राजीव मित्तल
देश की संसद में कुछ साल पहले 40 थे अब सौ हो गए। हर दल के कंधे पे लटके अंगोछे से दो-चार तो टपक ही पड़ेंगे, ऐसी निगेटिव खबरें पढ़ इल्वल और वातापि बहुत गमगीन हैं। उनके मन में यह आकांक्षा अब जोर पकड़ रही है कि बाहुबलियों का सकारात्मक पक्ष जनता के सामने आए। जब मिस मित्तल की शादी पर दोनों रक्ष भइये पेरिस में थे, तो जनवासे में फेशन डिजायनरोें में हो रही बातचीत से पता चला कि किसी जमाने में पेरिस का वही हाल था, जो आज यहां के कई शहरों का है। सारा पेरिस रंगदारों के हवाले था। जनता बेहाल। शासन-प्रशासन चिंता में मग्न। तो सत्ता में बैठे किसी ज्ञानी ने जहर को जहर से मारने की तरकीब निकाली और शहर का शेरिफ एक उचक्के को बना दिया। महीने भर में हालात बदल गए और रंगदारों की हवा संट हो गयी। ऐसा ही कुछ रक्ष भाइयों के दिमाग में भी चल रहा है। जब संसद और विधानसभा में पहुंचा जा सकता है तो थोड़ा और आगे क्यों नहीं बढ़ा जा सकता।
खैर, लोकसभा के चुनाव तो काफी दूर हैं, अब तो एकाध जगह विधानसभा चुनाव ही होने हैं तो क्यों न मुख्यमंμाी पद किसी बली को नवाज दिया जाए। कानून-व्यवस्था की सारी समस्या चुटकियों में दूर हो जाएगी। आधी रात को गली-मोहल्लों तो क्या वन-प्रांतर तक से आल्हा गूंजेगा। फैशन परेड चौपालों पर हुआ करेगी। वही भाजपा, जो लालू और उनके कई सांसदों के पीछे हाथ धो के पड़ी है, नागपुर में वर्कशाप आयोजित कर अपने सांसदों को विभिन्न प्रकार के बली बनाने और थानों में उनकी फोटो लटकाने की जुगत भिड़ाया करेगी। अब देखो न, दुनिया भर के विज्ञानी शोध पे शोध किये जा रहे हैं कि सांप का विष कमजोर दिल वालों के लिये बड़ा उपयोगी है या चूहे की खाल से अगर कैंसर कोशिकाएं निकाल दी जाएं तो मानव जाति का आदि और अंत दोनों का भला हो जाए।
मेंढकों ने तो अपना जीवन जन कल्याण के लिये न्योछावर कर दिया है। अगर बलियों की भी एकाध कोशिका से छेड़छाड़ कर ली जाए तो ढेरों क्लोन तैयार किये जा सकते हैं। तब हमारा देश अगले चुनाव तक अमेरिका को पीछे छोड़ देगा। इलु, मेरी एक सलाह और है कि हमारे जितने जनप्रतिनिधि बली से ताल्लुक रखते हैं, वे अब तक लिये गए सारे भत्ते और वेतन सरकार को लौटा दें और आगे से कानी कौड़ी न छुएं। बल्कि हर कोई अपने-अपने जिम्मे पांच-पांच सासंद कर ले और उनका पालन-पोषण करे तो संसद ठप होनी हमेशा के लिये बंद हो जाएगी और जनता की गाढ़ी कमाई अच्छे कामों में खर्च होगी। दूसरे, हाल में हमारे एक जनप्रतिनिधि ने डकैतों का मुकाबला करने के लिये अपनी निजी सेना तैयार की है, तो ये बली सांसद क्या कर रहे हैं, सीमा पर अपनी सेनाएं क्यों नहीं तैनात करते, जैसे मौके-बेमौके मराठे सरदार किया करते थे। बहरहाल, अगर हमारे कुछ राजनैतिक दलों के स्वंयभू सुप्रीमो मान जाएं और अभी से सम्भावित सत्ता की पगड़ी अपने हाथों से किसी बली के सिर पे रख दें तो हमारे देश को फिर से सोने की चिड़िया बनते देर नहीं लगेगी।
सोमवार, 20 दिसंबर 2010
पेरिस के जनवासे में दंडकारण्य वासी
राजीव मित्तल
दंडकारण्य की वो सुबह बड़ी सुहावनी थी। कौवे की कांव-कांव कोयल जितनी सुरीली थी। सूर्य की किरणें झिलमिलाने लगी थीं। सरोवरों में कमल खिलने को थे, जो खिले कमल से ज्यादा शोभा बढ़ा रहे थे। पशु-पक्षी निर्भय हो कूद-फांद मचा रहे थे। लेकिन एक वट वृक्ष के नीचे बैठे राक्षस कुल के दो सहोदर वातापि और इल्वल प्रकृति की अनुपम छटा से बेखबर भोजन पानी की जुगाड़ में लगे थे। पिछली रात वातापि रोजमर्रा की तरह बकरा बना और इल्वल ने उसकी काटाई-छांटाई कर बढ़िया डिश तैयार की और तयशुदा कार्यक्रम के तहत किसी ऋषि को खिला दी। ऋषि के पेट में वातापि के जाते ही इल्वल ने उसे आवाज दी और वह ऋषि का पेट फाड़ कर बाहर आ गया। ऋषि का भोग लगा कर दोनों ने उनकी कुटिया उथली-पुथली तो उन्हें वहां से सोने से मढ़ा एक आमंμाण पμा मिला जो लोहा सम्राट की बिटिया की शादी का था। शादी पेरिस नाम के शहर में थी। उस कार्ड में चांदी के तारों से अतिथियों का नाम टांका गया था। दोनों भाइयों ने नाम पढ़ने शुरू किये। उनकी निगाहें शाहरुख खान और ऐशवर्या राय के नामों पर ठहर गयीं। वातापि के मुंह से तुरंत निकला-अरे इलु ये तो वही हैं देवदास वाले। इनसे मिलने तो जरूर चलना है।
तभी इलु बोला-वातु, अहा दावत में डेढ़ हजार किस्म के पकवान हैं। फ्रेंच डिशेज भी हैं। चारों तरफ मांस ही मांस होगा। भई मैं तो सारा खा जाऊंगा, एक लुक्मा भी किसी के लिये नहीं छोडूंगा। तो मैं क्या खाऊंगा इलु? तुम सारे मेहमानों को डकार लेना। अब इसमें कोई बहस नहीं। पर पेरिस है कहां? चलो चल कर विराध चच्चू से पूछते हैं। दोनों भाई विराध के पास पहुंचे और पेरिस के बारे में पूछा। और फिर यह भी पूछा कि यह लोहा सम्राट किस इलाके के अधिपति हैं। एक हाथी को अभी-अभी निवाला बना कर चुके विराध ने कहा- भतीजों, लोहा सम्राट कहीं के राजा नहीं हैं, वह सारे जहान का जंग लगा लोहा खरीदते हैं, जिनसे घोड़े की नाल बनायी जाती है। दुनिया भर के काले घोड़े इन्हीं की नाल अपने खुरों में ठुंकवाते हैं। जब ये नाल काफी घिस जाती हैं तो इनके छल्ले बनवा कर शनि की साढ़ेसाती दूर करने को उंगली में पहने जाते हैं। इन छल्लों की तो यूरोप के देशों में भी काफी डिमांड है। अब तुम लोग रावण के कबाड़खाने में पड़े पुष्पक विमान को दुरुस्त करो और पश्चिम की ओर निकल जाओ। नेपोलियन का पता पूछते-पूछते पेरिस पहुंच जाओगे। देखो कोई ऐसी वैसी हरकत मत करना, जिससे राक्षस कुल पे दाग लगे। दोनों इस राक्षसी ढंग में न चल देना, कपड़े-वपड़े पहन कर जाना। किसी सैलून में जाकर अपने दांत अंदर करा लो और यह झाड़-झंकाड़ साफ करा लो। भाइयों ने चच्चू का कहा किया और पेरिस पहुंच गये।
लोहा सम्राट के जनवासे तक पहुंचने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई क्योंकि शहनाई वादन उनको इंगलिश चैनल पर ही सुनाई दे रहा था। जनवासे में पहुंच सबसे पहले वो लपके कलकत्ता से बुलाये गये मशहूर कुक मुन्नू महाराज के इंतजामात की ओर क्योंकि पिछले तीन घंटे से उन्हें किसी का नाखून तक चबाने को नहीं मिला था। उनके सामने फौरन कई सारे डोंगे और प्लेटें आ गयीं। एक में बादाम की पकौड़ी, एक में करेले का हलुवा, एक में चिरौंजी पड़ी कढ़ी और पता नहीं क्या-क्या। इलु ने एक खानसामे को रोका और कहा मांस कहां है और वो भी कच्चा? खानसामे ने कहा ए मोशिये चुप्प-यहां मांस का नाम तक मत लेना। जनाने वाले शाकाहारी हैं। हम फ्रांसीसियों को भी इसी घास-फूस से काम चलाना पड़ेगा। दोनों भाइयों ने पेट पर हाथ फेरा। दोनों ने फिछली रात खायी हड्डी-बोटियों को याद किया और उसी की डकार मार ऐशवर्या को देखने लपके। देखा, एक महल जैसे भवन में शाहरुख और ऐशवर्या शादी के मौके पर दिखाये जाने वाले प्रोग्राम के डायलॅाग याद कर रहे हैं।
उसी प्रोग्राम में शाहरुख को विदाई गीत ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ और ऐशवर्या को ‘वो मेरा होगा वो सपना तेरा होगा’ गाना था। दोनों ने हारमोनियम और ढोलक बजाने वालों को बुलवा रखा था। वातापि और इल्वल जैसे ही उन लोगों की तरफ बढ़े कि सामने से आ रहे संदीप खोसला से टकरा गये। दोनों की अनोखी वेशभूषा देख संदीप के कानों में सीटियां बजने लगीं। कहीं ये दोनों अबु जानी या किसी और डिजायनर के हाथ न लग जायें, वह तुरंत उन्हें बहला कर वहां से ले गया और शादी निबटने तक दोनों को ले जाकर उसी जगह बंद कर दिया जहां 18 वीं शताब्दी में फ्रांस के राजा लुई सोलहवे को क्रांतिकारियों ने कैद किया था। बाहर बारात आ गयी का शोर मचा हुआ था और बाजे वाले दुल्हनिया ले जायेंगे बजा रहे थे।
दंडकारण्य की वो सुबह बड़ी सुहावनी थी। कौवे की कांव-कांव कोयल जितनी सुरीली थी। सूर्य की किरणें झिलमिलाने लगी थीं। सरोवरों में कमल खिलने को थे, जो खिले कमल से ज्यादा शोभा बढ़ा रहे थे। पशु-पक्षी निर्भय हो कूद-फांद मचा रहे थे। लेकिन एक वट वृक्ष के नीचे बैठे राक्षस कुल के दो सहोदर वातापि और इल्वल प्रकृति की अनुपम छटा से बेखबर भोजन पानी की जुगाड़ में लगे थे। पिछली रात वातापि रोजमर्रा की तरह बकरा बना और इल्वल ने उसकी काटाई-छांटाई कर बढ़िया डिश तैयार की और तयशुदा कार्यक्रम के तहत किसी ऋषि को खिला दी। ऋषि के पेट में वातापि के जाते ही इल्वल ने उसे आवाज दी और वह ऋषि का पेट फाड़ कर बाहर आ गया। ऋषि का भोग लगा कर दोनों ने उनकी कुटिया उथली-पुथली तो उन्हें वहां से सोने से मढ़ा एक आमंμाण पμा मिला जो लोहा सम्राट की बिटिया की शादी का था। शादी पेरिस नाम के शहर में थी। उस कार्ड में चांदी के तारों से अतिथियों का नाम टांका गया था। दोनों भाइयों ने नाम पढ़ने शुरू किये। उनकी निगाहें शाहरुख खान और ऐशवर्या राय के नामों पर ठहर गयीं। वातापि के मुंह से तुरंत निकला-अरे इलु ये तो वही हैं देवदास वाले। इनसे मिलने तो जरूर चलना है।
तभी इलु बोला-वातु, अहा दावत में डेढ़ हजार किस्म के पकवान हैं। फ्रेंच डिशेज भी हैं। चारों तरफ मांस ही मांस होगा। भई मैं तो सारा खा जाऊंगा, एक लुक्मा भी किसी के लिये नहीं छोडूंगा। तो मैं क्या खाऊंगा इलु? तुम सारे मेहमानों को डकार लेना। अब इसमें कोई बहस नहीं। पर पेरिस है कहां? चलो चल कर विराध चच्चू से पूछते हैं। दोनों भाई विराध के पास पहुंचे और पेरिस के बारे में पूछा। और फिर यह भी पूछा कि यह लोहा सम्राट किस इलाके के अधिपति हैं। एक हाथी को अभी-अभी निवाला बना कर चुके विराध ने कहा- भतीजों, लोहा सम्राट कहीं के राजा नहीं हैं, वह सारे जहान का जंग लगा लोहा खरीदते हैं, जिनसे घोड़े की नाल बनायी जाती है। दुनिया भर के काले घोड़े इन्हीं की नाल अपने खुरों में ठुंकवाते हैं। जब ये नाल काफी घिस जाती हैं तो इनके छल्ले बनवा कर शनि की साढ़ेसाती दूर करने को उंगली में पहने जाते हैं। इन छल्लों की तो यूरोप के देशों में भी काफी डिमांड है। अब तुम लोग रावण के कबाड़खाने में पड़े पुष्पक विमान को दुरुस्त करो और पश्चिम की ओर निकल जाओ। नेपोलियन का पता पूछते-पूछते पेरिस पहुंच जाओगे। देखो कोई ऐसी वैसी हरकत मत करना, जिससे राक्षस कुल पे दाग लगे। दोनों इस राक्षसी ढंग में न चल देना, कपड़े-वपड़े पहन कर जाना। किसी सैलून में जाकर अपने दांत अंदर करा लो और यह झाड़-झंकाड़ साफ करा लो। भाइयों ने चच्चू का कहा किया और पेरिस पहुंच गये।
लोहा सम्राट के जनवासे तक पहुंचने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई क्योंकि शहनाई वादन उनको इंगलिश चैनल पर ही सुनाई दे रहा था। जनवासे में पहुंच सबसे पहले वो लपके कलकत्ता से बुलाये गये मशहूर कुक मुन्नू महाराज के इंतजामात की ओर क्योंकि पिछले तीन घंटे से उन्हें किसी का नाखून तक चबाने को नहीं मिला था। उनके सामने फौरन कई सारे डोंगे और प्लेटें आ गयीं। एक में बादाम की पकौड़ी, एक में करेले का हलुवा, एक में चिरौंजी पड़ी कढ़ी और पता नहीं क्या-क्या। इलु ने एक खानसामे को रोका और कहा मांस कहां है और वो भी कच्चा? खानसामे ने कहा ए मोशिये चुप्प-यहां मांस का नाम तक मत लेना। जनाने वाले शाकाहारी हैं। हम फ्रांसीसियों को भी इसी घास-फूस से काम चलाना पड़ेगा। दोनों भाइयों ने पेट पर हाथ फेरा। दोनों ने फिछली रात खायी हड्डी-बोटियों को याद किया और उसी की डकार मार ऐशवर्या को देखने लपके। देखा, एक महल जैसे भवन में शाहरुख और ऐशवर्या शादी के मौके पर दिखाये जाने वाले प्रोग्राम के डायलॅाग याद कर रहे हैं।
उसी प्रोग्राम में शाहरुख को विदाई गीत ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ और ऐशवर्या को ‘वो मेरा होगा वो सपना तेरा होगा’ गाना था। दोनों ने हारमोनियम और ढोलक बजाने वालों को बुलवा रखा था। वातापि और इल्वल जैसे ही उन लोगों की तरफ बढ़े कि सामने से आ रहे संदीप खोसला से टकरा गये। दोनों की अनोखी वेशभूषा देख संदीप के कानों में सीटियां बजने लगीं। कहीं ये दोनों अबु जानी या किसी और डिजायनर के हाथ न लग जायें, वह तुरंत उन्हें बहला कर वहां से ले गया और शादी निबटने तक दोनों को ले जाकर उसी जगह बंद कर दिया जहां 18 वीं शताब्दी में फ्रांस के राजा लुई सोलहवे को क्रांतिकारियों ने कैद किया था। बाहर बारात आ गयी का शोर मचा हुआ था और बाजे वाले दुल्हनिया ले जायेंगे बजा रहे थे।
बुधवार, 8 दिसंबर 2010
सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे बचवा
राजीव मित्तल
