गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

हमारे देश में न्याय व्यवस्था
सबसे लचर : प्रशांत भूषण

जानेमाने अधिवक्ता प्रशांत भूषण का कहना है कि जब तक देश में न्यायपालिका के काम की जवाबदेही तय नहीं होगी, हालात बद से बदतर होते जाएंगे..आज स्थिति ये है कि केवल एक फीसदी मुकदमों का ही फैसला होता है..

हमारे देश में जज की जवाबदेही क्यों नहीं है कि वो साल में कम से कम इतने मुकदमे निपटाएं.. क्यों 99 फीसदी मुकदमे बरसों से पेंडिंग पड़े हैं..एक गरीब आदमी को 20-बीस साल क्यों अदालत के चक्कर काटने पड़ते हैं..और तब भी उसे न्याय नहीं मिलता..

यहां प्रशांत अमेरिका में टीवी पर दिखाए जा रहे न्यायिक फैसलों का हवाला देते हैं, जिनमें जज को मुकदमा निपटाने में महज 20 मिनट लगते हैं..उसी श्रेणी के मुकदमे हमारे देश में दसियों साल से फैसले की बाट जोह रहे हैं..



प्रशांत भूषण के अनुसार देश पूरी तरह भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है, लेकिन जिस तरह यह रोग न्यायपालिका में फैला है, वह बेहद चिंतनीय है..हम संस्थाओं की स्वतंत्रता की चाहे जितनी बात करें, लेकिन जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, हालात में कोई सुधार नहीं होगा..खास कर सर्वोच्च पदों पर बैठे हर व्यक्ति की जवाबदेही तय करने के लिए कोई तो फैसला करना ही पड़ेगा..और यह अब जनता के हाथ में है कि वो कितनी जल्दी इस मामले में दबाव बनाती है..लोकपाल बिल को पास हुए बरसों हो गए, लेकिन नियुक्ति अभी तक नहीं हुई.. और वो इसलिए कि नेतृत्व चाहता ही नहीं कि इस देश में कामकाज 

12/17/17
सुप्रीमकोर्ट के बारे में प्रशांत भूषण

जानेमाने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण और सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्यायाधीश के बीच एक मेडिकल कॉलेज को ले कर हुई बहस काफी चर्चित रही थी..मामला क्या था.. 

प्रशांत भूषण के शब्दों में, " एक मेडिकल कॉलेज की गड़बड़ियों का मामला किसी पिटीशन के जरिये सुप्रीमकोर्ट में आया.. जांच के दौरान उस मेडिकल कॉलेज के कर्ताधर्ताओं के फोन टैप करने पर सीबीआई को पता चला कि मामले को सुलटाने के लिए जजों को देने को तीन करोड़ की राशि तय हुई है..सीबीआई ने उन जजों  की जांच के लिए मुख्यन्यायाधीश से अनुमति चाही..उनके व्यस्त कार्यक्रम के चलते जांच एजेंसी ने सुप्रीमकोर्ट में नम्बर दो की पोजिशन वाले जज को एप्रोच किया..उन्होंने पांच वरिष्ठ जजों की बेंच को संदिग्ध जजों की जांच का मामला सौंप दिया..लेकिन मुख्यन्यायाधीश के संज्ञान में जैसे ही यह मामला आया उन्होंने अपने से ठीक नीचे वाले जज के अधिकार कतरते हुए और उनका फैसला बदलते हुए अपने अंतर्गत नई बेंच बना दी, जिसमें बेहद कनिष्ठ जजों को रखा गया..और दो जज तो वो थे, जो इस मामले में सीबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक संदेह के घेरे में हैं..प्रशांत भूषण का साफ कहना है, " खुद मुख्यन्यायाधीश भी इस रिश्वत कांड में पाकसाफ नहीं हैं "...

12/16/17
भारत में छात्र राजनीति

राजीव मित्तल

आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद व्यवस्था के खिलाफ ऐसे न जाने कितने आंदोलन हुए, जिनमें युवा और छात्रों का रोष उभरा और समय के साथ गायब हो गया...

छात्र आंदोलन का तेजस्वी रूप 1942 में तब देखने को मिला था, जब भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होते ही सभी बड़े बड़े नेता गिरफ्तार हो गए और आन्दोलन की बागडोर युवा हाथों में चली गई..आंदोलन बखूबी अपने मक़ाम तक पहुंचा और देश भर की जेलें 16 साल से लेकर 20 साल के युवाओं से भर गयीं..

