाया कि अपने ही घर में विराजमान हैं और अभी 23 फरवरी का मतदान बाकी है।
एक कलंक का कलंकित जाप
राजीव मित्तल
गरुड ने जैसे ही पूछा कि गोधरा गुजरात में है या बिहार में, काक भुशुण्डि ने खेंच कर उस पर अपनी खड़ाऊं दे मारी और दहाड़े-चोप्प, अगर गोधरा का गो भी तेरे मुंह से निकला तो जुबान बाहर कर दूंगा। गोधरा न हो गया जैसे सत्ताई अमरत्व का कोई मंμा हाथ लग गया है। धर्मनिरपेक्षता उनकी थाती हो सकती है बपौती नहीं। इस देश में केवल वही धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं, करोड़ों भारतीयों के लिये भी गुजरात के दंगे किसी कलंक से कम नहीं, पर खाते-पीते, हगते-मूतते उन के दिमाग पर यह शब्द किसी मंμा की तरह सवार नहीं है। जब कहने या करने को कुछ न हो तो किसी दल के सिर पर मंदिर-मंदिर मंडराता है, तो किसी पर विदेशी-विदेशी, किसी पर देशी-देशी तो किसी पर गोधरा-गोेधरा। शरीर 21 वीं सदी में पहुंच गया है पर दिमाग उसी 19वीं सदी में धरा है तो ऐसे असंतुलन में क्या खाक कोई कुछ कर पाएगा। गोधरा के अलावा जमाने में और भी गम हैं प्यारे। निगाह तो उठाओ, गोधरा से तो बाहर निकलो। सारा बिहार लुंज-पुंज हुआ पड़ा है, चाहे मध्य हो या पूर्व, दक्षिण हो या पश्चिम, चम्पारण हो या मिथिलांचल, कहीं भी स्फूर्ति नहीं है, खुशहाली नहीं है। इस बदहाली में सब को बस एक चीज याद है और वो है जाति।
आपने पिछड़ों को जुबान दी, उन्हें उनका हक दिया, वोट डालने की हिम्मत दी, लेकिन साथ ही उन्हें जाति का थोथा अभिमान थमा कर उन्हें आत्मसम्मान से वंचित भी तो कर दिया। उनकी रिहायश कैसी है, उनकी सुरक्षा के क्या हाल हैं, उनकी रोजी-रोटी कैसी चल रही है, उनके बच्चों की शिक्षा कैसी चल रही है, उनके घर की औरत की इज्जत-आबरू की क्या कीमत है-इस बारे में कौन जवाब देगा? इस राज्य का हर महकमा टाट के पैबंद लगाये चल रहा है-क्यों? जैसे अरबपति जिंदा रहने के लिये सोने के कौर नहीं खाता वैसे ही धर्मनिरपेक्षता या राम मंदिर के जाप से दुनिया का कामकाज नहीं चलता। उस गुजराती के माथे पर एक कलंक है तो सिर पर सेहरा बांधने को भी बहुत कुछ है। एक ही दिन में पांच खरब पंद्रह अरब का निवेश केवल माला जपने से नहीं हो सकता। चाहे माला तुलसी की हो या गोधरा की। उसके लिये पहले अपना घर ठीक करना पड़ता है तब हम दूसरे को आमंμिात कर पाने की हिम्मत जुटा पाते हैं। आपके या आपके पूर्ववती कितने सत्ताधिारियों ने उस गोधरा के कलंकी की सी प्रशासनिक क्षमता दिखायी? भूकम्प की मार से बदहाल गुजरात को संभलने में कितने साल लगे? आपको तो हाय झारखंड से ही फुरसत नहीं। दस साल रहा तो था आपके पास, कौन से तारे तोड़ लिये? आप तो अपने ही यहां के उद्योगपतियों, अपने ही राज्य के देश-दुनिया में डंका बजा रहे आला दिमागों को घरबार छोड़ कर भागने से न तो पहले रोक पाए, न अब रोक पा रहे हैं तो उस कलंक का जापा क्यों? काक जी, बस कीजिये, पांच साल और मांग रहे हैं वह। अरे मूरख वो भी मैं ही दूंगा क्या, उसके लिये बिहार की जनता जाने।