चैनली तलाशते हुए जिस घर के सामने पहुंची, वहां जोर-जोर से किसी पंडित के जाप करने की आवाज आ रही थी। अफरातफरी का सा आलम था। तभी एक सज्जन उसकी तरफ लपके और बोले आप ही ने दो दिन पहले इंटरव्यू के लिये फोन किया था न! मैं अपने बेटे को विदा कर दूं, तब तक आप बैठें। उन्होंने वहीं से किसी महिला को आवाज लगायी। सुर बता रहा था कि पत्नी को बुलाया है। अंदर से सूजी आंखें लिये एक महिला आयी और भर्राये गले से पूछा-क्या है? अरे भई, तांगा आ गया है पुत्तन की तैयारी हो गयी? सब सामान रख दिया न? बहू से विदा ले रहा है। चैनली ने कनखियों से सामने वाले कमरे की तरफ देखा तो वहां एक युवती सिसकियां ले रही थी। बार-बार उसके हाथ एक लोहे के संदूक में रखे कपड़ों को टटोलते तो कभी संदूक के ढक्कन को दबोचते। चैनली रिटायर्ड क्लास टू अफसर सेवक राम गर्ग से पूछ बैठी-क्या बात ह,ै आपका कोई बेटा आर्मी में है? जम्मू-कश्मीर भेजा जा रहा है उसे? नहीं, एक ही है और वही चुनाव ड्यूटी पर जा रहा है पीठासीन अधिकारी होकर। तीन दिन से घर में रोना-धोना मचा है। उसकी मां को तो चार बार गश आ चुका है। कल शाम से महामृत्युंजय का जाप चल रहा था। तभी पुत्तन लोहे का संदूक लेकर बाहर की ओर लपका। पीछे-पीछे मां के हाथ में टिफिन और पत्नी के हाथ में पूजा की थाली थी। बेटे ने मां-बाप के पांव छुए और पत्नी की तरफ हसरत भरी नजरों से देखा। डबडबायी आंखों से पति की आरती उतारती हुई वह ससुर जी से बोली-पिताजी आपने इन्हें सब कुछ समझा दिया है न? अरे तुम और तुम्हारी सास तो बस रोना-धोना ही मचाना जानती हो, मैं तीन दिन से इसे यही तो समझाने में लगा हूं कि अब नहीं रहा हमारा वाला जमाना, कोई कुछ भी करे तू करने देना, पीठासीनी को डालना कुएं में। ये चुनाव तो मरगये अब हर समय सिर पे सवार रहते हैं, कोई जान थोड़े ही न गंवानी है। मैंने भी कभी मोहनलाल गंज में चुनाव कराया था, हंसते खेलते पिकनिक मनाते। क्या दिन थे आह, और अब! हे ईश्वर तू ही रक्षा करना। पुत्तन तांगे में बैठ चुका था। महरी के शंख फूंकने की आवाज आ रही थी। पुत्तन को विदा कर सब अंदर आ गये। तब तक चैनली ने संजू से कैमरा फिट करा दिया था। गर्ग साहब माथे पे हाथ रखे बुदबुदाते हुए पता नहीं किस को कोस रहे थे। चैनली ने माइक आगे किया-गर्ग साहब, आप बताएंगे कि तब और अब में क्या फर्क आया है चुनावों में? देखो, अब के बारे में तो मैं कैमरे पर कुछ बोलूंगा नहीं। सारी दुनिया जानती है। हां, अपने समय के बारे में जरूर बता सकता हूं। नदी के किनारे बसे गांव में मेरी ड्यूटी पड़ी थी। एक ट्रक पर सवार थे हम चार-पांच बूथों के लोग। गाते-बजाते गये थे। रास्ते में खेतों से गन्ने भी तोड़े ट्रक रुकवा कर। जिस गांव में अगले दिन चुनाव होना था, वहां पहुंच कर मुखिया को बुलवाया। हाथ जोड़े खड़ा रहा। मेरे क्रू के आठ-दस लोगों की बड़ी आवभगत की थी उसने। फिर शाम को नदी किनारे टहलने गये और वहां की रेत में उगे खीरे-ककड़ी-खरबूजों का भोगलगाया। सब नदी में नहाये। रात को पेड़ के नीचे हमारे लेटने का इंतजाम था। दो बंदूकधारियों के बीच में लेटा था मैं। सुबह सब तैयार होकर मतदाताओं के इंतजार में बैठ गये। गांव में जगह-जगह ढोलक बज रही थी, औरतें गा रही थीं, बकरियों के पीछे बच्चे दौड़ रहे थे। थान पे बंधी गाय-भैंस भी खुशी के मारे ठुमक रही थीं। वोट डालने वालों ने आना शुरू कर दिया। कोई लाइन नहीं, कोई झांय-झप्प नहीं। मैं चारों ओर खिले गुलमोहर और अमलतास को देखने में मशगूल था। कोई फिल्मी गाना भी गुनगुना रहा था शायद। हर घंटे में चाय बन कर आ रही थी, साथ में कुछ खाने को भी। कब शाम के पांच बज गये पता ही नहीं चला। तभी आंसू बहाती अफसराइन आ गयी-फिर तुम मोहनलालगंज वाला किस्सा ले के बैठ गये? तुमने तो मस्ती कर ली। मेरे बेटे को तो भेज दिया न मौत के मुंह में नरकटियागंज। ऊं-ऊं-ऊं-कह रहे थे मुख्यमंμाी से सिफारिश लगवाऊंगा-ऊं-ऊं-ईं-ईं-कितना कहा था कि इतना कमाये हो, बेटे को कोई धंधा करा दो (एक जोर की हिचकी) पर तुम्हारे कान में तो जूं तक नहीं रेंगी। उस कम्बख्त श्रीवास्तव को कह कर लगवा दिया बैंक में कि दहेज अच्छा मिलेगा। अब चाटो दहेज को लेकर। हाय मेरो पुत्तन-मेरा बेटा ऊं--ऊं--हुच्च। और मिसेज गर्ग को पांचवी बार भी गश आ ही गया।
चैनली तलाशते हुए जिस घर के सामने पहुंची, वहां जोर-जोर से किसी पंडित के जाप करने की आवाज आ रही थी। अफरातफरी का सा आलम था। तभी एक सज्जन उसकी तरफ लपके और बोले आप ही ने दो दिन पहले इंटरव्यू के लिये फोन किया था न! मैं अपने बेटे को विदा कर दूं, तब तक आप बैठें। उन्होंने वहीं से किसी महिला को आवाज लगायी। सुर बता रहा था कि पत्नी को बुलाया है। अंदर से सूजी आंखें लिये एक महिला आयी और भर्राये गले से पूछा-क्या है? अरे भई, तांगा आ गया है पुत्तन की तैयारी हो गयी? सब सामान रख दिया न? बहू से विदा ले रहा है। चैनली ने कनखियों से सामने वाले कमरे की तरफ देखा तो वहां एक युवती सिसकियां ले रही थी। बार-बार उसके हाथ एक लोहे के संदूक में रखे कपड़ों को टटोलते तो कभी संदूक के ढक्कन को दबोचते। चैनली रिटायर्ड क्लास टू अफसर सेवक राम गर्ग से पूछ बैठी-क्या बात ह,ै आपका कोई बेटा आर्मी में है? जम्मू-कश्मीर भेजा जा रहा है उसे? नहीं, एक ही है और वही चुनाव ड्यूटी पर जा रहा है पीठासीन अधिकारी होकर। तीन दिन से घर में रोना-धोना मचा है। उसकी मां को तो चार बार गश आ चुका है। कल शाम से महामृत्युंजय का जाप चल रहा था। तभी पुत्तन लोहे का संदूक लेकर बाहर की ओर लपका। पीछे-पीछे मां के हाथ में टिफिन और पत्नी के हाथ में पूजा की थाली थी। बेटे ने मां-बाप के पांव छुए और पत्नी की तरफ हसरत भरी नजरों से देखा। डबडबायी आंखों से पति की आरती उतारती हुई वह ससुर जी से बोली-पिताजी आपने इन्हें सब कुछ समझा दिया है न? अरे तुम और तुम्हारी सास तो बस रोना-धोना ही मचाना जानती हो, मैं तीन दिन से इसे यही तो समझाने में लगा हूं कि अब नहीं रहा हमारा वाला जमाना, कोई कुछ भी करे तू करने देना, पीठासीनी को डालना कुएं में। ये चुनाव तो मरगये अब हर समय सिर पे सवार रहते हैं, कोई जान थोड़े ही न गंवानी है। मैंने भी कभी मोहनलाल गंज में चुनाव कराया था, हंसते खेलते पिकनिक मनाते। क्या दिन थे आह, और अब! हे ईश्वर तू ही रक्षा करना। पुत्तन तांगे में बैठ चुका था। महरी के शंख फूंकने की आवाज आ रही थी। पुत्तन को विदा कर सब अंदर आ गये। तब तक चैनली ने संजू से कैमरा फिट करा दिया था। गर्ग साहब माथे पे हाथ रखे बुदबुदाते हुए पता नहीं किस को कोस रहे थे। चैनली ने माइक आगे किया-गर्ग साहब, आप बताएंगे कि तब और अब में क्या फर्क आया है चुनावों में? देखो, अब के बारे में तो मैं कैमरे पर कुछ बोलूंगा नहीं। सारी दुनिया जानती है। हां, अपने समय के बारे में जरूर बता सकता हूं। नदी के किनारे बसे गांव में मेरी ड्यूटी पड़ी थी। एक ट्रक पर सवार थे हम चार-पांच बूथों के लोग। गाते-बजाते गये थे। रास्ते में खेतों से गन्ने भी तोड़े ट्रक रुकवा कर। जिस गांव में अगले दिन चुनाव होना था, वहां पहुंच कर मुखिया को बुलवाया। हाथ जोड़े खड़ा रहा। मेरे क्रू के आठ-दस लोगों की बड़ी आवभगत की थी उसने। फिर शाम को नदी किनारे टहलने गये और वहां की रेत में उगे खीरे-ककड़ी-खरबूजों का भोगलगाया। सब नदी में नहाये। रात को पेड़ के नीचे हमारे लेटने का इंतजाम था। दो बंदूकधारियों के बीच में लेटा था मैं। सुबह सब तैयार होकर मतदाताओं के इंतजार में बैठ गये। गांव में जगह-जगह ढोलक बज रही थी, औरतें गा रही थीं, बकरियों के पीछे बच्चे दौड़ रहे थे। थान पे बंधी गाय-भैंस भी खुशी के मारे ठुमक रही थीं। वोट डालने वालों ने आना शुरू कर दिया। कोई लाइन नहीं, कोई झांय-झप्प नहीं। मैं चारों ओर खिले गुलमोहर और अमलतास को देखने में मशगूल था। कोई फिल्मी गाना भी गुनगुना रहा था शायद। हर घंटे में चाय बन कर आ रही थी, साथ में कुछ खाने को भी। कब शाम के पांच बज गये पता ही नहीं चला। तभी आंसू बहाती अफसराइन आ गयी-फिर तुम मोहनलालगंज वाला किस्सा ले के बैठ गये? तुमने तो मस्ती कर ली। मेरे बेटे को तो भेज दिया न मौत के मुंह में नरकटियागंज। ऊं-ऊं-ऊं-कह रहे थे मुख्यमंμाी से सिफारिश लगवाऊंगा-ऊं-ऊं-ईं-ईं-कितना कहा था कि इतना कमाये हो, बेटे को कोई धंधा करा दो (एक जोर की हिचकी) पर तुम्हारे कान में तो जूं तक नहीं रेंगी। उस कम्बख्त श्रीवास्तव को कह कर लगवा दिया बैंक में कि दहेज अच्छा मिलेगा। अब चाटो दहेज को लेकर। हाय मेरो पुत्तन-मेरा बेटा ऊं--ऊं--हुच्च। और मिसेज गर्ग को पांचवी बार भी गश आ ही गया।
संसद के गेट पर अटका पड़ा पल्लू
राजीव मित्तल
बोंब, महाभारत में महिलाओं की क्या स्थिति थी समाज में, राजनीति में? राजनीति नहीं नीति और उसमें महिलाओं ने जम कर पुरुष समाज का मोर्चा लिया। पुरुषों की सतायी महिलाएं अपना बदला लेने से कतई नहीं चूकती थीं। हरकती देवराज इंद्र को तो कई बार जुतियाया गया। महाराज शान्तनु को मल्लाह की बेटी सत्यवती भा गयी पर, उसे रखैल बन कर रहना मंजूर नहीं था। साफ कह दिया कि खाली-पीली की आशिकी से काम नहीं चलेगा। शरीर चाहते हो तो सात फेरे लो और सारा राजपाट मेरी कोख से जन्मने वाले को सौंपने का वचन दो। कामवासना के हाथों बेबस शान्तनु ऐसी कोई पॉवर ऑफ अटॉर्नी देने से बचना चाहते थे, जिससे राजपाट एक मल्लाह की बेटी के हत्थे लग जाये। सोचते थे कि कुछ दिन मौज-मस्ती करेंगे और फिर किसी दूसरे शिकार की तालाश करेंगे। पर अब तो सामने से परोसी हुई थाली ही खिसकी जा रही थी। देवदास बन शुरू हो गए रेंकने-मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज न दो-बेटे भीष्म ने यह दर्दीला सुर सुना तो समझ गया कि बुड्ढे की आंख लड़ गयी है कहीं। बाप की दास्तां सुन निबाह दिया बेटे का धर्म कि वह राजपाट नहीं संभालेगा और आगे चल कर औलाद बखेड़ा करेगी इसलिये कभी विवाह नहीं करेगा। और यहीं पड़ी कुरु वंश के विनाश की नींव। अच्छा छोड़ो, अब म्हिला अधिकारों पर एक वाकया और सुनो। कर्ण की धनुर्विद्या की शक्ति को सारी दुनिया जानती थी, द्रोपदी भी जानती थी, पर दुर्योधन की मिμाता के चलते उसे चाहती नहीं थी, स्वंयवर में साफ ऐलान कर दिया कि सूतपुμा के गले में माला नहीं डालूंगी। अजुर्न और कृष्ण की बहन सुभद्रा एक दूसरे को चाहते थे। तो कृष्ण ने ही अर्जुन को मौका दिया सुभद्रा को भगा ले जाने का क्योंकि बहना की पसंद दुर्योधन नहीं था। खुद कृष्ण ने रुक्मणि के चाहने पर उसका अपहरण किया। हिडिम्ब राक्षस मेरे दादा भीम को मार कर पेटपूजा करने पर तुला था, पर उसकी बहन हिडिम्बा दादा जी पर ऐसी रीझी कि जान पर खेल कर वरमाला उनके गले में डाल दी। सारे पांडवों की मां कुंती ही थी पर पांडु उनमें से एक के भी जन्मदाता नहीं थे। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जबकि सही मुद्दे पर नारी जात अड़ जाती थी और अपनी बात मनवा के रहती थी। उस समय अगर नारी भोग्या थी तो शक्ति भी थी। पुरुष प्रधान समाज में भी दबंगता से और बराबरी से रहती थी। आज का दोगलापन नहीं था कि गाय और गंगा से लेकर न जाने कौन-कौन सी देवियों की पूजा, पर असलियत में गाय जितनी ही असुरक्षित पूरी नारी जात और गंगा जितनी उसकी दुर्गत। लड़की जन्म न ले ले इसलिये गर्भ में ही टेंटुआ दबाने की तैयारी। कहीं-कहीं तो पैदा होने के बाद पटक-पटक कर आज भी मारा जाता है। दिल और दिमाग में इत कदर क्रूरता और जपेंगे सीताराम-राधेश्याम। मैं जान रहा हूं-अब तुम पूछोगी कि संसद में महिलाओं का आरक्षण क्यों लटका पड़ा है। देखो चैनली, यहां का पुरुष औरत का सहारा लेकर अपनी महत्वाकांक्षाएं तो पूरी कर लेगा, पर अगर नारी जात अपने मन से कुछ करना चाहे तो उसे करवाचौथ की कसम, बेटे की कसम, समाज की दुहाई दे कर बंाध देगा। यहां की राजनीति में भी नारी का वही इस्तेमाल ही होरहा है। औरत जो अपने साथ सात जन्म का बंधन लिखा कर ऊपर से आयी है, उसका कर्ज उसे चुकाना ही है। सो, अगर वह राजनीति में है तो इसलिये क्योंकि पतिदेवता ऐसा चाहते हैं अपने फायदे के लिये, अपने धंधे को फैलाने के लिये, समाज में रुतबा बढ़ाने के लिये। तो महिलाओं का संसद में आरक्षण भूल जाओ। और यह भी भूल जाओ कि शादी के बाद तुम इसी तरह नीले आसमां पर तैरते दूधिया बादलों की तरह फुदकती फिरोगी।
बोंब, महाभारत में महिलाओं की क्या स्थिति थी समाज में, राजनीति में? राजनीति नहीं नीति और उसमें महिलाओं ने जम कर पुरुष समाज का मोर्चा लिया। पुरुषों की सतायी महिलाएं अपना बदला लेने से कतई नहीं चूकती थीं। हरकती देवराज इंद्र को तो कई बार जुतियाया गया। महाराज शान्तनु को मल्लाह की बेटी सत्यवती भा गयी पर, उसे रखैल बन कर रहना मंजूर नहीं था। साफ कह दिया कि खाली-पीली की आशिकी से काम नहीं चलेगा। शरीर चाहते हो तो सात फेरे लो और सारा राजपाट मेरी कोख से जन्मने वाले को सौंपने का वचन दो। कामवासना के हाथों बेबस शान्तनु ऐसी कोई पॉवर ऑफ अटॉर्नी देने से बचना चाहते थे, जिससे राजपाट एक मल्लाह की बेटी के हत्थे लग जाये। सोचते थे कि कुछ दिन मौज-मस्ती करेंगे और फिर किसी दूसरे शिकार की तालाश करेंगे। पर अब तो सामने से परोसी हुई थाली ही खिसकी जा रही थी। देवदास बन शुरू हो गए रेंकने-मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज न दो-बेटे भीष्म ने यह दर्दीला सुर सुना तो समझ गया कि बुड्ढे की आंख लड़ गयी है कहीं। बाप की दास्तां सुन निबाह दिया बेटे का धर्म कि वह राजपाट नहीं संभालेगा और आगे चल कर औलाद बखेड़ा करेगी इसलिये कभी विवाह नहीं करेगा। और यहीं पड़ी कुरु वंश के विनाश की नींव। अच्छा छोड़ो, अब म्हिला अधिकारों पर एक वाकया और सुनो। कर्ण की धनुर्विद्या की शक्ति को सारी दुनिया जानती थी, द्रोपदी भी जानती थी, पर दुर्योधन की मिμाता के चलते उसे चाहती नहीं थी, स्वंयवर में साफ ऐलान कर दिया कि सूतपुμा के गले में माला नहीं डालूंगी। अजुर्न और कृष्ण की बहन सुभद्रा एक दूसरे को चाहते थे। तो कृष्ण ने ही अर्जुन को मौका दिया सुभद्रा को भगा ले जाने का क्योंकि बहना की पसंद दुर्योधन नहीं था। खुद कृष्ण ने रुक्मणि के चाहने पर उसका अपहरण किया। हिडिम्ब राक्षस मेरे दादा भीम को मार कर पेटपूजा करने पर तुला था, पर उसकी बहन हिडिम्बा दादा जी पर ऐसी रीझी कि जान पर खेल कर वरमाला उनके गले में डाल दी। सारे पांडवों की मां कुंती ही थी पर पांडु उनमें से एक के भी जन्मदाता नहीं थे। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जबकि सही मुद्दे पर नारी जात अड़ जाती थी और अपनी बात मनवा के रहती थी। उस समय अगर नारी भोग्या थी तो शक्ति भी थी। पुरुष प्रधान समाज में भी दबंगता से और बराबरी से रहती थी। आज का दोगलापन नहीं था कि गाय और गंगा से लेकर न जाने कौन-कौन सी देवियों की पूजा, पर असलियत में गाय जितनी ही असुरक्षित पूरी नारी जात और गंगा जितनी उसकी दुर्गत। लड़की जन्म न ले ले इसलिये गर्भ में ही टेंटुआ दबाने की तैयारी। कहीं-कहीं तो पैदा होने के बाद पटक-पटक कर आज भी मारा जाता है। दिल और दिमाग में इत कदर क्रूरता और जपेंगे सीताराम-राधेश्याम। मैं जान रहा हूं-अब तुम पूछोगी कि संसद में महिलाओं का आरक्षण क्यों लटका पड़ा है। देखो चैनली, यहां का पुरुष औरत का सहारा लेकर अपनी महत्वाकांक्षाएं तो पूरी कर लेगा, पर अगर नारी जात अपने मन से कुछ करना चाहे तो उसे करवाचौथ की कसम, बेटे की कसम, समाज की दुहाई दे कर बंाध देगा। यहां की राजनीति में भी नारी का वही इस्तेमाल ही होरहा है। औरत जो अपने साथ सात जन्म का बंधन लिखा कर ऊपर से आयी है, उसका कर्ज उसे चुकाना ही है। सो, अगर वह राजनीति में है तो इसलिये क्योंकि पतिदेवता ऐसा चाहते हैं अपने फायदे के लिये, अपने धंधे को फैलाने के लिये, समाज में रुतबा बढ़ाने के लिये। तो महिलाओं का संसद में आरक्षण भूल जाओ। और यह भी भूल जाओ कि शादी के बाद तुम इसी तरह नीले आसमां पर तैरते दूधिया बादलों की तरह फुदकती फिरोगी।
बकरी सी मासूम इवीएम
राजीव मित्तल
जिस किसी सज्जन ने इस चुनाव में वोट डालने के लिये मतदान केंद्रों पर इवीएम रखवायी, उसको शत्-शत् प्रणाम और जिसने उसकी मानी उसको एक सौ एक बार। ऐसा लगा, जैसे हर बूथ पर बकरी बैठा दी गयी हो। बस हाथ आगे बढ़ाया और पें-पें,पीं-पीं की आवाज करते हुए गोद में दुबक जाना। पर भले आदमी को यह तो सोचना चाहिये था कि जब देश का मतदाता नेताओं की मेहरबानी से आल्हा-ऊदल बना हुआ हो, जगह-जगह खुले राजनीति के जिम्नेजियमों में पट्ठे तैयार किये जा रहे हों तब बकरीनुमा इवीएम नहीं बल्कि परे हट जैसी डीटीएम यानी दे थप्पड़ मशीन की दरकार थी, जो मिमियाती नहीं, बल्कि दहाड़ती और प्यार से गोद में लेने वाले के गाल पर काट लेती, कान या नाक उखाड़ लेती। तब इसे गोद में उठाने का जोखिम बड़े-बड़े सूरमा न उठाते। दूर खड़े हु-तू-तू करते रहते। बर्बरीक से इस बार के अतिशांतिपूर्ण मतदान की चर्चा कर रहे उस कठफोड़वे को यही नाराजगी थी कि अब तक किसी प्रत्याशी या दल ने उसे अपना चुनाव चिन्ह क्यों नहीं बनाया। इस बारे में बर्बरीक उसे समझा भी चुका था कि चुनाव चिन्ह बनने से तो अच्छा है कि वह चुनाव ही लड़ ले। बहरहाल इसकी चर्चा बाद में।कठफोड़वे के मुताबिक जैसे देश की आजादी के बाद विद्यार्थियों को सैन्य प्रशिक्षण देने के लिये नेशनल कैडेट कोर की स्थापना हुई, इसी तरह 1952 को हुए पहले चुनाव में एक छोटा सा ग्रुप बना था, नाम रखा गया बीएलजी ग्रुप (बूथ लूट गैंग), जो आज राष्ट्रीय फलक पर छा चुका है। बीएलजी सभी दलों को समान रूप से अपनी सेवाएं देता है। कुछ पुराने धनी-मानी लोग निजी ग्रुप यानी पीबीएलजी बनाते हैं, जो मेम साहब के लिये अचार बनाने को गर्मियों में पेड़ों से कच्चे आम तोड़ते हैं, शर्बत के लिये पके बेल, सब्जी के लिये कटहल और बालों में लगाने के लिये किस्म-किस्म के फूल। किसी गमी के समय गेंदे के फूलों की माला भी यही तैयार करते हैं। लाम पर जाते समय ये दल सुईं से लेकर एके 47 तक से लैस रहते हैं। पिछली बार तक वोट कागजी होता था, पेट पालने वाले के चुनाव चिन्ह, जो चुकंदर से लेकर ऊदबिलाव कुछ भी हो सकता है, के आगे ठप्पा लगाना होता था। यह बड़ा मशक्कत का काम था। कागज को मोड़ कर लोहे की बकुचिया में डालना भी होता था। इस बार थोड़ी सहूलियत रही। एक बटन इधर से दबा तो पें, तो उधर से पीं की आवाज। इवीएम से पें-पीं कराने के लिये माμा दो आदमी चाहिये। ज्यादा ममता झरने लगे तो उसे गोद में लेकर किसी तालाब के किनारे भी बैठा जा सकता है। लेकिन इस बार सरकारी और गैर सरकारी तौर पर साइंसदांओं की संख्या कम थी। इसलिये बकरीनुमा इवीएम ने दूध कम दिया गंदगी ज्यादा फैलायी। इसलिये कहीं-कहीं लोगों ने भन्ना कर गले पर छुरी ही फेर दी। गोद में उठाने वाले नासमझों ने भी कुछ ऐसा ही किया। इवीएम की इस बार हुई मिट्टी पलीद नेमतदान का कोई और तरीका, ताकि बीएलजी से बचा जा सके, तलाशने पर मजबूर कर दिया है। प्रधानमंμाी के एसएमएस प्रचार पर भी विशेषज्ञों का ध्यान गया है। हो सकता है कि अगले चुनाव में जनता एसएमएस के जरिये वोट डाले। इसमें मतदाता का कोड वगैरह पूछा जायेगा और पहचान ठीक निकलने पर फिर एक आवाज आयेगी कि किस चुनाव चिन्ह को लॉक करना है। मतदाता ने अपनी पसंद बता दी तो आवाज आयेगी-फूट ले, पड़ गया तेरा वोट। बर्बरीक ने क्वेरी की-तो बीएलजी का क्या होगा? जवाब था-कुछ नहीं, चुनाव चिन्ह आवंटित होते ही घर-घर की दीवारों पर एक खोपड़ी का निशान, उसके ऊपर पीबीएलजी के मालिक का चुनाव चिन्ह और दोनों के बीच में लाल रंग से लिखा होगा वरना। इस सिस्टम से सरकार का मोटा-मोटा नौ हजार और प्राइवेट सेक्टर का साढ़े नौ हजार करोड़ शर्तिया बचेगा।
जिस किसी सज्जन ने इस चुनाव में वोट डालने के लिये मतदान केंद्रों पर इवीएम रखवायी, उसको शत्-शत् प्रणाम और जिसने उसकी मानी उसको एक सौ एक बार। ऐसा लगा, जैसे हर बूथ पर बकरी बैठा दी गयी हो। बस हाथ आगे बढ़ाया और पें-पें,पीं-पीं की आवाज करते हुए गोद में दुबक जाना। पर भले आदमी को यह तो सोचना चाहिये था कि जब देश का मतदाता नेताओं की मेहरबानी से आल्हा-ऊदल बना हुआ हो, जगह-जगह खुले राजनीति के जिम्नेजियमों में पट्ठे तैयार किये जा रहे हों तब बकरीनुमा इवीएम नहीं बल्कि परे हट जैसी डीटीएम यानी दे थप्पड़ मशीन की दरकार थी, जो मिमियाती नहीं, बल्कि दहाड़ती और प्यार से गोद में लेने वाले के गाल पर काट लेती, कान या नाक उखाड़ लेती। तब इसे गोद में उठाने का जोखिम बड़े-बड़े सूरमा न उठाते। दूर खड़े हु-तू-तू करते रहते। बर्बरीक से इस बार के अतिशांतिपूर्ण मतदान की चर्चा कर रहे उस कठफोड़वे को यही नाराजगी थी कि अब तक किसी प्रत्याशी या दल ने उसे अपना चुनाव चिन्ह क्यों नहीं बनाया। इस बारे में बर्बरीक उसे समझा भी चुका था कि चुनाव चिन्ह बनने से तो अच्छा है कि वह चुनाव ही लड़ ले। बहरहाल इसकी चर्चा बाद में।कठफोड़वे के मुताबिक जैसे देश की आजादी के बाद विद्यार्थियों को सैन्य प्रशिक्षण देने के लिये नेशनल कैडेट कोर की स्थापना हुई, इसी तरह 1952 को हुए पहले चुनाव में एक छोटा सा ग्रुप बना था, नाम रखा गया बीएलजी ग्रुप (बूथ लूट गैंग), जो आज राष्ट्रीय फलक पर छा चुका है। बीएलजी सभी दलों को समान रूप से अपनी सेवाएं देता है। कुछ पुराने धनी-मानी लोग निजी ग्रुप यानी पीबीएलजी बनाते हैं, जो मेम साहब के लिये अचार बनाने को गर्मियों में पेड़ों से कच्चे आम तोड़ते हैं, शर्बत के लिये पके बेल, सब्जी के लिये कटहल और बालों में लगाने के लिये किस्म-किस्म के फूल। किसी गमी के समय गेंदे के फूलों की माला भी यही तैयार करते हैं। लाम पर जाते समय ये दल सुईं से लेकर एके 47 तक से लैस रहते हैं। पिछली बार तक वोट कागजी होता था, पेट पालने वाले के चुनाव चिन्ह, जो चुकंदर से लेकर ऊदबिलाव कुछ भी हो सकता है, के आगे ठप्पा लगाना होता था। यह बड़ा मशक्कत का काम था। कागज को मोड़ कर लोहे की बकुचिया में डालना भी होता था। इस बार थोड़ी सहूलियत रही। एक बटन इधर से दबा तो पें, तो उधर से पीं की आवाज। इवीएम से पें-पीं कराने के लिये माμा दो आदमी चाहिये। ज्यादा ममता झरने लगे तो उसे गोद में लेकर किसी तालाब के किनारे भी बैठा जा सकता है। लेकिन इस बार सरकारी और गैर सरकारी तौर पर साइंसदांओं की संख्या कम थी। इसलिये बकरीनुमा इवीएम ने दूध कम दिया गंदगी ज्यादा फैलायी। इसलिये कहीं-कहीं लोगों ने भन्ना कर गले पर छुरी ही फेर दी। गोद में उठाने वाले नासमझों ने भी कुछ ऐसा ही किया। इवीएम की इस बार हुई मिट्टी पलीद नेमतदान का कोई और तरीका, ताकि बीएलजी से बचा जा सके, तलाशने पर मजबूर कर दिया है। प्रधानमंμाी के एसएमएस प्रचार पर भी विशेषज्ञों का ध्यान गया है। हो सकता है कि अगले चुनाव में जनता एसएमएस के जरिये वोट डाले। इसमें मतदाता का कोड वगैरह पूछा जायेगा और पहचान ठीक निकलने पर फिर एक आवाज आयेगी कि किस चुनाव चिन्ह को लॉक करना है। मतदाता ने अपनी पसंद बता दी तो आवाज आयेगी-फूट ले, पड़ गया तेरा वोट। बर्बरीक ने क्वेरी की-तो बीएलजी का क्या होगा? जवाब था-कुछ नहीं, चुनाव चिन्ह आवंटित होते ही घर-घर की दीवारों पर एक खोपड़ी का निशान, उसके ऊपर पीबीएलजी के मालिक का चुनाव चिन्ह और दोनों के बीच में लाल रंग से लिखा होगा वरना। इस सिस्टम से सरकार का मोटा-मोटा नौ हजार और प्राइवेट सेक्टर का साढ़े नौ हजार करोड़ शर्तिया बचेगा।
दिल को न बेकरार कर
राजीव मित्तल
हमाम में सब नंगे क्या कोई गाली होती है बॉब? कभी रोमन साम्राज्य में थी चैनली, पर अब नहीं है। अब यह विश्लेषण है कुछ इस तरह का जैसे माशूका अपने आशिक को कहे-तुम बिल्कुल पागल हो। शरत के उपन्यासों में ऐसे विश्लेषण कई जगह मिल जायेंगे। पर बॅाब, यह तो उन लोगों के लिये इस्तेमाल हुआ है, जिन्हें हम एक महीने से इमामदस्ते में कूट रहे हैं। गलतफहमी में हो, अगर कूट रही हो तो अपने हाथ दुखा रही हो, जैसे पटना हाईकोर्ट ने अपना गला दुखा लिया है। तिलचट्टे की खासियत जानती हो चैनली? इस ब्रह्मांड के सबसे बेशरम जीवों में शुमार है वह। सुना है कि कई लाख साल बर्फ में दबा पड़ा काकरोच बर्फ के पिघलते ही जाग गया और शुरू हो गया ठुमक चलत राम चंद। हमाम में सब नंगे इनसे काफी प्रेरणा पाते हैं। अब देखो न, कानून ने फिर अपना गला दुखा लिया। इतरा भी रहा होगा कि अहा, कइयों के पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी। अब यह मत कहना कि इसका क्या मतलब होता है। नहीं, नहीं बॅाब मैं समझ गयी। इसका मतलब है रोना आवे न आवे हंसी पापे लगा ले गले। अरी मूर्खा, अब पापे क्या कर लेंगे। फिलहाल अभी तो उनकी हवा संट है। की जा रही थी शेर की सवारी, अब उस पर से उतरें कैसे। और फिर पता नहीं कितनों के मुंह का निवाला छिन जायेगा। रसोईघरों में कबूतरियां घोंसले बना कर अंडे देंगी। चूल्हे पे बिल्ली सोती मिलेगी। आंटे के कनस्तर में कनखजूरे पाये जायेंगे। है ईश्वर, कौवे के मोती चुगने से नहीं, बल्कि अब असली कलयुग आया है। हम थे जिनके सहारे वो हो गये बेचारे-बस यही आवाज जगह-जगह सुनायी पड़ रही है। क्यों ऐसा क्या हो गया बॅाब? अरे कैदियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की साजिश चल रही है। पर जेल में तो जेबकतरे, गंजेड़ी, उचक्के भेजे जाते हैं? नहीं, नहीं ये वो कैदी नहीं हैं, वो तो बेचारे आज भी जेल में किसी पप्पू यादव, शहाबुद्दीन या राजा भैया का पैर दबा रहे होंगे, मैं बात कर रहा हूं उन कैदियों की, जिनमें से एक की फोटो तुमने अखबार में छपी देखी थी, जिसने अस्पताल में दरबार लगा रखा था। पर वो तो कैदी नहीं कोई मिनिस्टर-विनिस्टर था शायद? यह तुम्हारी गल्ती नहीं चैनली, एक फिल्म में संजीव कुमार का डायलॅाग है कि शादी के पंद्रह साल बाद पति-पत्नी का चेहरा काफी मेल खाने लगता है, ठीक इसी तरह कैदी और मिनिस्टर में तुम्हें कोई फर्क नजर नहीं आ रहा। तो क्या हमारे मिनिस्टर भी......? ठहरो चैनली, किसी के पास्ट को मत घसीटो। महर्षि वाल्मीकि भी डाकू थे कभी। इस युग में माधोसिंह, मोहरसिंह, फूलनदेवी जैसे न जाने कितने उदाहरण हैं। हां, बॉब, इस बात से याद आया कि वीरप्पन क्यों अलग-थलग है भारतीय राजनीति से? उस पर भोंडसी बाबा की नजर नहीं पड़ी होगी। फिर वह नीलगिरि की पहाड़ियों में कुलाचें भरता है और दक्षिण के नेता पीते तो गाय का दूध हैं पर वे भैंस का दूध पीने वाले उत्तर भारतीयों की तरहसाहसी नहीं होते। जहां बीस पेड़ों का झुंड देखा, उसे जंगल मान कार का रुख शहर की तरफ मोड़ लेते हैं। फिर एक बात और है कि उत्तर भारत में वीरप्पन जैसी कई शख्सियत शहर में ही बस चुकी हैं, उनसे कॉन्टेक्ट करना काफी आसान होता है। वे भी मुख्य धारा में हाथ-पांव चलाने को बेचैन रहते हैं। अब देखो न, बुंदेलखंड के वाल्मीकि ददुआ ने अपने दो-चार ठो एमएलए बनवा दिये हैं। अगली बार हो सकता है कि वो खुद भी सांसद बन जाएं। भारतीय राजनीति का का रंग हर चुनाव में गुलमोहर के फूलों की तरह चटकता जा रहा था कि आ गया नासपीटा ये फैसला। आशा की एक छोटी सी किरण इन सरकारों पर टिकी है, जो कानून वगैरह में पलीता दिखा कर अपने इन मेकरों के लिये जरूर कुछ करेंगी। आखिर लोकतंμा भी तो कुछ होता है चैनली, कोई जंगल राज थोड़े न है!