गरुड ने जैसे ही पूछा कि गोधरा गुजरात में है या बिहार में, काक भुशुण्डि ने खेंच कर उस पर अपनी खड़ाऊं दे मारी और दहाड़े-चोप्प, अगर गोधरा का गो भी तेरे मुंह से निकला तो जुबान बाहर कर दूंगा। गोधरा न हो गया जैसे सत्ताई अमरत्व का कोई मंμा हाथ लग गया है। धर्मनिरपेक्षता उनकी थाती हो सकती है बपौती नहीं। इस देश में केवल वही धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं, करोड़ों भारतीयों के लिये भी गुजरात के दंगे किसी कलंक से कम नहीं, पर खाते-पीते, हगते-मूतते उन के दिमाग पर यह शब्द किसी मंμा की तरह सवार नहीं है। जब कहने या करने को कुछ न हो तो किसी दल के सिर पर मंदिर-मंदिर मंडराता है, तो किसी पर विदेशी-विदेशी, किसी पर देशी-देशी तो किसी पर गोधरा-गोेधरा। शरीर 21 वीं सदी में पहुंच गया है पर दिमाग उसी 19वीं सदी में धरा है तो ऐसे असंतुलन में क्या खाक कोई कुछ कर पाएगा। गोधरा के अलावा जमाने में और भी गम हैं प्यारे। निगाह तो उठाओ, गोधरा से तो बाहर निकलो। सारा बिहार लुंज-पुंज हुआ पड़ा है, चाहे मध्य हो या पूर्व, दक्षिण हो या पश्चिम, चम्पारण हो या मिथिलांचल, कहीं भी स्फूर्ति नहीं है, खुशहाली नहीं है। इस बदहाली में सब को बस एक चीज याद है और वो है जाति।
आपने पिछड़ों को जुबान दी, उन्हें उनका हक दिया, वोट डालने की हिम्मत दी, लेकिन साथ ही उन्हें जाति का थोथा अभिमान थमा कर उन्हें आत्मसम्मान से वंचित भी तो कर दिया। उनकी रिहायश कैसी है, उनकी सुरक्षा के क्या हाल हैं, उनकी रोजी-रोटी कैसी चल रही है, उनके बच्चों की शिक्षा कैसी चल रही है, उनके घर की औरत की इज्जत-आबरू की क्या कीमत है-इस बारे में कौन जवाब देगा? इस राज्य का हर महकमा टाट के पैबंद लगाये चल रहा है-क्यों? जैसे अरबपति जिंदा रहने के लिये सोने के कौर नहीं खाता वैसे ही धर्मनिरपेक्षता या राम मंदिर के जाप से दुनिया का कामकाज नहीं चलता। उस गुजराती के माथे पर एक कलंक है तो सिर पर सेहरा बांधने को भी बहुत कुछ है। एक ही दिन में पांच खरब पंद्रह अरब का निवेश केवल माला जपने से नहीं हो सकता। चाहे माला तुलसी की हो या गोधरा की। उसके लिये पहले अपना घर ठीक करना पड़ता है तब हम दूसरे को आमंμिात कर पाने की हिम्मत जुटा पाते हैं। आपके या आपके पूर्ववती कितने सत्ताधिारियों ने उस गोधरा के कलंकी की सी प्रशासनिक क्षमता दिखायी? भूकम्प की मार से बदहाल गुजरात को संभलने में कितने साल लगे? आपको तो हाय झारखंड से ही फुरसत नहीं। दस साल रहा तो था आपके पास, कौन से तारे तोड़ लिये? आप तो अपने ही यहां के उद्योगपतियों, अपने ही राज्य के देश-दुनिया में डंका बजा रहे आला दिमागों को घरबार छोड़ कर भागने से न तो पहले रोक पाए, न अब रोक पा रहे हैं तो उस कलंक का जापा क्यों? काक जी, बस कीजिये, पांच साल और मांग रहे हैं वह। अरे मूरख वो भी मैं ही दूंगा क्या, उसके लिये बिहार की जनता जाने।
झमपा, टिपकापा और तकादापा
राजीव मित्तल