हमाम में सब नंगे क्या कोई गाली होती है बॉब? कभी रोमन साम्राज्य में थी चैनली, पर अब नहीं है। अब यह विश्लेषण है कुछ इस तरह का जैसे माशूका अपने आशिक को कहे-तुम बिल्कुल पागल हो। शरत के उपन्यासों में ऐसे विश्लेषण कई जगह मिल जायेंगे। पर बॅाब, यह तो उन लोगों के लिये इस्तेमाल हुआ है, जिन्हें हम एक महीने से इमामदस्ते में कूट रहे हैं। गलतफहमी में हो, अगर कूट रही हो तो अपने हाथ दुखा रही हो, जैसे पटना हाईकोर्ट ने अपना गला दुखा लिया है। तिलचट्टे की खासियत जानती हो चैनली? इस ब्रह्मांड के सबसे बेशरम जीवों में शुमार है वह। सुना है कि कई लाख साल बर्फ में दबा पड़ा काकरोच बर्फ के पिघलते ही जाग गया और शुरू हो गया ठुमक चलत राम चंद। हमाम में सब नंगे इनसे काफी प्रेरणा पाते हैं। अब देखो न, कानून ने फिर अपना गला दुखा लिया। इतरा भी रहा होगा कि अहा, कइयों के पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी। अब यह मत कहना कि इसका क्या मतलब होता है। नहीं, नहीं बॅाब मैं समझ गयी। इसका मतलब है रोना आवे न आवे हंसी पापे लगा ले गले। अरी मूर्खा, अब पापे क्या कर लेंगे। फिलहाल अभी तो उनकी हवा संट है। की जा रही थी शेर की सवारी, अब उस पर से उतरें कैसे। और फिर पता नहीं कितनों के मुंह का निवाला छिन जायेगा। रसोईघरों में कबूतरियां घोंसले बना कर अंडे देंगी। चूल्हे पे बिल्ली सोती मिलेगी। आंटे के कनस्तर में कनखजूरे पाये जायेंगे। है ईश्वर, कौवे के मोती चुगने से नहीं, बल्कि अब असली कलयुग आया है। हम थे जिनके सहारे वो हो गये बेचारे-बस यही आवाज जगह-जगह सुनायी पड़ रही है। क्यों ऐसा क्या हो गया बॅाब? अरे कैदियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की साजिश चल रही है। पर जेल में तो जेबकतरे, गंजेड़ी, उचक्के भेजे जाते हैं? नहीं, नहीं ये वो कैदी नहीं हैं, वो तो बेचारे आज भी जेल में किसी पप्पू यादव, शहाबुद्दीन या राजा भैया का पैर दबा रहे होंगे, मैं बात कर रहा हूं उन कैदियों की, जिनमें से एक की फोटो तुमने अखबार में छपी देखी थी, जिसने अस्पताल में दरबार लगा रखा था। पर वो तो कैदी नहीं कोई मिनिस्टर-विनिस्टर था शायद? यह तुम्हारी गल्ती नहीं चैनली, एक फिल्म में संजीव कुमार का डायलॅाग है कि शादी के पंद्रह साल बाद पति-पत्नी का चेहरा काफी मेल खाने लगता है, ठीक इसी तरह कैदी और मिनिस्टर में तुम्हें कोई फर्क नजर नहीं आ रहा। तो क्या हमारे मिनिस्टर भी......? ठहरो चैनली, किसी के पास्ट को मत घसीटो। महर्षि वाल्मीकि भी डाकू थे कभी। इस युग में माधोसिंह, मोहरसिंह, फूलनदेवी जैसे न जाने कितने उदाहरण हैं। हां, बॉब, इस बात से याद आया कि वीरप्पन क्यों अलग-थलग है भारतीय राजनीति से? उस पर भोंडसी बाबा की नजर नहीं पड़ी होगी। फिर वह नीलगिरि की पहाड़ियों में कुलाचें भरता है और दक्षिण के नेता पीते तो गाय का दूध हैं पर वे भैंस का दूध पीने वाले उत्तर भारतीयों की तरहसाहसी नहीं होते। जहां बीस पेड़ों का झुंड देखा, उसे जंगल मान कार का रुख शहर की तरफ मोड़ लेते हैं। फिर एक बात और है कि उत्तर भारत में वीरप्पन जैसी कई शख्सियत शहर में ही बस चुकी हैं, उनसे कॉन्टेक्ट करना काफी आसान होता है। वे भी मुख्य धारा में हाथ-पांव चलाने को बेचैन रहते हैं। अब देखो न, बुंदेलखंड के वाल्मीकि ददुआ ने अपने दो-चार ठो एमएलए बनवा दिये हैं। अगली बार हो सकता है कि वो खुद भी सांसद बन जाएं। भारतीय राजनीति का का रंग हर चुनाव में गुलमोहर के फूलों की तरह चटकता जा रहा था कि आ गया नासपीटा ये फैसला। आशा की एक छोटी सी किरण इन सरकारों पर टिकी है, जो कानून वगैरह में पलीता दिखा कर अपने इन मेकरों के लिये जरूर कुछ करेंगी। आखिर लोकतंμा भी तो कुछ होता है चैनली, कोई जंगल राज थोड़े न है!
क्योंकि अभी बहू के पैर भारी हैं
rajiv mittal
बॉब, ऐसा नहीं लग रहा कि जैसे बुखारी और अटल चौराहे पे एक साथ खडे¸ हो अजान दे रहे हों और साथ ही तुलसी की चौपायी भी गा रहे हों। पिछले दो महीने में भाजपा में ऐसा क्या बदलाव आ गया कि बुखारी को शहाबुद्दीन बीमार हाथी नजर आ रहे हैं और सेक्यूलर शब्द से उनका पित्त एकाएक उभर आया है? चैनली ऐसे दो महीने, अगर केन्द्र के किसी चौधरी को बीच में ही डायरिया न हो गया हो तो, पांच साल में जरूर आते हैं। ठीक उसी तरह जैसे बारह साल बाद कुम्भ या चार साल बाद फरवरी का 29 वां दिन। इन दो महीनों के दौरान कैसी भी कलिहारी सास हो, अपनी बहू को लक्ष्मी, दुर्गा, साविμाी वगैरह वगैरह का दर्जा दे उसका गुणगान मुंडेर पर बैठे कौवे और दर-ओ-दीवार तक से करती है। सुबह-शाम अरहर की दाल में एक्सट्रा घी डालती है। रात में उसके सिर में नारियल का तेल मलती है। रिश्तेदारी में भेजते वक्त उसे अपने उसे हाथों से सजाती है और बेटे को ताकीद करती रहती है कि रात को खाली हाथ न आये, साथ में बहू के लिये मिठाई या फल जरूर हो। सिर्फ दो महीने बॅाब? क्योेंकि उस समय तक सास के कान में रह-रह कर जच्चा-बच्चा केंद्र से पोते के रिरियाने की आवाज सुनायी पड़ने लगती हैं। भारतीय राजनीति में ऐसे ही दो महीने आत्ममंथन के कहलाते हैं और उस मंथन से निकले गरल को नौसादर के पानी में मिला कर उसका अर्क तैयार किया जाता है, जिसे हर नेता रोज सुबह-शाम एक औंस पीता है। इसको पीने के बाद चार पूर्णमासी तक सुबह आसमान में लाली छाते ही दुश्मन की दुश्मनाई और दोस्ती की गर्माहट दोनों का किसी तालाब, नदी या नाले में तर्पण किया जाता है। इससे सुर बदलने में प्राकृतिक-अप्राकृतिक दोनों तरह से मदद मिलती है। ऐसा कोई क्षण नहीं, जब नेता कव्वाली गाते न दिखें। इन दो महीनों के अखबारी या टीवी पर दिये बयान देखो चैनली, लगता ही नहीं कि सप्ताह सात दिन का होता है। रविवार के बाद एकदम शनिवार आ धमकता है तो मंगल की चोंचें गुरुवार से लड़ रही होती हैं। गाय और सूअर का, लाठी और फूल का, जूते और छेने के रसगुल्ले का, बंदूक और कैडबरीज की गोली का फर्क खत्म हो जाता है। गोधरा सलीम चिश्ती की मजार बन जाता है। गोवा से उठे भगवा स्वर हरे-हरे नजर आने लगते हैं। चांद का मुंह टेढ़ा और सूरज का सातवां घोड़ा आंखों के सामने तैरने लगते हैं। अटल जी राष्ट्रीय झंडे के तीसरे कलर पर कुर्बान रहते हैं। बगल में खड़ा कोई विधर्मी दांतों को कंदरा से चार फुटआगे निकाले होता है। किसी मौलवी का और अटल जी का गला एक-दूसरे मेें ऐसे फंसा होता है जैसे ये दुनिया हो या वो दुनिया हम साथ न छोड़ेंगे। हां, बॅाब, टीवी पर तो आगे के भी दृष्य होते हैं और साथ में डायलाग भी। हे-हे-हू-हू-ही-ही के बाद अरे अब तक कहां थे मेरी जान के दुश्मन के उच्चारण के बाद फिर एक ठहाका। चैनली, यह राजनीति जो न करा दे। आमने-सामने की खिड़की पे खड़े हो लुच्चई की सीमा पार कर चार साल दस महीने एक दूसरे को गरियाने वाले एकाएक गुलाबजामुन की प्लेटें लिये एक और, ऐसे नहीं चलेगा, डायबटीज हो आपके दुश्मनों को, भाभी जी आप इनका ख्याल नहीं रखतीं, अले-अले मुन्ना कितना बड़ा हो गया जैसी सितार और तबले की जुगलबंदी दो महीने चलती है। अगला दूसरे की दाढ़ी खुजाता है तो पिछला अगले के बाल सहलाता है। अच्छा बॅाब, अगर भ्रूण टेस्ट किसी अनाड़ी के हाथों हुआ और पोते की जगह पोती जन्मी तो? फिर तो वही हजार साल से गूंज रही बबूल के कांटों जैसी ललिता पवार के मुंह से निकलीं आवाजें-कुलच्छनी, जनमजली, मनहूस के पैर पड़ते ही हरा-भरा घर सांय-सांय करने लगा और गोधरा भी फिर चमकने लगता है शमशीर की तरह।
बॉब, ऐसा नहीं लग रहा कि जैसे बुखारी और अटल चौराहे पे एक साथ खडे¸ हो अजान दे रहे हों और साथ ही तुलसी की चौपायी भी गा रहे हों। पिछले दो महीने में भाजपा में ऐसा क्या बदलाव आ गया कि बुखारी को शहाबुद्दीन बीमार हाथी नजर आ रहे हैं और सेक्यूलर शब्द से उनका पित्त एकाएक उभर आया है? चैनली ऐसे दो महीने, अगर केन्द्र के किसी चौधरी को बीच में ही डायरिया न हो गया हो तो, पांच साल में जरूर आते हैं। ठीक उसी तरह जैसे बारह साल बाद कुम्भ या चार साल बाद फरवरी का 29 वां दिन। इन दो महीनों के दौरान कैसी भी कलिहारी सास हो, अपनी बहू को लक्ष्मी, दुर्गा, साविμाी वगैरह वगैरह का दर्जा दे उसका गुणगान मुंडेर पर बैठे कौवे और दर-ओ-दीवार तक से करती है। सुबह-शाम अरहर की दाल में एक्सट्रा घी डालती है। रात में उसके सिर में नारियल का तेल मलती है। रिश्तेदारी में भेजते वक्त उसे अपने उसे हाथों से सजाती है और बेटे को ताकीद करती रहती है कि रात को खाली हाथ न आये, साथ में बहू के लिये मिठाई या फल जरूर हो। सिर्फ दो महीने बॅाब? क्योेंकि उस समय तक सास के कान में रह-रह कर जच्चा-बच्चा केंद्र से पोते के रिरियाने की आवाज सुनायी पड़ने लगती हैं। भारतीय राजनीति में ऐसे ही दो महीने आत्ममंथन के कहलाते हैं और उस मंथन से निकले गरल को नौसादर के पानी में मिला कर उसका अर्क तैयार किया जाता है, जिसे हर नेता रोज सुबह-शाम एक औंस पीता है। इसको पीने के बाद चार पूर्णमासी तक सुबह आसमान में लाली छाते ही दुश्मन की दुश्मनाई और दोस्ती की गर्माहट दोनों का किसी तालाब, नदी या नाले में तर्पण किया जाता है। इससे सुर बदलने में प्राकृतिक-अप्राकृतिक दोनों तरह से मदद मिलती है। ऐसा कोई क्षण नहीं, जब नेता कव्वाली गाते न दिखें। इन दो महीनों के अखबारी या टीवी पर दिये बयान देखो चैनली, लगता ही नहीं कि सप्ताह सात दिन का होता है। रविवार के बाद एकदम शनिवार आ धमकता है तो मंगल की चोंचें गुरुवार से लड़ रही होती हैं। गाय और सूअर का, लाठी और फूल का, जूते और छेने के रसगुल्ले का, बंदूक और कैडबरीज की गोली का फर्क खत्म हो जाता है। गोधरा सलीम चिश्ती की मजार बन जाता है। गोवा से उठे भगवा स्वर हरे-हरे नजर आने लगते हैं। चांद का मुंह टेढ़ा और सूरज का सातवां घोड़ा आंखों के सामने तैरने लगते हैं। अटल जी राष्ट्रीय झंडे के तीसरे कलर पर कुर्बान रहते हैं। बगल में खड़ा कोई विधर्मी दांतों को कंदरा से चार फुटआगे निकाले होता है। किसी मौलवी का और अटल जी का गला एक-दूसरे मेें ऐसे फंसा होता है जैसे ये दुनिया हो या वो दुनिया हम साथ न छोड़ेंगे। हां, बॅाब, टीवी पर तो आगे के भी दृष्य होते हैं और साथ में डायलाग भी। हे-हे-हू-हू-ही-ही के बाद अरे अब तक कहां थे मेरी जान के दुश्मन के उच्चारण के बाद फिर एक ठहाका। चैनली, यह राजनीति जो न करा दे। आमने-सामने की खिड़की पे खड़े हो लुच्चई की सीमा पार कर चार साल दस महीने एक दूसरे को गरियाने वाले एकाएक गुलाबजामुन की प्लेटें लिये एक और, ऐसे नहीं चलेगा, डायबटीज हो आपके दुश्मनों को, भाभी जी आप इनका ख्याल नहीं रखतीं, अले-अले मुन्ना कितना बड़ा हो गया जैसी सितार और तबले की जुगलबंदी दो महीने चलती है। अगला दूसरे की दाढ़ी खुजाता है तो पिछला अगले के बाल सहलाता है। अच्छा बॅाब, अगर भ्रूण टेस्ट किसी अनाड़ी के हाथों हुआ और पोते की जगह पोती जन्मी तो? फिर तो वही हजार साल से गूंज रही बबूल के कांटों जैसी ललिता पवार के मुंह से निकलीं आवाजें-कुलच्छनी, जनमजली, मनहूस के पैर पड़ते ही हरा-भरा घर सांय-सांय करने लगा और गोधरा भी फिर चमकने लगता है शमशीर की तरह।
उजाड़ जनवासे में अब्दुल्ला दीवाना
राजीव मित्तल
बॉब, सत्ता देवी को ब्याहने चली वो बारात कहां गयी, जिसकी घुड़चढ़ी 22 अप्रैल को हुई थी और 26 को द्वारचार, फेरों का क्या हुआ? जनवासे में तो शहनाई भी नहीं बज रही। वो देखो चैनली, वहां वो सब एक-एक कोना पकड़े हैं। वाह क्या बात है, चिंतन करते हुए ये सब कितने गम्भीर दिखते हैं न बॉब -पर ये देश या देशवासियों की चिन्ता में लीन नहीं हैं, ये सब तो शतरंज खेल रहे हैं। पर, इनके चेहरे गोभी के बासी फूल की तरह मुरझाये हुए क्यों हैं? अरे घुड़चढ़ी से पहले ही लोटे भर-भर पिया फीलगुड अपच कर गया, इसलिये देख नहीं रही हो चैनली कि हर किसी का दूसरे के पेट पर फेरता हाथ है। पर, बॉब फेरों से पहले की वो ठिठोली भी तो कहीं नजर नहीं आ रही।चैनली, एक तो अपची माहौल ऊपर से इस बार सात फेरे कराने वाले पंडत ने फच्चर डाल दिया है। वो क्यों? इसलिये कि एक ही साइत में कई सारे दूल्हे यहां मजमा लगा बैठे हैं। वो देखो न यहां-वहां कई मोरपंखी नजर आयेंगे तुम्हें। यह तो तुम्हारे द्वापर के समय का स्वंयवर वाला सीन लग रहा है बॅाब। चौपड़ा की महाभारत में देखा था कि द्रोपदी को ब्याहने कैसे-कैसे झाऊमल पहुंचे थे। अब आगे क्या होगा यह तो बताओ। अरे, मैं क्या बताऊं, मंμा पढ़ने वाले पंडत ने कुछ समझाया है कन्या और इन वरों के पक्षों वालों को तभी तो शतरंज की बिसात तो बिछी हुई है। ऐसा कैसे हो गया बॉब? बारात तो एक ही दूल्हे को लेकर चली थी न? असल में घुड़चढ़ी के वक्त लड़की का भाई वहां मौजूद था, उसे दूल्हे की चाल पर थोड़ा शक हुआ। शक तब और गहरा गया जब दूल्हा घोड़े से उतर कर वरमाल के लिये जनवासे की तरफ बड़ा। उसकी एक टांग लचक मार रही थी। वरमाला लिये खड़ी लड़की को तुरंत वापस अंदर किया गया और एक आर्थियोपेडिक को बुलवा लिया। उसने दूल्हे से कहा, जाओ, दौड़ कर लाल बत्ती छू कर आओ, चाल देखते ही उसने कह दिया कि एक टांग छोटी है। तो ये और दूल्हे कहां से आ टपके? चैनली, दुल्हन का बाप नगरनिगम का बड़ा ठेकेदार है और लड़की खूबसूरत है और ये सब भी ठेकेदारी करते हैं सड़क को खड़ंजे में बदलने की, खेतों को बंजर बनाने की, उद्योगों को ईंट का भट्ठा बनाने की, स्कूलों को बिजली का दफ्तर बनाने की, अस्पतालों को रेलवे प्लेटफार्म बनाने की। तो लड़की का बाप इनमें से किसी गबरू को पसंद क्यों नहीं कर लेता? इसके लिये पंडत ने चंद्रग्रहण के अगले दिन सभी दूल्हों के लिये ऊंची कूद और दस तारीख को लम्बी छलांग रखी है। उसके बाद सबको इमला बोल कर लिखायाजायेगा, उसके बाद ही कुछ बजेगा यहां। तो चैनली, बात घुड़चढ़ी, फीलगुड का अपच, दूल्हे की लचक, झाऊमलों के धरने से होते हुए चंद्रग्रहण तक आ पहुंची है, तब तक दुल्हन क्या करेगी? बॉब, वो तो अपने में मस्त है, देखो अपनी पालतू बिल्ली से कैसे खेल रही है। चैनली, तुम्हें एक राज की बात बताऊं, इनमें से कइयों की वह ब्याहता रह चुकी है और इन सभी को गेट तक खदेड़ चुकी है। तो ये नदीदे फिर उसी के दर पर पहुंच गये बॅाब!