बेटा गरुड, तकादापा तो समझा, यह झमपा और टिपकापा क्या बला हैं? काक जी, ये कुछ ऐसे नाम हैं, जिनके बारे सिर्फ ऊपर वाला जानता है कहिये तो इन बलाओं के दर्शन कराऊं? काक भुशुण्डि ने कान खुजाते हुए कहा- कोई बेवकूफी मत करना वरना॥। काक जी, चुनाव के मौसम में और क्या उम्मीद करते हैं, अच्छा चलिये आपको ट्रेलर ही दिखा देता हूं--देखिये--सर जी, तीन-चार लोगों के साथ वह गेट पर खड़े हैं। अरे, तो मैं क्या करूं, गार्ड से कह दो भगा देगा। नहीं सर, वह आम जनता के आदमी नहीं हैं, किसी पार्टी के लग रहे हैं। सबके हाथ में सूरजमुखी के फूलों की माला है और सब एक साथ नारा लगा रहे हैं- हमारा नेता फलाने-- जैसा हो। फलाने कौन? सर, यानी आप जैसा हो। उनसे यह तो पूछो कि चाहते क्या हैं---तभी भागते हुए एक और साहब हांफते हुए अंदर आए और बोले-ताऊ जी, वे तीनों झमपा, टिपकापा और तकादा पार्टी के अध्यक्ष हैं, आपकी पार्टी में शामिल होना चाह रहे हैं। घड़ी देख कर बोले हैं कि पांच मिनट में बुलावा नहीं आया तो सामने वाले के यहां चले जाएंगे। तो नासपीटे, मेरा मुंह क्या देख रहा है जा जल्दी बुला कर ला और अंदर ताई जी को बोल दे कि साड़ी बदल कर चाय और नमकीन ले आएं। उन्होंने अपनी धोती ठीक की और सोफे पर अखबार लेकर बैठ गए। तब तक वे सब दरवाजे पर आ चुके थे। जब तक संभल पाते उनके गले में चार मालाएं लटक कर झूलने लगीं। जयहिंद सर। आइये-आइये बैठिये। हां बताइये, कैसे तकलीफ की? बात यह है कि हमें अपने-अपने दलों की नीतियां जनविरोधी लग रही हैं इसलिये हम आपकी पार्टी में शामिल होकर आपके हाथ मजबूत करना चाहते हैं। बस हम यह चाहते हैं कि आप हमारी इज्जत पर कोई आंच न आने दें। लेकिन आप ही तो अध्यक्ष हैं, फिर क्या परेशानी है? कुछ नहीं, बस हम अपनी छवि सुधारना चाह रहे हैं और इस काम के लिये आप हमें सबसे सही लगे। हम चाहते हैं कि आप हम तीनों दलों के 15 लोगों को टिकट दें और सरकार बनने पर मुझे गृहमंμाी, इन्हें गृहराज्यमंμाी और इन्हें गृहउपमंμाी का पद दें। और ये जो चौथे हैं इम्हें किसी निगम का अध्यक्ष बनवा दें। वैसे आपकी पार्टी के कितने विधायक हैं? सवाल का जवाब मिलने से पहले ही सामने वाले के यहां से जोर-जोर की आवाजें आने लगीं-आप कौन होते हैं जी, मेरी पार्टी के आदमी को मुख्यमंμाी बनाने वाले? आप नाराज क्यों हो रहे हैं? बनाया कहां है, अभी तो बना कर पेश किया है। मुख्यमंμाी का नाम लिये बगैर मैदान में कैसे उतरते मैदान में, देख नहीं रहे वो बॉलीवुडी रोज जान खा रहा था कि लोकसभा में तो अटल जी को प्रधानमंμाी बना कर पेश किया और अब बिहार में मुख्यमंμाी के नाम से बिदक रहे हैं। यह चिल्लपों सुन इधर के घर में बैठे तीनों पार्टी अध्यक्ष एक स्वर में बोल पड़े, सर आप पूरा मंत्रीमंडल ही घोषित कर दें। तभी एसएसपी के साथ कई पुलिस अफसरों का अमला अंदर घुसा और उन्होंने उन तीनों की तरफ इशारा कर कहा-गिरफ्तार कर लो इन्हें, तीनों यूपी की जेल से भागे हुए हैं।