बॉब, सत्ता देवी को ब्याहने चली वो बारात कहां गयी, जिसकी घुड़चढ़ी 22 अप्रैल को हुई थी और 26 को द्वारचार, फेरों का क्या हुआ? जनवासे में तो शहनाई भी नहीं बज रही। वो देखो चैनली, वहां वो सब एक-एक कोना पकड़े हैं। वाह क्या बात है, चिंतन करते हुए ये सब कितने गम्भीर दिखते हैं न बॉब -पर ये देश या देशवासियों की चिन्ता में लीन नहीं हैं, ये सब तो शतरंज खेल रहे हैं। पर, इनके चेहरे गोभी के बासी फूल की तरह मुरझाये हुए क्यों हैं? अरे घुड़चढ़ी से पहले ही लोटे भर-भर पिया फीलगुड अपच कर गया, इसलिये देख नहीं रही हो चैनली कि हर किसी का दूसरे के पेट पर फेरता हाथ है। पर, बॉब फेरों से पहले की वो ठिठोली भी तो कहीं नजर नहीं आ रही।चैनली, एक तो अपची माहौल ऊपर से इस बार सात फेरे कराने वाले पंडत ने फच्चर डाल दिया है। वो क्यों? इसलिये कि एक ही साइत में कई सारे दूल्हे यहां मजमा लगा बैठे हैं। वो देखो न यहां-वहां कई मोरपंखी नजर आयेंगे तुम्हें। यह तो तुम्हारे द्वापर के समय का स्वंयवर वाला सीन लग रहा है बॅाब। चौपड़ा की महाभारत में देखा था कि द्रोपदी को ब्याहने कैसे-कैसे झाऊमल पहुंचे थे। अब आगे क्या होगा यह तो बताओ। अरे, मैं क्या बताऊं, मंμा पढ़ने वाले पंडत ने कुछ समझाया है कन्या और इन वरों के पक्षों वालों को तभी तो शतरंज की बिसात तो बिछी हुई है। ऐसा कैसे हो गया बॉब? बारात तो एक ही दूल्हे को लेकर चली थी न? असल में घुड़चढ़ी के वक्त लड़की का भाई वहां मौजूद था, उसे दूल्हे की चाल पर थोड़ा शक हुआ। शक तब और गहरा गया जब दूल्हा घोड़े से उतर कर वरमाल के लिये जनवासे की तरफ बड़ा। उसकी एक टांग लचक मार रही थी। वरमाला लिये खड़ी लड़की को तुरंत वापस अंदर किया गया और एक आर्थियोपेडिक को बुलवा लिया। उसने दूल्हे से कहा, जाओ, दौड़ कर लाल बत्ती छू कर आओ, चाल देखते ही उसने कह दिया कि एक टांग छोटी है। तो ये और दूल्हे कहां से आ टपके? चैनली, दुल्हन का बाप नगरनिगम का बड़ा ठेकेदार है और लड़की खूबसूरत है और ये सब भी ठेकेदारी करते हैं सड़क को खड़ंजे में बदलने की, खेतों को बंजर बनाने की, उद्योगों को ईंट का भट्ठा बनाने की, स्कूलों को बिजली का दफ्तर बनाने की, अस्पतालों को रेलवे प्लेटफार्म बनाने की। तो लड़की का बाप इनमें से किसी गबरू को पसंद क्यों नहीं कर लेता? इसके लिये पंडत ने चंद्रग्रहण के अगले दिन सभी दूल्हों के लिये ऊंची कूद और दस तारीख को लम्बी छलांग रखी है। उसके बाद सबको इमला बोल कर लिखायाजायेगा, उसके बाद ही कुछ बजेगा यहां। तो चैनली, बात घुड़चढ़ी, फीलगुड का अपच, दूल्हे की लचक, झाऊमलों के धरने से होते हुए चंद्रग्रहण तक आ पहुंची है, तब तक दुल्हन क्या करेगी? बॉब, वो तो अपने में मस्त है, देखो अपनी पालतू बिल्ली से कैसे खेल रही है। चैनली, तुम्हें एक राज की बात बताऊं, इनमें से कइयों की वह ब्याहता रह चुकी है और इन सभी को गेट तक खदेड़ चुकी है। तो ये नदीदे फिर उसी के दर पर पहुंच गये बॅाब!
चुनाव से पहले चुनाव के बाद
राजीव मित्तल
चैनली, ये सब एक-दूसरे पर बिफर क्यों रहे हैं? बॉब, 10 मई तक चलेगा ये सब क्योंकि यही परम्परा है, अलिखित, अघोषित। उसके बाद? उसके बाद जो जिसपे बिफरा, उसको फोन पे कहेगा, आओ न-बागों में बहार है, फूलों पे निखार है, दुश्मनाई की चिकनाई से बढ़ गये कोलस्ट्रॉल को किसी फार्म हाउस में बैठ कर दूर करें, मिल कर गाएं-नाचें। और जो नहीं बिफरा वो? वो अगले से यही कहेगा-मैं जानता था कि तुमने जो मुझे संसदीय गालियां दीं, दिल से नहीं दीं और जो असंसदीय कहा, उसका इसलिये मलाल नहीं कि ऐसे लोग दिल के साफ होते हैं। तभी बगल की शाख पे बैठी चील चिल्लाती हुई उड़ी-मिल गया, मिल गया। पर 10 मिनट बाद ही उदास सी उड़ती हुई आ गयी। क्या हुआ री, तेरी चोंच खाली क्यों है? सोचा था अपने मियां को और पडौ¸सियों को कर बुला उस लाश को नोचूंगी, पर वहां जा कर देखा तो इंसानों की भीड़ पहले से ही लगी है। यह तो अच्छी बात है, अब उसे सद्गति तो मिल जायेगी। चील भन्नायी-पर वहां तो झांय-झांय चल रही है कि इसे तूने मारा-तूने मारा। एक तरफ किसी अस्पताल के डाक्टर हैं तो दूसरी तरफ कुछ नेता और उनके पटाखे। जरा समझा के बता चिल्लो-बर्बरीक ने कहा। बात यह हुई कि एक गर्भवती बच्चा जनने अस्पताल में भर्ती हुई थी। किसमें-अपोलो में या किसी सरकारी में? बीच में मत बोलो-दोनों से निकला मरघट को ही जाता है फर्क ले जाने और अंतिम संस्कार करने का है बस। तो हुआ यूं कि बच्चा पैदा होने से पहले ही मर गया। डाक्टर को करना बस इतना था कि पेट चीर कर मरा बच्चा निकाल देता। लेकिन उस बेचारी के शरीर में खून की कमी होने से ऑपरेशन नहीं हो सका और सौ से कुछ कम घंटे तड़पने के बाद अपने अजन्मे बच्चे के पीछे चल दी। चैनली झल्ला कर बोली-तो इसमें नयी बात क्या है? अरे सुन तो-पेट में बच्चे के मर जाने और खुद उसके मरने के बीच बड़ा नाटक हुआ। चुनाव खत्म हो जाने से बोर हो रहे नेता अपने पिट्ठुओं से चंपी करा रहे थे कि उन्हें अस्पताल में भर्ती उस 25 साल की जच्चा की खराब हालत की खबर लगी तो शुरू हो गया पचास साल पुराना नेताई खेल। डाक्टर को फोन पे फोन जाने लगे-अरे गरीब की हाय न ले, बचा ले उसे। डाक्टर ने कहा- क्या अपना खून दे कर उसकी जान बचाऊं, आ जाओ सब, दो-दो बूंद भी दे दोगे तो ऑपरेशन हो जाएगा। तो अगले ने फोन पर कहा-अरे तो ब्लड बैंक की तिजोरी क्यों नहीं खोल देता, हमारी तरफ से दो बोतलों की सील तोड़ दे और चढ़ा दे उसे। अरे ऐसे कैसे तोड़ दूं सील, नियम-कायदा कुछ है कि नहीं, सरकारी नियम है कि खून दो और खून लो। अरे तो उसके घर वालों का निकाल ले भाई। ऐसे कैसे निकाल लूं? घर वालों का तो हिमोग्लोबीन काफी नीचे चला गया है, जिसका भी निकालूंगा, वही अस्पताल के बिस्तर पर पसर जायेगा। आप केवल दो लोगों को भेज दो, थोड़ा सा हीनिकालूंगा बाईगॅाड। देखो डाक्टर हम खून बहाते हैं, बोतलों में भरने के लिये नहीं है हमारा खून। और फिर तुमने वो किताब तो पढ़ी ही होगी कि सौ बूंद खून बनाने के लिये कितना बादाम और काजू घोंटना पड़ता है और एक हजार खून की बूंदों से एक बूंद वीर्य की बनती है। बेवकूफ तुम हमसे खून नहीं हमारे पौरुष की शान मांग रहे हो, शर्म नहीं आती। डाक्टर भी भड़क गया-तो भैये मरने दे न उसे, बच्चा तो चला ही गया। बढ़ती आबादी पर कुछ तो रोक लगेगी। बात तो ठीक कह रहे हो डाक्टर, पर मरी तो तुम्हारी खैर नहीं। दिल्ली तक से फोन आ रहे हैं, तुमको भी आया होगा। मरे या जिये मैं नियम नहीं तोड़ूंगा। बॅाब, अगर यही केस चुनाव से दो दिन पहले का होता तो ये सब अपना खून देने को लाइन लगा देते ताकि जच्चा के घर वालों के तो वोट पक्के हो ही जाएं। वैसे तू लाश पर चक्कर लगा कर ही क्यों आ गयी? अरे पेट में मरा बच्चा भी तो था न, मुझसे न नोचा गया।
चैनली, ये सब एक-दूसरे पर बिफर क्यों रहे हैं? बॉब, 10 मई तक चलेगा ये सब क्योंकि यही परम्परा है, अलिखित, अघोषित। उसके बाद? उसके बाद जो जिसपे बिफरा, उसको फोन पे कहेगा, आओ न-बागों में बहार है, फूलों पे निखार है, दुश्मनाई की चिकनाई से बढ़ गये कोलस्ट्रॉल को किसी फार्म हाउस में बैठ कर दूर करें, मिल कर गाएं-नाचें। और जो नहीं बिफरा वो? वो अगले से यही कहेगा-मैं जानता था कि तुमने जो मुझे संसदीय गालियां दीं, दिल से नहीं दीं और जो असंसदीय कहा, उसका इसलिये मलाल नहीं कि ऐसे लोग दिल के साफ होते हैं। तभी बगल की शाख पे बैठी चील चिल्लाती हुई उड़ी-मिल गया, मिल गया। पर 10 मिनट बाद ही उदास सी उड़ती हुई आ गयी। क्या हुआ री, तेरी चोंच खाली क्यों है? सोचा था अपने मियां को और पडौ¸सियों को कर बुला उस लाश को नोचूंगी, पर वहां जा कर देखा तो इंसानों की भीड़ पहले से ही लगी है। यह तो अच्छी बात है, अब उसे सद्गति तो मिल जायेगी। चील भन्नायी-पर वहां तो झांय-झांय चल रही है कि इसे तूने मारा-तूने मारा। एक तरफ किसी अस्पताल के डाक्टर हैं तो दूसरी तरफ कुछ नेता और उनके पटाखे। जरा समझा के बता चिल्लो-बर्बरीक ने कहा। बात यह हुई कि एक गर्भवती बच्चा जनने अस्पताल में भर्ती हुई थी। किसमें-अपोलो में या किसी सरकारी में? बीच में मत बोलो-दोनों से निकला मरघट को ही जाता है फर्क ले जाने और अंतिम संस्कार करने का है बस। तो हुआ यूं कि बच्चा पैदा होने से पहले ही मर गया। डाक्टर को करना बस इतना था कि पेट चीर कर मरा बच्चा निकाल देता। लेकिन उस बेचारी के शरीर में खून की कमी होने से ऑपरेशन नहीं हो सका और सौ से कुछ कम घंटे तड़पने के बाद अपने अजन्मे बच्चे के पीछे चल दी। चैनली झल्ला कर बोली-तो इसमें नयी बात क्या है? अरे सुन तो-पेट में बच्चे के मर जाने और खुद उसके मरने के बीच बड़ा नाटक हुआ। चुनाव खत्म हो जाने से बोर हो रहे नेता अपने पिट्ठुओं से चंपी करा रहे थे कि उन्हें अस्पताल में भर्ती उस 25 साल की जच्चा की खराब हालत की खबर लगी तो शुरू हो गया पचास साल पुराना नेताई खेल। डाक्टर को फोन पे फोन जाने लगे-अरे गरीब की हाय न ले, बचा ले उसे। डाक्टर ने कहा- क्या अपना खून दे कर उसकी जान बचाऊं, आ जाओ सब, दो-दो बूंद भी दे दोगे तो ऑपरेशन हो जाएगा। तो अगले ने फोन पर कहा-अरे तो ब्लड बैंक की तिजोरी क्यों नहीं खोल देता, हमारी तरफ से दो बोतलों की सील तोड़ दे और चढ़ा दे उसे। अरे ऐसे कैसे तोड़ दूं सील, नियम-कायदा कुछ है कि नहीं, सरकारी नियम है कि खून दो और खून लो। अरे तो उसके घर वालों का निकाल ले भाई। ऐसे कैसे निकाल लूं? घर वालों का तो हिमोग्लोबीन काफी नीचे चला गया है, जिसका भी निकालूंगा, वही अस्पताल के बिस्तर पर पसर जायेगा। आप केवल दो लोगों को भेज दो, थोड़ा सा हीनिकालूंगा बाईगॅाड। देखो डाक्टर हम खून बहाते हैं, बोतलों में भरने के लिये नहीं है हमारा खून। और फिर तुमने वो किताब तो पढ़ी ही होगी कि सौ बूंद खून बनाने के लिये कितना बादाम और काजू घोंटना पड़ता है और एक हजार खून की बूंदों से एक बूंद वीर्य की बनती है। बेवकूफ तुम हमसे खून नहीं हमारे पौरुष की शान मांग रहे हो, शर्म नहीं आती। डाक्टर भी भड़क गया-तो भैये मरने दे न उसे, बच्चा तो चला ही गया। बढ़ती आबादी पर कुछ तो रोक लगेगी। बात तो ठीक कह रहे हो डाक्टर, पर मरी तो तुम्हारी खैर नहीं। दिल्ली तक से फोन आ रहे हैं, तुमको भी आया होगा। मरे या जिये मैं नियम नहीं तोड़ूंगा। बॅाब, अगर यही केस चुनाव से दो दिन पहले का होता तो ये सब अपना खून देने को लाइन लगा देते ताकि जच्चा के घर वालों के तो वोट पक्के हो ही जाएं। वैसे तू लाश पर चक्कर लगा कर ही क्यों आ गयी? अरे पेट में मरा बच्चा भी तो था न, मुझसे न नोचा गया।
सबसे कम जान जाने का सुख
राजीव मित्तल
अगर मापतोल का बाट सही हो तो सामान ठीक तुलता है। पर मौतों का मामला थोड़ा उलट है, अगर बाट में गड़बड़ है तो सामान तो कम मिलेगा ही, मौते भी ज्यादा होती हैं। पर तराजू और बाट सही होने से अब देखो न चैनली, चुनाव आयोग से लेकर शासन-प्रशासन तक एक अजीब सा सुख तारी है इस बार। यही है बैलेंस ऑफ टेरर का सिद्धांत, जो दो बांके से उपजता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे ही शीत युद्ध कहा गया था। जब सोवियत संघ इस धरती पे मौजूद था तो क्या मजाल कि अमेरिका के कैनेडी, जॉनसन, निक्सन चादर से पांव बाहर निकाल भी लें। दोनों के अपने-अपने तखत थे उसी पे जो जितनी चाहे अंगड़ाई ले लो। सोवियत संघ होता तो क्या दोनों बुश बाप-बेटे इस तरह दूसरों की धोतियों पर हाथ साफ करने की हिमाकत कर सकते थे? नहीं समझी- रायफल के सामने लट्ठ या हंसिया की क्या बिसात! रायफल के सामने तो रायफल ही होनी चाहिये, जो अब सबके पास है। सो, खून-खराबा चूमने-चाटने जैसा रहा। हां बॅाब, बात तो सही है। पिछले चुनावों के मुकाबले एक बटा दस का हिसाब बैठ रहा है इस बार मरने वालों का। चैनली, संतुलन और जनता की समझदारी ने इस बार सारा खेल बिगाड़ दिया। एक जमाना था, जब गाजे-बाजे के साथ मतदान होता था। लुग्गे-लुगाई नये नकोर कपड़ों में गाते-बजाते वोट डालने जाते थे, उन्हें बुलाना नहीं पड़ता था, बंदूक भी नहीं दिखानी पड़ती थी। क्योंकि तब राजनीति धंधा नहीं थी, कुछ-कुछ मृणाल सेन की फिल्मों जैसी थी। अब अगर मर्द वोट डालने जाता है तो औरत उसकी जान की खैर के लिये व्रत रखती है और औरत जाती है तो मर्द किसी पेड़ पर बैठा उसकी राह तकता मिलता है। तो चैनली, मेले में भीड़ ही नहीं होगी तो वहां हुए किसी भी हादसे में लोग तो कम ही मरेंगे न। तो वोट डालना अब एक हादसे से गुजरने जैसा हो गया है। क्योंकि राजनीति एक घटिया किस्म का धंधा बन गयी है, जो अब मासूमों को डराने लगी है, तो महाबलियों को 50 राइफल के मुकाबले सौ पिस्तौल रखने को मजबूर करने लगी है। पहले हर इलाके में एकाध की पूंछ और मूंछ दोनों झव्वेदार दिख जाया करती थीं, जो 10-5 को धकेल कर अपने नेताजी के नाम पर ठप्पे लगवा दिया करती थीं। अब नत्थुलालों की भरमार है। इनमें आधे उधर-आधे इधर। तो राजनीति के इन दो-दो हाथ और दो-दो पांव ने उसे एक ऐसा चौपाया बना दिया है, जिसकी चाल बैलेंस पकड़ रही है। वोट कम नोट ज्यादा और तुरही बजाने वालों की भरमार। अब देखो न प्रधानमंμाी जी ही अपने क्षेμा में कितने वोट गिरवा पाये! दस्तरखान बिछे रह गये, पर 80 फीसदी मुसलमानों ने झांक कर नहीं देखा। जबकि न किसी टेरर था न कोई हॉरर। बुखारी की अपील सड़े दूध की मलाई साबित हुई। तो बॉब, वोटों का कम पड़ना अच्छी स्थिति तो नहीं है? चैनली, बात तो सही है। इतना तामझाम! दो महीने तक बारात को टिकाये रखा और शादी के दिन वही मूंग की दाल और जौ की रोटी। तेलगी और रंजीत डॉन की हेल्प ली जाये तो इतनी सिटकनियों औरदरवज्जों का इंतजाम करने की जरूरत नहीं रह जाएगी। मुम्बई के कालबादेवी रोड की एक कुठरिया में सारा काम हो जायेगा। मतदाता उंगली पर काला निशान लगवाये न लगवाये हार-जीत का अंतर करोड़ों में होगा बस लोकतंμा जरूर दमे का शिकार हो जायेगा।
अगर मापतोल का बाट सही हो तो सामान ठीक तुलता है। पर मौतों का मामला थोड़ा उलट है, अगर बाट में गड़बड़ है तो सामान तो कम मिलेगा ही, मौते भी ज्यादा होती हैं। पर तराजू और बाट सही होने से अब देखो न चैनली, चुनाव आयोग से लेकर शासन-प्रशासन तक एक अजीब सा सुख तारी है इस बार। यही है बैलेंस ऑफ टेरर का सिद्धांत, जो दो बांके से उपजता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे ही शीत युद्ध कहा गया था। जब सोवियत संघ इस धरती पे मौजूद था तो क्या मजाल कि अमेरिका के कैनेडी, जॉनसन, निक्सन चादर से पांव बाहर निकाल भी लें। दोनों के अपने-अपने तखत थे उसी पे जो जितनी चाहे अंगड़ाई ले लो। सोवियत संघ होता तो क्या दोनों बुश बाप-बेटे इस तरह दूसरों की धोतियों पर हाथ साफ करने की हिमाकत कर सकते थे? नहीं समझी- रायफल के सामने लट्ठ या हंसिया की क्या बिसात! रायफल के सामने तो रायफल ही होनी चाहिये, जो अब सबके पास है। सो, खून-खराबा चूमने-चाटने जैसा रहा। हां बॅाब, बात तो सही है। पिछले चुनावों के मुकाबले एक बटा दस का हिसाब बैठ रहा है इस बार मरने वालों का। चैनली, संतुलन और जनता की समझदारी ने इस बार सारा खेल बिगाड़ दिया। एक जमाना था, जब गाजे-बाजे के साथ मतदान होता था। लुग्गे-लुगाई नये नकोर कपड़ों में गाते-बजाते वोट डालने जाते थे, उन्हें बुलाना नहीं पड़ता था, बंदूक भी नहीं दिखानी पड़ती थी। क्योंकि तब राजनीति धंधा नहीं थी, कुछ-कुछ मृणाल सेन की फिल्मों जैसी थी। अब अगर मर्द वोट डालने जाता है तो औरत उसकी जान की खैर के लिये व्रत रखती है और औरत जाती है तो मर्द किसी पेड़ पर बैठा उसकी राह तकता मिलता है। तो चैनली, मेले में भीड़ ही नहीं होगी तो वहां हुए किसी भी हादसे में लोग तो कम ही मरेंगे न। तो वोट डालना अब एक हादसे से गुजरने जैसा हो गया है। क्योंकि राजनीति एक घटिया किस्म का धंधा बन गयी है, जो अब मासूमों को डराने लगी है, तो महाबलियों को 50 राइफल के मुकाबले सौ पिस्तौल रखने को मजबूर करने लगी है। पहले हर इलाके में एकाध की पूंछ और मूंछ दोनों झव्वेदार दिख जाया करती थीं, जो 10-5 को धकेल कर अपने नेताजी के नाम पर ठप्पे लगवा दिया करती थीं। अब नत्थुलालों की भरमार है। इनमें आधे उधर-आधे इधर। तो राजनीति के इन दो-दो हाथ और दो-दो पांव ने उसे एक ऐसा चौपाया बना दिया है, जिसकी चाल बैलेंस पकड़ रही है। वोट कम नोट ज्यादा और तुरही बजाने वालों की भरमार। अब देखो न प्रधानमंμाी जी ही अपने क्षेμा में कितने वोट गिरवा पाये! दस्तरखान बिछे रह गये, पर 80 फीसदी मुसलमानों ने झांक कर नहीं देखा। जबकि न किसी टेरर था न कोई हॉरर। बुखारी की अपील सड़े दूध की मलाई साबित हुई। तो बॉब, वोटों का कम पड़ना अच्छी स्थिति तो नहीं है? चैनली, बात तो सही है। इतना तामझाम! दो महीने तक बारात को टिकाये रखा और शादी के दिन वही मूंग की दाल और जौ की रोटी। तेलगी और रंजीत डॉन की हेल्प ली जाये तो इतनी सिटकनियों औरदरवज्जों का इंतजाम करने की जरूरत नहीं रह जाएगी। मुम्बई के कालबादेवी रोड की एक कुठरिया में सारा काम हो जायेगा। मतदाता उंगली पर काला निशान लगवाये न लगवाये हार-जीत का अंतर करोड़ों में होगा बस लोकतंμा जरूर दमे का शिकार हो जायेगा।
और शवासन से उठ खड़े हुए खैरखाह
राजीव मित्तल
बॉब, बांछें खिलना किसे कहते हैं? सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद जिस तरह नत्थुलालों की मूछों ने जुम्बिश ली और बदन ने अंगड़ाई, उसे बांछें खिलना कह सकते हैं चैनली। पर ऐसा होना नहीं चाहिये था! तो परेशान क्यों होती हो, महाभारत का एक किस्सा सुनो। शिखंडी की आड़ लेकर अर्जुन के चलाये तीरों ने भीष्म पितामह को इस कदर बींध कर रख दिया कि जब वो गिरे तो उनकी पीठ नहीं, तीर जमीन पर टिके। तीरों की शैय्या पर लेटे-लेटे एक दिन पितामह ने कराहते हुए कृष्ण से पूछा-वासुदेव मैं अपने पिछले जितने जीवन झांक सकता था, खंगाल लिये पर किसी में भी ऐसे बुरे कर्म नहीं दिखे, जिनकी सजा आज भुगतनी पड़ रही है। कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले-पितामह, और पीछे जाइये आपका एक जीवन ऐसा है जिसमें का किया आज आप भुगत रहे हैं। पितामह शांत हो गये। तो चैनली, उस फैसले के आते ही सारे दल और उनके नत्थुलाल वज्रासन लगा कर बैठ गये थे ताकि सांस तो ठीक से आये। इस फैसले ने इन सभी को ओह-आह करने से बचा लिया। पर कब तक! एक दिन ये सब फिलहाल रोके गये फैसले से बिंधे पड़े होंगे तो इनके सवाल का जवाब देने अब कृष्ण तो आयेंगे नहीं। और इनके पास सवाल होगा भी क्या कि किस जन्म का बदला है यह! कृष्ण होते भी तो बेचारे बांसुरी बजाने के सिवाय और कुछ न करते। मोटी खाल बर्फ तोड़ने वाले सुएं से छिदती है आत्मा से उठती गूंजों से नहीं। तभी तो अखबारों की लीड है कि सबने राहत की सांस ली। और इनके खैरखाह? उनकी तो सांसें तक उल्टी चलने लगी थीं, सबको उठा-उठा कर जमीन पर लिटा दिया गया था। अब सब डांडिया कर रहे हैं। एक नत्थुलाल का बयान आया है कि उसे बाहुबली कहे जाने पर ऐतराज है। वह जेल में है तो इसलिये कि गांधी जी ने जहां अपनी लड़ाई अधूरी छोड़ी थी वहां से उसने शुरुआत की है, जो सत्ता को रास नहीं आयी इसलिये उसको देख जेल के दरवाजे अपने आप खुल जाते हैं चाहे आने की मुद्रा हो या जाने की। एक सज्जन के पेट में अब काफी राहत है, पानी भी नहीं पचा पा रहे थे, कल से मूंग का दलिया लिया है। डकार और हवा दोनों पास हो जाने के बाद वे बोले कि यही तो, और हमें क्या चाहिये। हमारे लिये जेल कर्मभूमि है। पहले थोड़ा ज्ञान होता तो शादी ब्याह भी यहीं करते। कम से कम अब चुनाव तो लड़ने दिया करो भलेमानुसों। तो ताड़ीवानों को एम डी की डिग्री नवाजने वाले सज्जन ने फौरन इच्छा जाहिर की कि उनका बयान नोट किया जाये कि मेरी तरफ से फैसला सुनाने वालों के दो-दो बच्चों को संगीत विशारद की डिग्री फ्री, किसी पμाकार ने टोका किअगर बच्चा गूंगा निकला, तो डिग्री डॅान का सवालरूपी जवाब था-आवाज तो निकलती है न, चिन्ता नहीं। अभी खैरख्वाहों ने जुबान नहीं खोली है क्योंकि पता नहीं कब क्या हो जाये। कुछ सीटों पर तो कुदृष्टि पड़ ही गयी है कि जब उनके नत्थू जेल में बंद थे तो अपने इलाके में कैसे नजर आये। खैरख्वाहों के सरकारी कारिंदे तो फंस ही गये हैं। और वे खुद अपने क्षेμाों के कुओं में मुंह डाल कर बस यही आवाजें निकाल रहे हैं- पुनर्मतदान-पुनर्मतदान।
बॉब, बांछें खिलना किसे कहते हैं? सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद जिस तरह नत्थुलालों की मूछों ने जुम्बिश ली और बदन ने अंगड़ाई, उसे बांछें खिलना कह सकते हैं चैनली। पर ऐसा होना नहीं चाहिये था! तो परेशान क्यों होती हो, महाभारत का एक किस्सा सुनो। शिखंडी की आड़ लेकर अर्जुन के चलाये तीरों ने भीष्म पितामह को इस कदर बींध कर रख दिया कि जब वो गिरे तो उनकी पीठ नहीं, तीर जमीन पर टिके। तीरों की शैय्या पर लेटे-लेटे एक दिन पितामह ने कराहते हुए कृष्ण से पूछा-वासुदेव मैं अपने पिछले जितने जीवन झांक सकता था, खंगाल लिये पर किसी में भी ऐसे बुरे कर्म नहीं दिखे, जिनकी सजा आज भुगतनी पड़ रही है। कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले-पितामह, और पीछे जाइये आपका एक जीवन ऐसा है जिसमें का किया आज आप भुगत रहे हैं। पितामह शांत हो गये। तो चैनली, उस फैसले के आते ही सारे दल और उनके नत्थुलाल वज्रासन लगा कर बैठ गये थे ताकि सांस तो ठीक से आये। इस फैसले ने इन सभी को ओह-आह करने से बचा लिया। पर कब तक! एक दिन ये सब फिलहाल रोके गये फैसले से बिंधे पड़े होंगे तो इनके सवाल का जवाब देने अब कृष्ण तो आयेंगे नहीं। और इनके पास सवाल होगा भी क्या कि किस जन्म का बदला है यह! कृष्ण होते भी तो बेचारे बांसुरी बजाने के सिवाय और कुछ न करते। मोटी खाल बर्फ तोड़ने वाले सुएं से छिदती है आत्मा से उठती गूंजों से नहीं। तभी तो अखबारों की लीड है कि सबने राहत की सांस ली। और इनके खैरखाह? उनकी तो सांसें तक उल्टी चलने लगी थीं, सबको उठा-उठा कर जमीन पर लिटा दिया गया था। अब सब डांडिया कर रहे हैं। एक नत्थुलाल का बयान आया है कि उसे बाहुबली कहे जाने पर ऐतराज है। वह जेल में है तो इसलिये कि गांधी जी ने जहां अपनी लड़ाई अधूरी छोड़ी थी वहां से उसने शुरुआत की है, जो सत्ता को रास नहीं आयी इसलिये उसको देख जेल के दरवाजे अपने आप खुल जाते हैं चाहे आने की मुद्रा हो या जाने की। एक सज्जन के पेट में अब काफी राहत है, पानी भी नहीं पचा पा रहे थे, कल से मूंग का दलिया लिया है। डकार और हवा दोनों पास हो जाने के बाद वे बोले कि यही तो, और हमें क्या चाहिये। हमारे लिये जेल कर्मभूमि है। पहले थोड़ा ज्ञान होता तो शादी ब्याह भी यहीं करते। कम से कम अब चुनाव तो लड़ने दिया करो भलेमानुसों। तो ताड़ीवानों को एम डी की डिग्री नवाजने वाले सज्जन ने फौरन इच्छा जाहिर की कि उनका बयान नोट किया जाये कि मेरी तरफ से फैसला सुनाने वालों के दो-दो बच्चों को संगीत विशारद की डिग्री फ्री, किसी पμाकार ने टोका किअगर बच्चा गूंगा निकला, तो डिग्री डॅान का सवालरूपी जवाब था-आवाज तो निकलती है न, चिन्ता नहीं। अभी खैरख्वाहों ने जुबान नहीं खोली है क्योंकि पता नहीं कब क्या हो जाये। कुछ सीटों पर तो कुदृष्टि पड़ ही गयी है कि जब उनके नत्थू जेल में बंद थे तो अपने इलाके में कैसे नजर आये। खैरख्वाहों के सरकारी कारिंदे तो फंस ही गये हैं। और वे खुद अपने क्षेμाों के कुओं में मुंह डाल कर बस यही आवाजें निकाल रहे हैं- पुनर्मतदान-पुनर्मतदान।
तेरह की अपशकुनी से निपटते कौए
राजीव मित्तल
गुप्ता जी ने कह दिया है कि पेट में मरोड़ लाने वाले गुरुवार को अटल जी सबसे ज्यादा मस्त रहेंगे क्योंकि उस दिन 13 तारीख है। पर चौदह का अंक तो उनको सबसे ज्यादा सूट करेगा क्योंकि उस दिन पद्मासन लगाये शनि का झुकाव बांयी ओर होगा। सोनिया जी जब तक अमावस्या के अगले दिन वाला बारीक सा चांद देख कबूतर को दाना नहीं डालेंगी, तब तक वह उस कुर्सी के बारे में सोचें भी नहीं। वीपी सिंह के फिर से प्रधानमंμाी बनने के आसार हैं अगर वे 20 तारीख तक रोज सुबह-शाम संघ की शाखा में जा कर झंडारोहण करें और राज्यसभा का रास्ता पकड़ें। चंद्रशेखर तो सपने भी न सोचें क्योंकि भोंडसी आश्रम में रहते वह बगैर आचमन किये दाढ़ी रंगते थे। देवेगौड़ा सोते समय मुंह में अंगूठा डाल लिया करें तो कुछ चांसेज बनते हैं और गुजराल की आधी दाढ़ी ही उनके कैरियर को नुकसान पहुंचा रही है। चैनली यह सब पढ़ने में मगन थी कि सामने वाले मैदान में देखा कि कुछ बहेलिये कौए पकड़ रहे हैं। उसने बर्बरीक वाले पेड़ से नीचे उतर कर फौरन तहकीकात की तो पता चला कि उस शाम कई सारे होने-न होने वाले सांसद अपनी फेमिलियों के साथ यहां आयेंगे क्योंकि शर्मा जी, अरोड़ा जी, संत तरुवरि और मां कावेरी 13 की तेरहवीं दूर करने को उनके हाथों से कौओं को नारियल पीठी खिलायेंगे। शाम चार बजे तक 264 कौए जाल में फांसे जा चुके थे। अंधेरा छाते ही वहां गैस के हंडे जला दिये गये और मैदान भर में लोबान का धुंआ कर दिया गया। चंद्रमा निकलते-निकलते वहां 57 प्रत्याशी सपरिवार पहुंच चुके थे। मां कावेरी तांगे से आयीं। और बाकी सज्जन शिष्यों के कंधों पर सवार थे। उनके आते ही चार जाजम बिछा दिये गये और चारों के विराजते ही उनके जजमान उन्हें घेर के बैठ गये। सबसे पहले तय यह हुआ कि अगर एक ही ज्योतिषी के दो जजमान उम्मीदवार एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं तो वे अपने-अपने बाल बच्चों को लेकर दूसरे ज्योतिष के पास चले जायें अन्यथा कौए कन्फ्यूज हो जायेंगे। तभी किसी ने कहीं से भोंपू निकाला और दो बार हेलो-हलो, वन-टू-थ्री कहने के बाद असल बात पे आया कि जिस-जिस ज्योतिषी के बहेलिये ने जितने कौए पकड़े हैं वह उन्हें ले कर अपने-अपने ठिकाने पर पहुंच जायें। कोई भी कौआ दूसरे के डेरे पर न जा पाये क्योंकि वे ही आज की रात जजमान के भगवान हैं। अब चारों ज्योतिषी अपने-अपने कौओं को संभालें और दूसरे का हथियाने की कोशिश कतई न करें। एक ज्योतिषी ने अपने कौओं के चारों ओर घीके दिये जला कर रख दिये और झोले से पांडुलिपि निकाल कर जोर-जोर से पढ़ने लगा, जो किसी की समझ में नहीं आ रहा था। एक चेले ने बताया कि वह आदम-हव्वा संहिता है। एक ने हारमोनियम पर कांटा लगा की तर्ज पर कोई धार्मिक गीत गाना शुरू कर दिया। तीसरे सज्जन अपने कमंडल से पानी हथेली में लेकर चारों ओर छिड़कने लगे। मां कावेरी ने ताश की गड्डी निकाली और दो बार फेंट कर एक-एक पत्ते को अपने कौओं के सिरों पर छुआने लगीं। तभी वहां उड़ान भर रहे चिमगादड़ों को देख सभी कौओं ने शोर मचाना शुरू कर दिया तो भोंपू से आवाज निकली, समय आ गया है 13 की तेरहीं दूर करने का। सब जजमान अपने-अपने ज्योतिषियों के सामने अपना लाया नारियल पीठी और 501-501 रुपये रख दें और बिना पीछे मुड़े यहां से निकल जायें क्योंकि ये कौए तभी गुरुजी के हाथ से पीठी खायेंगे। कौए जितने मन से पीठी खायेंगे तेरह का अंक आपके उतना ही अनुकूल बैठेगा जितना श्रद्धेय वाजपेयी को बैठ रहा है। पर तभी चैनली ने चिल्ली मार कर सब किया धरा चौपट कर दिया कि गुप्ता जी ने तो वाजपेयी जी के लिये 14 का अंक ज्यादा शुभ बताया है। और तब तक नारियल पीठी खा कर कौए भी उड़ चुके थे। कांटा लगा भी बंद हो चुका था।