बेटा गरुड, तकादापा तो समझा, यह झमपा और टिपकापा क्या बला हैं? काक जी, ये कुछ ऐसे नाम हैं, जिनके बारे सिर्फ ऊपर वाला जानता है कहिये तो इन बलाओं के दर्शन कराऊं? काक भुशुण्डि ने कान खुजाते हुए कहा- कोई बेवकूफी मत करना वरना॥। काक जी, चुनाव के मौसम में और क्या उम्मीद करते हैं, अच्छा चलिये आपको ट्रेलर ही दिखा देता हूं--देखिये--सर जी, तीन-चार लोगों के साथ वह गेट पर खड़े हैं। अरे, तो मैं क्या करूं, गार्ड से कह दो भगा देगा। नहीं सर, वह आम जनता के आदमी नहीं हैं, किसी पार्टी के लग रहे हैं। सबके हाथ में सूरजमुखी के फूलों की माला है और सब एक साथ नारा लगा रहे हैं- हमारा नेता फलाने-- जैसा हो। फलाने कौन? सर, यानी आप जैसा हो। उनसे यह तो पूछो कि चाहते क्या हैं---तभी भागते हुए एक और साहब हांफते हुए अंदर आए और बोले-ताऊ जी, वे तीनों झमपा, टिपकापा और तकादा पार्टी के अध्यक्ष हैं, आपकी पार्टी में शामिल होना चाह रहे हैं। घड़ी देख कर बोले हैं कि पांच मिनट में बुलावा नहीं आया तो सामने वाले के यहां चले जाएंगे। तो नासपीटे, मेरा मुंह क्या देख रहा है जा जल्दी बुला कर ला और अंदर ताई जी को बोल दे कि साड़ी बदल कर चाय और नमकीन ले आएं। उन्होंने अपनी धोती ठीक की और सोफे पर अखबार लेकर बैठ गए। तब तक वे सब दरवाजे पर आ चुके थे। जब तक संभल पाते उनके गले में चार मालाएं लटक कर झूलने लगीं। जयहिंद सर। आइये-आइये बैठिये। हां बताइये, कैसे तकलीफ की? बात यह है कि हमें अपने-अपने दलों की नीतियां जनविरोधी लग रही हैं इसलिये हम आपकी पार्टी में शामिल होकर आपके हाथ मजबूत करना चाहते हैं। बस हम यह चाहते हैं कि आप हमारी इज्जत पर कोई आंच न आने दें। लेकिन आप ही तो अध्यक्ष हैं, फिर क्या परेशानी है? कुछ नहीं, बस हम अपनी छवि सुधारना चाह रहे हैं और इस काम के लिये आप हमें सबसे सही लगे। हम चाहते हैं कि आप हम तीनों दलों के 15 लोगों को टिकट दें और सरकार बनने पर मुझे गृहमंμाी, इन्हें गृहराज्यमंμाी और इन्हें गृहउपमंμाी का पद दें। और ये जो चौथे हैं इम्हें किसी निगम का अध्यक्ष बनवा दें। वैसे आपकी पार्टी के कितने विधायक हैं? सवाल का जवाब मिलने से पहले ही सामने वाले के यहां से जोर-जोर की आवाजें आने लगीं-आप कौन होते हैं जी, मेरी पार्टी के आदमी को मुख्यमंμाी बनाने वाले? आप नाराज क्यों हो रहे हैं? बनाया कहां है, अभी तो बना कर पेश किया है। मुख्यमंμाी का नाम लिये बगैर मैदान में कैसे उतरते मैदान में, देख नहीं रहे वो बॉलीवुडी रोज जान खा रहा था कि लोकसभा में तो अटल जी को प्रधानमंμाी बना कर पेश किया और अब बिहार में मुख्यमंμाी के नाम से बिदक रहे हैं। यह चिल्लपों सुन इधर के घर में बैठे तीनों पार्टी अध्यक्ष एक स्वर में बोल पड़े, सर आप पूरा मंत्रीमंडल ही घोषित कर दें। तभी एसएसपी के साथ कई पुलिस अफसरों का अमला अंदर घुसा और उन्होंने उन तीनों की तरफ इशारा कर कहा-गिरफ्तार कर लो इन्हें, तीनों यूपी की जेल से भागे हुए हैं।
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