गुप्ता जी ने कह दिया है कि पेट में मरोड़ लाने वाले गुरुवार को अटल जी सबसे ज्यादा मस्त रहेंगे क्योंकि उस दिन 13 तारीख है। पर चौदह का अंक तो उनको सबसे ज्यादा सूट करेगा क्योंकि उस दिन पद्मासन लगाये शनि का झुकाव बांयी ओर होगा। सोनिया जी जब तक अमावस्या के अगले दिन वाला बारीक सा चांद देख कबूतर को दाना नहीं डालेंगी, तब तक वह उस कुर्सी के बारे में सोचें भी नहीं। वीपी सिंह के फिर से प्रधानमंμाी बनने के आसार हैं अगर वे 20 तारीख तक रोज सुबह-शाम संघ की शाखा में जा कर झंडारोहण करें और राज्यसभा का रास्ता पकड़ें। चंद्रशेखर तो सपने भी न सोचें क्योंकि भोंडसी आश्रम में रहते वह बगैर आचमन किये दाढ़ी रंगते थे। देवेगौड़ा सोते समय मुंह में अंगूठा डाल लिया करें तो कुछ चांसेज बनते हैं और गुजराल की आधी दाढ़ी ही उनके कैरियर को नुकसान पहुंचा रही है। चैनली यह सब पढ़ने में मगन थी कि सामने वाले मैदान में देखा कि कुछ बहेलिये कौए पकड़ रहे हैं। उसने बर्बरीक वाले पेड़ से नीचे उतर कर फौरन तहकीकात की तो पता चला कि उस शाम कई सारे होने-न होने वाले सांसद अपनी फेमिलियों के साथ यहां आयेंगे क्योंकि शर्मा जी, अरोड़ा जी, संत तरुवरि और मां कावेरी 13 की तेरहवीं दूर करने को उनके हाथों से कौओं को नारियल पीठी खिलायेंगे। शाम चार बजे तक 264 कौए जाल में फांसे जा चुके थे। अंधेरा छाते ही वहां गैस के हंडे जला दिये गये और मैदान भर में लोबान का धुंआ कर दिया गया। चंद्रमा निकलते-निकलते वहां 57 प्रत्याशी सपरिवार पहुंच चुके थे। मां कावेरी तांगे से आयीं। और बाकी सज्जन शिष्यों के कंधों पर सवार थे। उनके आते ही चार जाजम बिछा दिये गये और चारों के विराजते ही उनके जजमान उन्हें घेर के बैठ गये। सबसे पहले तय यह हुआ कि अगर एक ही ज्योतिषी के दो जजमान उम्मीदवार एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं तो वे अपने-अपने बाल बच्चों को लेकर दूसरे ज्योतिष के पास चले जायें अन्यथा कौए कन्फ्यूज हो जायेंगे। तभी किसी ने कहीं से भोंपू निकाला और दो बार हेलो-हलो, वन-टू-थ्री कहने के बाद असल बात पे आया कि जिस-जिस ज्योतिषी के बहेलिये ने जितने कौए पकड़े हैं वह उन्हें ले कर अपने-अपने ठिकाने पर पहुंच जायें। कोई भी कौआ दूसरे के डेरे पर न जा पाये क्योंकि वे ही आज की रात जजमान के भगवान हैं। अब चारों ज्योतिषी अपने-अपने कौओं को संभालें और दूसरे का हथियाने की कोशिश कतई न करें। एक ज्योतिषी ने अपने कौओं के चारों ओर घीके दिये जला कर रख दिये और झोले से पांडुलिपि निकाल कर जोर-जोर से पढ़ने लगा, जो किसी की समझ में नहीं आ रहा था। एक चेले ने बताया कि वह आदम-हव्वा संहिता है। एक ने हारमोनियम पर कांटा लगा की तर्ज पर कोई धार्मिक गीत गाना शुरू कर दिया। तीसरे सज्जन अपने कमंडल से पानी हथेली में लेकर चारों ओर छिड़कने लगे। मां कावेरी ने ताश की गड्डी निकाली और दो बार फेंट कर एक-एक पत्ते को अपने कौओं के सिरों पर छुआने लगीं। तभी वहां उड़ान भर रहे चिमगादड़ों को देख सभी कौओं ने शोर मचाना शुरू कर दिया तो भोंपू से आवाज निकली, समय आ गया है 13 की तेरहीं दूर करने का। सब जजमान अपने-अपने ज्योतिषियों के सामने अपना लाया नारियल पीठी और 501-501 रुपये रख दें और बिना पीछे मुड़े यहां से निकल जायें क्योंकि ये कौए तभी गुरुजी के हाथ से पीठी खायेंगे। कौए जितने मन से पीठी खायेंगे तेरह का अंक आपके उतना ही अनुकूल बैठेगा जितना श्रद्धेय वाजपेयी को बैठ रहा है। पर तभी चैनली ने चिल्ली मार कर सब किया धरा चौपट कर दिया कि गुप्ता जी ने तो वाजपेयी जी के लिये 14 का अंक ज्यादा शुभ बताया है। और तब तक नारियल पीठी खा कर कौए भी उड़ चुके थे। कांटा लगा भी बंद हो चुका था।
भारतीय राजनीति को रसातल से निकालने के उपाए
राजीव मित्तल
रसातल के पेंदे को छू रही भारतीय राजनीति को लेकर चिंतित नेताछाप बुद्धिजीवी वर्ग ने एक सेमिनार आयोजित किया। विषय रखा गया ‘राजनीति का डाल्फिनीकरण करने के उपाय’। कुछ ने डाल्फिनीकरण शब्द पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि जब हमें ही समझ में नहीं आ रहा तो राजनीति में अभी जिनका रैपर भी नहीं उतरा है उन चिकनबाजों, दारूबाजों, बटमारों, सेंधमारों और खालिस चार सौ बीसियों को हम क्या खाक समझा पाएंगे जबकि यही लोग हमारी चिंता से जुड़े विषय का अभिन्न अंग हैं।
खैर, समझने-समझाने के लिये चिकने कागज पर बनी डाल्फिन की तस्वीरों की किताब लायी गयी। तस्वीरों में उछाल मारती, मुंह खोलती, अठखेलियां करती डाल्फिन और उसको गाइड करती एक खूबसूरत युवती मौजूद थी। तस्वीरें देख एकाध की राय बनी कि क्यों न भारतीय राजनीति को इस युवती जैसा खूबसूरत बनाया जाये। जब उन्हें समझाया गया कि मामला रसातल से उबारने का है न कि खूबसूरत बनाने का, तो किसी ने एक तस्वीर छांट कर दिखायी कि यह देखो उबरने की जीती जागती मिसाल.........खूबसूरत बाला कितनी खूबसूरती से पानी में डुबकी लगा कर ऊपर आ रही है.......मिल गयी न राजनीति को उबारने की तस्वीर!!!!!!!
चिंतन में नेताओं की किस्म को बूझते हुए डाल्फिन और युवती दोनों को विषय से बाहर कर दिया गया। फिर स्वेट मार्टन की किताब ‘नेता कैसे बनें’ को चर्चा का विषय बनाने का सुझाव उछला.... जिसमें उसने ऐसा कुछ जरूर लिखा होगा.. जो भारतीय राजनीति के पुनरोद्धार में सहायक हो। तभी एक ने कहा कि इस मामले में रितु बेरी को क्यों न टटोला जाये। उस पर सवाल और ऊपर उछला कि एक फैशन डिजायनर का राजनीति से क्या वास्ता।.... क्यों अगर उसके डिजायन किये कपड़ों से हमारा व्यक्तित्व निखर सकता है तो राजनीति में निखार अपने आप ही आ जाएगा ...... भाईसाब....... यहां निखारने की नहीं.. उबारने की बात हो रही है। लेकिन हम तो अपने को तो निखारते आ रहे हैं.....इसमें नया क्या है.....उस निखारने का राजनीति पर खाक असर पड़ा! बात तो सही है....लेकिन .. देखा नहीं कि कुछ साल पहले हुए एक सर्वेक्षण में आडवाणी जी को निखरों में अव्वल का खिताब मिला था। छोड़ो छोड़ो.....वो हैं वो नहीं हैं दोनों एक समान....
क्यों न राजनीति को केंचुआ छाप बनाया जाये!!!!! अभी क्या कम है क्या, किसी ने ठेका लगाया। .... बात को पहले समझो... देखो अब तक हमारा समाज केंचुए को रीढ़ की हड्डी से जोड़ कर नकारात्मक रवैया अख्तियार करता रहा है, जबकि केंचुए से ज्यादा कोई सकारात्मक प्राणी है इस दुनिया में! कुछ करे तो भी, कुछ न करे तो भी।
पर..... एक सवाल यहां खड़ा होता है बंधु कि केंचुए की विष्ठा ज्यादा लाभकारी होती है जबकि हमें सिखाया गया है कि खा जाओ और डकार भी मत लो। इस विरोधाभास के चलते केंचुआ हमारा क्या मार्गदर्शन कर पायेगा। इस तर्क की सबने सिर हिला कर दाद दी।
तभी वामपंथी से लग रहे सज्जन ने हाथ से अवसर न जाने देने के लहजे में कहा... मार्क्स ने कहा है कि क्रांति बंदूक की गोली से आती है... एक बार उसका भी इस्तेमाल क्यों न कर के देख लें। इस पर कई भड़क गए-पहली बात तो हमें क्रांति की जरूरत नहीं, वैसे तुम कहना क्या चाहते हो, जिनको हम सुधारने की बात कर रहे हैं वे इस ठांये-ठूं से डर जायेंगे-----भाईजान, उनके पास जेल तक में असलहों की कमी नहीं होती। रोज सुबह-शाम जेल के सिपाही, दरोगा उन्हें रेत रगड़-रगड़ कर चमकाते हैं ताकि शाम को निशानेबाजी की प्रतियोगिता में उनकी चमक दिलों को दहलाए। और फिर अब तो..... कभी लाल किताब हाथ में लिये बगैर शौचालय में पैर न धरने वाले कई सूरमा मुख्य धारा में बिन बुलाये ही शामिल हो चुके हैं..... और बाकी.. समय का इंतजार कर रहे हैं बेहतर हिस्सेदारी के मिलने का।
अरे भाई.. इस तरह तो हम अपनी मंजिल तक ही नहीं पहुंच पायेंगे और भारतीय राजनीति रसातल में नाक तक धंस चुकी होगी। ऐसा करते हैं कि नयी संसद के बनने का इंतजार करें, जिसमें अब तीन साल रह गये हैं और सांसदों के शपथ लेने के बाद जो संसदीय कमेटियां बनेंगी उसमे से किसी एक को यह मामला सौंप देंगे जो प्रस्ताव बना कर दोनों सदनों में पारित करा लेगी। सबने ताली बजा कर सेमिनार के सफल समापन का स्वागत किया। उसके बाद सब ‘चुनावी राजनीति का 59 साल और हमारे इरादे’ विषयक गोष्ठी में हाजिरी बजाने चल पड़े।
खैर, समझने-समझाने के लिये चिकने कागज पर बनी डाल्फिन की तस्वीरों की किताब लायी गयी। तस्वीरों में उछाल मारती, मुंह खोलती, अठखेलियां करती डाल्फिन और उसको गाइड करती एक खूबसूरत युवती मौजूद थी। तस्वीरें देख एकाध की राय बनी कि क्यों न भारतीय राजनीति को इस युवती जैसा खूबसूरत बनाया जाये। जब उन्हें समझाया गया कि मामला रसातल से उबारने का है न कि खूबसूरत बनाने का, तो किसी ने एक तस्वीर छांट कर दिखायी कि यह देखो उबरने की जीती जागती मिसाल.........खूबसूरत बाला कितनी खूबसूरती से पानी में डुबकी लगा कर ऊपर आ रही है.......मिल गयी न राजनीति को उबारने की तस्वीर!!!!!!!
चिंतन में नेताओं की किस्म को बूझते हुए डाल्फिन और युवती दोनों को विषय से बाहर कर दिया गया। फिर स्वेट मार्टन की किताब ‘नेता कैसे बनें’ को चर्चा का विषय बनाने का सुझाव उछला.... जिसमें उसने ऐसा कुछ जरूर लिखा होगा.. जो भारतीय राजनीति के पुनरोद्धार में सहायक हो। तभी एक ने कहा कि इस मामले में रितु बेरी को क्यों न टटोला जाये। उस पर सवाल और ऊपर उछला कि एक फैशन डिजायनर का राजनीति से क्या वास्ता।.... क्यों अगर उसके डिजायन किये कपड़ों से हमारा व्यक्तित्व निखर सकता है तो राजनीति में निखार अपने आप ही आ जाएगा ...... भाईसाब....... यहां निखारने की नहीं.. उबारने की बात हो रही है। लेकिन हम तो अपने को तो निखारते आ रहे हैं.....इसमें नया क्या है.....उस निखारने का राजनीति पर खाक असर पड़ा! बात तो सही है....लेकिन .. देखा नहीं कि कुछ साल पहले हुए एक सर्वेक्षण में आडवाणी जी को निखरों में अव्वल का खिताब मिला था। छोड़ो छोड़ो.....वो हैं वो नहीं हैं दोनों एक समान....
क्यों न राजनीति को केंचुआ छाप बनाया जाये!!!!! अभी क्या कम है क्या, किसी ने ठेका लगाया। .... बात को पहले समझो... देखो अब तक हमारा समाज केंचुए को रीढ़ की हड्डी से जोड़ कर नकारात्मक रवैया अख्तियार करता रहा है, जबकि केंचुए से ज्यादा कोई सकारात्मक प्राणी है इस दुनिया में! कुछ करे तो भी, कुछ न करे तो भी।
पर..... एक सवाल यहां खड़ा होता है बंधु कि केंचुए की विष्ठा ज्यादा लाभकारी होती है जबकि हमें सिखाया गया है कि खा जाओ और डकार भी मत लो। इस विरोधाभास के चलते केंचुआ हमारा क्या मार्गदर्शन कर पायेगा। इस तर्क की सबने सिर हिला कर दाद दी।
तभी वामपंथी से लग रहे सज्जन ने हाथ से अवसर न जाने देने के लहजे में कहा... मार्क्स ने कहा है कि क्रांति बंदूक की गोली से आती है... एक बार उसका भी इस्तेमाल क्यों न कर के देख लें। इस पर कई भड़क गए-पहली बात तो हमें क्रांति की जरूरत नहीं, वैसे तुम कहना क्या चाहते हो, जिनको हम सुधारने की बात कर रहे हैं वे इस ठांये-ठूं से डर जायेंगे-----भाईजान, उनके पास जेल तक में असलहों की कमी नहीं होती। रोज सुबह-शाम जेल के सिपाही, दरोगा उन्हें रेत रगड़-रगड़ कर चमकाते हैं ताकि शाम को निशानेबाजी की प्रतियोगिता में उनकी चमक दिलों को दहलाए। और फिर अब तो..... कभी लाल किताब हाथ में लिये बगैर शौचालय में पैर न धरने वाले कई सूरमा मुख्य धारा में बिन बुलाये ही शामिल हो चुके हैं..... और बाकी.. समय का इंतजार कर रहे हैं बेहतर हिस्सेदारी के मिलने का।
अरे भाई.. इस तरह तो हम अपनी मंजिल तक ही नहीं पहुंच पायेंगे और भारतीय राजनीति रसातल में नाक तक धंस चुकी होगी। ऐसा करते हैं कि नयी संसद के बनने का इंतजार करें, जिसमें अब तीन साल रह गये हैं और सांसदों के शपथ लेने के बाद जो संसदीय कमेटियां बनेंगी उसमे से किसी एक को यह मामला सौंप देंगे जो प्रस्ताव बना कर दोनों सदनों में पारित करा लेगी। सबने ताली बजा कर सेमिनार के सफल समापन का स्वागत किया। उसके बाद सब ‘चुनावी राजनीति का 59 साल और हमारे इरादे’ विषयक गोष्ठी में हाजिरी बजाने चल पड़े।
आपदा और विपदा एक साथ!
राजीव मित्तल
चैनली, भारतीय लोकतंμा के दुखद क्षण करीब आते जा रहे हैं। 1757 में पलासी में राबर्ट क्लाइव की फौज से नवाब सिराजुद्दौला की हार के बाद शायद सबसे ज्यादा दिल को दुखाने वाला क्षण। ऐसी बोली क्यों निकाल रहे हो बॅाब? वाजपेयी जी के घुटने तो ठीक हैं। सोनिया भी सिर पे पल्लू डाल कर चलती हैं। उनका बेटा राजनीति में उतर ही गया है और बहन जितना भीड़खींचू साबित हुआ है। चंद्रशेखर एक मैं और एक वो वाली परम्परा का निर्वाह बखूबी कर रहे हैं। दोबारा चुनाव कराने का फैसला कर छपरा में ईवीएम की सिसकियों को गम्भीरता से लिया है चुनाव आयोग ने। बाकी सब भी उसी तरह से है। हां, गैस का सिलेंडर जरूर महंगा होने वाला है, पर उससे तुम्हें क्या, रोना तो अब रमा देवी की रसोई को और शिव प्रसाद की जेब को है, और कोई बात मन में हो तो घोंटो नहीं, बाहर निकालो। अरी अहमक, यह सब क्या बके जा रही है, मैं बात कर रहा हूं पांच जुलाई की, जब हर राज्य का मंμिामडल जुबिन मेहता के भारी भरकम आर्केस्ट्रा की जगह सूरदास का तानपूरा बन कर रह जायेगा, संगत देने को बजेगी बस ढपली। और नयी संसद में अब दलालों व बिचौलियों की दुकानों का शटर हमेशा के लिये गिर जायेगा क्योंकि अब सबके कान के पीछे का हिस्सा आग में तपायी मुहर से दगा मिलेगा उसकी पार्टी के नाम के साथ ताकि अगर वो दल बदले तो कान कटवा के दूसरी चौखट पर पांव धरे यानी कनकटवा। हे राम आपदा और विपदा एक साथ! बॅाब, तुम्हारे समय में कनकटवा होते थे क्या? μोता में विभीषण ने ऐसा किया था तो आज भी बेचारा एक निगेटिव किस्म के मुहावरे में फंसा हुआ है और महाभारत में दुर्योधन के एक भाई ने पाला बदला था तो उसका कोई नामलेवा नहीं। छोड़ो तुम आगे की बात करो-कहां दिखेंगे अब लाल बत्ती वाली गाड़ियों के रेवड़, न जाने कितने बंगले और लॉन उजड़ी मांग की तरह उजाड़ पड़े होंगे। वो गाय-भैंसें, जो एयरकंडीशन माहौल में गोबर का निष्पादन करती थीं, अब सड़कों पर डंडे खाकर खुले में सबके सामने नित्यक्रिया करेंगी। जिनके गेटों पर कुत्तों से सावधान वाला छोटा सा बोर्ड टंगा रहता था, वहां अब हाथ से लिखा मिलेगा-यहां मूतना सख्त मना है। मंμिामंडल की बैठकें 16 गुणा 16 के कमरे में निपटा करेंगी। ब1ॅब, कहीं यह नाप जेल की कोठरी का तो नहीं, क्या अब सरकारें वहां से शासन किया करेंगी? नहीं, यह सौभाग्य अब तक नसीब नहीं हुआ है लोकतांμिाक भारत को। हां तो मैं यह कहरहा था कि सरकार की तो सारी रौनक ही चली जायेगी। जो बगिया पहले फूलों से लदी रहती थी, अब एक डाल पर बस एक फूल या दो कलियां। शर्म आती है ऐसा कानून बनाने वालों पर। और दूसरा रोना कौन सा रो रहे थे तुम? अरे वो तो इससे ज्यादा सीरियस है। जैसे पुजारी के बिना भगवान के दर्शन नहीं हो सकते वैसे ही दलालों और दलबदलुओं के बिना कुर्सी के दर्शन कैसे होंगे? अरे कहीं तो न्याय होना चाहिये न, परसेंटेज बांध देते, पर सिरे से ही सफाया कर दिया। अब जिसको दल बदलने की हुड़क उठे तो पहले तो अपनी पार्टी के सभी सांसदों या विधायकों को तलाशे, फिर सबको बांध-बूंध कर ले जाके एक कुँए में धकेल दे, उसके बाद चिल्लाता फिरे कि मैं अकेला-मैं अकेला। अगर यह हिम्मत नहीं दिखा सकता तो पहले तो दागा गया कान कटवाये और फिर चार-पांच करोड़ फूंक कर दोबारा चुनाव लड़े। धिक्कार है ऐसे अनडेमोक्रोटिक नियम को। तुम ही-ही क्यों कर रही हो चैनली? बॅाब, जानते हो सबसे ज्यादा मजे किसके रहेंगे इस नियम में, अपने चंद्रशेखर जी के या मिट्टी का तेल, खरबूजे के बीज या आम की गुठली जैसे चुनाव चिन्ह वाले निर्दलीयों के ।
चैनली, भारतीय लोकतंμा के दुखद क्षण करीब आते जा रहे हैं। 1757 में पलासी में राबर्ट क्लाइव की फौज से नवाब सिराजुद्दौला की हार के बाद शायद सबसे ज्यादा दिल को दुखाने वाला क्षण। ऐसी बोली क्यों निकाल रहे हो बॅाब? वाजपेयी जी के घुटने तो ठीक हैं। सोनिया भी सिर पे पल्लू डाल कर चलती हैं। उनका बेटा राजनीति में उतर ही गया है और बहन जितना भीड़खींचू साबित हुआ है। चंद्रशेखर एक मैं और एक वो वाली परम्परा का निर्वाह बखूबी कर रहे हैं। दोबारा चुनाव कराने का फैसला कर छपरा में ईवीएम की सिसकियों को गम्भीरता से लिया है चुनाव आयोग ने। बाकी सब भी उसी तरह से है। हां, गैस का सिलेंडर जरूर महंगा होने वाला है, पर उससे तुम्हें क्या, रोना तो अब रमा देवी की रसोई को और शिव प्रसाद की जेब को है, और कोई बात मन में हो तो घोंटो नहीं, बाहर निकालो। अरी अहमक, यह सब क्या बके जा रही है, मैं बात कर रहा हूं पांच जुलाई की, जब हर राज्य का मंμिामडल जुबिन मेहता के भारी भरकम आर्केस्ट्रा की जगह सूरदास का तानपूरा बन कर रह जायेगा, संगत देने को बजेगी बस ढपली। और नयी संसद में अब दलालों व बिचौलियों की दुकानों का शटर हमेशा के लिये गिर जायेगा क्योंकि अब सबके कान के पीछे का हिस्सा आग में तपायी मुहर से दगा मिलेगा उसकी पार्टी के नाम के साथ ताकि अगर वो दल बदले तो कान कटवा के दूसरी चौखट पर पांव धरे यानी कनकटवा। हे राम आपदा और विपदा एक साथ! बॅाब, तुम्हारे समय में कनकटवा होते थे क्या? μोता में विभीषण ने ऐसा किया था तो आज भी बेचारा एक निगेटिव किस्म के मुहावरे में फंसा हुआ है और महाभारत में दुर्योधन के एक भाई ने पाला बदला था तो उसका कोई नामलेवा नहीं। छोड़ो तुम आगे की बात करो-कहां दिखेंगे अब लाल बत्ती वाली गाड़ियों के रेवड़, न जाने कितने बंगले और लॉन उजड़ी मांग की तरह उजाड़ पड़े होंगे। वो गाय-भैंसें, जो एयरकंडीशन माहौल में गोबर का निष्पादन करती थीं, अब सड़कों पर डंडे खाकर खुले में सबके सामने नित्यक्रिया करेंगी। जिनके गेटों पर कुत्तों से सावधान वाला छोटा सा बोर्ड टंगा रहता था, वहां अब हाथ से लिखा मिलेगा-यहां मूतना सख्त मना है। मंμिामंडल की बैठकें 16 गुणा 16 के कमरे में निपटा करेंगी। ब1ॅब, कहीं यह नाप जेल की कोठरी का तो नहीं, क्या अब सरकारें वहां से शासन किया करेंगी? नहीं, यह सौभाग्य अब तक नसीब नहीं हुआ है लोकतांμिाक भारत को। हां तो मैं यह कहरहा था कि सरकार की तो सारी रौनक ही चली जायेगी। जो बगिया पहले फूलों से लदी रहती थी, अब एक डाल पर बस एक फूल या दो कलियां। शर्म आती है ऐसा कानून बनाने वालों पर। और दूसरा रोना कौन सा रो रहे थे तुम? अरे वो तो इससे ज्यादा सीरियस है। जैसे पुजारी के बिना भगवान के दर्शन नहीं हो सकते वैसे ही दलालों और दलबदलुओं के बिना कुर्सी के दर्शन कैसे होंगे? अरे कहीं तो न्याय होना चाहिये न, परसेंटेज बांध देते, पर सिरे से ही सफाया कर दिया। अब जिसको दल बदलने की हुड़क उठे तो पहले तो अपनी पार्टी के सभी सांसदों या विधायकों को तलाशे, फिर सबको बांध-बूंध कर ले जाके एक कुँए में धकेल दे, उसके बाद चिल्लाता फिरे कि मैं अकेला-मैं अकेला। अगर यह हिम्मत नहीं दिखा सकता तो पहले तो दागा गया कान कटवाये और फिर चार-पांच करोड़ फूंक कर दोबारा चुनाव लड़े। धिक्कार है ऐसे अनडेमोक्रोटिक नियम को। तुम ही-ही क्यों कर रही हो चैनली? बॅाब, जानते हो सबसे ज्यादा मजे किसके रहेंगे इस नियम में, अपने चंद्रशेखर जी के या मिट्टी का तेल, खरबूजे के बीज या आम की गुठली जैसे चुनाव चिन्ह वाले निर्दलीयों के ।
बोल-बोल मछली कितना-कितना पानी
राजीव मित्तल
बॉब, चुनाव लड़ने के लिये जेब में कितना पैसा होना जरूरी है? बेवकूफ, अगर जेब में पैसा लेकर चुनाव लड़ने की सोच रही हो तो टेम्पो चालक संघ की अध्यक्ष भी नहीं बन सकतीं। क्यों, कुछ उम्मीदवार तो ऐसे हैं जिन्होंने यहां-वहां से मांग कर जमानत का पैसा जमा किया और केरल को देखो, वहां भी ज्यादा खर्चा नहीं आता। चैनली, ये सब अपवाद हैं और अपवाद पैमाना नहीं होते और अगर होते तो एक राज्य की 40 सीटों पर उम्मीदवारों की जेब से 400 करोड़ और सरकार के पल्ले से 75 करोड़ न निकलते। अभी 500 से ऊपर की सीटों का हिसाब बाकी है, विचारोगी तो डिहाईड्रेशन हो जायेगा। तो चुनावों में इतना पैसा फूंकने की जरूरत क्यों है बॉब? असल में यह देश कभी सोने की चिड़िया था क्योंकि तब राजतंμा था और आज लोकतंμा में यह सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन गया है। इस अंडे की पीली जर्दी में पैसा, सफेद जर्दी में ताकत और खोल से जहूरा टपकता है। ये तीनों चीजें एक साथ किसी धंधे में नहीं मिल सकतीं। व्यापारी बनो तो सिर्फ पैसा, माफिया बनो तो दो चीजें ताकत और पैसा और खालिस इज्जत पानी है तो एपीजे अबुल कलाम बन जाओ। लेकिन तीनों पाना है तो नेता बनो, इन तीनों के साथ गोल्ड स्टार लगा है तो सत्ताधारी नेता और डायमंड स्टार है तो मंμाी। अब इससे ऊपर तो अमेरिका का राष्ट्रपति ही हो सकता है। लेकिन वहां भी एक कायदा है कि भूतपूर्व हो जाने के बाद पैदल हो जाना जो यहां की मिट्टी में संभव नहीं है। तभी तो जितने गुजरे हुए हैं उन सबको भी पालना पड़ रहा है इस देश की जनता को। यहां तक कि उस अनाथ नन्हीं सी जान मुन्नी तक को यह पता नहीं कि दूसरों के घरों में बर्तन मांज कर जो वह कमाती है उसका एक हिस्सा किन नामुरादों पर खर्च होता है। ये सब आधुनिक भारत के शाह हैं, जिनसे ब्रुनेई का शाह भी रश्क करे। तभी तो करोड़ों कमाने वाले फिल्म स्टार और अरबों कमाने वाले दारू के धंधेबाज, सटोरिये, जालिये और माफिये तक इस थ्री इन वन की ओर ंिखचे चले आ रहे हैं। सब धंधेबाज हैं ही। करोड़ों फूंकते हैं जनता का प्रतिनिधि बनने के लिये, पर जनता को चूना लगाने के लिये जो प्रोटेक्शन चाहिये और जनता को हड़काने के लिये जो ताकत चाहिये वह सब स्टाम्प पेपर पे अंगूठा लगाये बगैर मिल जाता है। जो पैसा लगा, उसकी ब्याज के साथ वसूली के लिये पांच साल बहुत हैं। कैसी बात कर रहे हो बॅाब, कई बेचारों के पास टेलीफोन का बिल, मकान का किराया, बिजली का बिल चुकाने तक को पैसे नहीं हैं। और कई तो ऐसे हैं, जिनका दुनिया में कहीं ठिकाना नहीं, शायद बाल-बच्चे भी नहीं तभी तो उन्हें सरकारी आवासोंमें अनाथों की तरह मुंह छुपा के रहना पड़ रहा है। जोगी जी कितना परेशान रहे। कुर्सी छिनते ही एक ठो आशियां के लिये दर-दर मारे-मारे घूमे। मैने खुद अपनी आंखों से कई भूतपूर्वों को बाग-बगीचों में पानी छोड़ते देखा है। मूर्खा, वह तो लंच में करीम के यहां से मंगायी बिरयानी-ए-जाफरान और केसर पड़ी कुल्फी डकार कर पाचन क्रिया दुरुस्त रखने का तरीका है ताकि रात को किसी पांच सितारा होटल में ठंडी बियर के साथ बकरे की रान और मुर्गे की टांग नोची जा सके। जहां तक सरकारी आवास में रहने की मजबूरी है तो चैनली, पूरा कुनबा पूरी बेशर्मी के साथ उसी में ठुंसा रहता है। अपने इलाके के दो-चार को और घुसेड़ लेते हैं। और वे बिल? उनका पेमेंट किसी धन्ना सेठ से कराया दिया जाता है। अरे हां, मुझे याद आया कि एक सांसद कह रहे थे- पμाकारिनी जी, जहां जाना हुआ करे हमें बता दिया कीजिये। हवाई याμाा मुफ्त, ट्रेन में एसी कोच फ्री। अरे चैनली, तभी तो देवता भी भारत में जनम लेने को तरसते हैं।
बॉब, चुनाव लड़ने के लिये जेब में कितना पैसा होना जरूरी है? बेवकूफ, अगर जेब में पैसा लेकर चुनाव लड़ने की सोच रही हो तो टेम्पो चालक संघ की अध्यक्ष भी नहीं बन सकतीं। क्यों, कुछ उम्मीदवार तो ऐसे हैं जिन्होंने यहां-वहां से मांग कर जमानत का पैसा जमा किया और केरल को देखो, वहां भी ज्यादा खर्चा नहीं आता। चैनली, ये सब अपवाद हैं और अपवाद पैमाना नहीं होते और अगर होते तो एक राज्य की 40 सीटों पर उम्मीदवारों की जेब से 400 करोड़ और सरकार के पल्ले से 75 करोड़ न निकलते। अभी 500 से ऊपर की सीटों का हिसाब बाकी है, विचारोगी तो डिहाईड्रेशन हो जायेगा। तो चुनावों में इतना पैसा फूंकने की जरूरत क्यों है बॉब? असल में यह देश कभी सोने की चिड़िया था क्योंकि तब राजतंμा था और आज लोकतंμा में यह सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन गया है। इस अंडे की पीली जर्दी में पैसा, सफेद जर्दी में ताकत और खोल से जहूरा टपकता है। ये तीनों चीजें एक साथ किसी धंधे में नहीं मिल सकतीं। व्यापारी बनो तो सिर्फ पैसा, माफिया बनो तो दो चीजें ताकत और पैसा और खालिस इज्जत पानी है तो एपीजे अबुल कलाम बन जाओ। लेकिन तीनों पाना है तो नेता बनो, इन तीनों के साथ गोल्ड स्टार लगा है तो सत्ताधारी नेता और डायमंड स्टार है तो मंμाी। अब इससे ऊपर तो अमेरिका का राष्ट्रपति ही हो सकता है। लेकिन वहां भी एक कायदा है कि भूतपूर्व हो जाने के बाद पैदल हो जाना जो यहां की मिट्टी में संभव नहीं है। तभी तो जितने गुजरे हुए हैं उन सबको भी पालना पड़ रहा है इस देश की जनता को। यहां तक कि उस अनाथ नन्हीं सी जान मुन्नी तक को यह पता नहीं कि दूसरों के घरों में बर्तन मांज कर जो वह कमाती है उसका एक हिस्सा किन नामुरादों पर खर्च होता है। ये सब आधुनिक भारत के शाह हैं, जिनसे ब्रुनेई का शाह भी रश्क करे। तभी तो करोड़ों कमाने वाले फिल्म स्टार और अरबों कमाने वाले दारू के धंधेबाज, सटोरिये, जालिये और माफिये तक इस थ्री इन वन की ओर ंिखचे चले आ रहे हैं। सब धंधेबाज हैं ही। करोड़ों फूंकते हैं जनता का प्रतिनिधि बनने के लिये, पर जनता को चूना लगाने के लिये जो प्रोटेक्शन चाहिये और जनता को हड़काने के लिये जो ताकत चाहिये वह सब स्टाम्प पेपर पे अंगूठा लगाये बगैर मिल जाता है। जो पैसा लगा, उसकी ब्याज के साथ वसूली के लिये पांच साल बहुत हैं। कैसी बात कर रहे हो बॅाब, कई बेचारों के पास टेलीफोन का बिल, मकान का किराया, बिजली का बिल चुकाने तक को पैसे नहीं हैं। और कई तो ऐसे हैं, जिनका दुनिया में कहीं ठिकाना नहीं, शायद बाल-बच्चे भी नहीं तभी तो उन्हें सरकारी आवासोंमें अनाथों की तरह मुंह छुपा के रहना पड़ रहा है। जोगी जी कितना परेशान रहे। कुर्सी छिनते ही एक ठो आशियां के लिये दर-दर मारे-मारे घूमे। मैने खुद अपनी आंखों से कई भूतपूर्वों को बाग-बगीचों में पानी छोड़ते देखा है। मूर्खा, वह तो लंच में करीम के यहां से मंगायी बिरयानी-ए-जाफरान और केसर पड़ी कुल्फी डकार कर पाचन क्रिया दुरुस्त रखने का तरीका है ताकि रात को किसी पांच सितारा होटल में ठंडी बियर के साथ बकरे की रान और मुर्गे की टांग नोची जा सके। जहां तक सरकारी आवास में रहने की मजबूरी है तो चैनली, पूरा कुनबा पूरी बेशर्मी के साथ उसी में ठुंसा रहता है। अपने इलाके के दो-चार को और घुसेड़ लेते हैं। और वे बिल? उनका पेमेंट किसी धन्ना सेठ से कराया दिया जाता है। अरे हां, मुझे याद आया कि एक सांसद कह रहे थे- पμाकारिनी जी, जहां जाना हुआ करे हमें बता दिया कीजिये। हवाई याμाा मुफ्त, ट्रेन में एसी कोच फ्री। अरे चैनली, तभी तो देवता भी भारत में जनम लेने को तरसते हैं।
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