लेकिन आज़ादी मिलते ही युवाओं को मिलने वाले प्रेरणा स्रोत सूखते चले गए और देश में घटिया सोच वाली राजनीति ने पाँव इस तरह जमा लिए कि देश के अंदर छात्रों की सामूहिक रचनात्मकता अराजक मुद्दों में भटक गई..

हमारे छात्र आंदोलन क्षेत्रीयवाद, भाषावाद, जातिवाद जैसी सोच के मोहताज हो गए..
मुझे कॉलेज के दिनों की याद है कि छात्र यूनियन के चुनाव कैसे राजनीतिक दलों के मुखौटे बनते चले गए..जो चुनाव प्रत्याशियों के कार्ड और उनके पोस्टरों तक सीमित होते थे, वही चुनाव बड़े बड़े जुलूसों, दारू के वितरण, गुंडागर्दी और अपने अपने वर्चस्व को कैसे भी स्थापित करने का जरिया बन गए..

हमारे देश में एक मौका आया था जब युवाओं को ठोस दिशा मिलती..वो मौका था इमरजेंसी के पहले का गुजरात और फिर बिहार युवा आंदोलन...लेकिन जयप्रकाश नारायण की अव्यवहारिक सोच के चलते ये आंदोलन राजनीति का अखाड़ा बन गए..और उन आंदोलनों की शुचिता पर काले धब्बे डाल दिये इमरजेंसी के बाद हुए हुए लोकसभा चुनावों में विपक्ष के विभिन्न दलों के असंगत जमावड़े के रूप बने जनता पार्टी के गठन और उसकी जीत ने..

तीन साल बाद भनुमति का कुनबा तो बिखर गया, उससे भी ज़्यादा खराब बात यह हुई कि उसमें शामिल जितने नौजवान थे, उन्होंने अपने सिरों पर विभिन्न राजनीतिक दलों की टोपियां सजा लीं, और बहती गंगा में हाथ धोने में जुट गए..और वही आज सड़ी गली राजनीति का व्यापार कर रहे हैं..

एक खास बात और कि आजादी से पहले जो समाजवादी युवा नेता देश के नौजवानों को रचनात्मक दिशा की ओर प्रेरित कर रहे थे, आज़ादी के बाद वही सब नेता प्रौढ़ हो कर वर्चस्व की संकीर्ण राजनीति के पहरुआ बन गए और देश का युवा तबका भटकाव के रास्ते पर चल पड़ा..

बहरहाल, कुल मिला कर स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि किसी भी विश्वविद्यालय का छात्रसंघ पाकसाफ नहीं है..छात्र नेतृत्व के पास कोई रचनात्मक सोच बची ही नहीं है..सब पर दलगत राजनीति हावी है..छात्र नेताओं के पास अपने अपने शॉर्टकट हैं राजनीति के जरिये अपनी दुकान सजाने के, अपना भविष्य उज्जवल करने के..उनकी सोच में न देश है न समाज..

12/18/17

भारत में छात्र राजनीति

राजीव मित्तल


सन 1925 में काकोरी में रेलगाड़ी रोककर अंग्रेजी हुकूमत का धन लूट लिया गया था। राशि 10-15 हजार के बीच रही होगी। राम प्रसाद बिस्मिल को छोड़ लूट में शामिल सभी क्रांतिकारी 18-20 साल के थे। 

काकोरी कांड में बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, राजेन्द्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी पर लटका दिया गया था। 

इस घटना के 70 साल बाद एक बाप ने अपने 12 साल के बेटे और उसके दोस्तों के बीच किसी मनमुटाव को सुलझाना चाहा और इस चक्कर में उनमें से एक लड़के को चांटा मार दिया। नतीजे में रात को करीब 40 लड़कों ने घर पर हमला बोल दिया और तोड़फोड़ मचाई। बाप को पीछे की दीवार फलांद कर थाने भागना पड़ा, पुलिस आयी तब उसकी जान बची। 

और जब कुछ परीक्षार्थी एसी कोच से निकाले जाने के गुस्से में किसी स्टेशन के पास पटरी पर 25 फुटा पोल डाल दें ताकि जो भी ट्रेन वहां से गुजरे वह उलट जाए और उसके मरते और घायल हुए यात्रियों को पता चले कि ऐसा एक महान उद्देश्य से किया गया है..खैर, गुजरना था राजधानी एक्सप्रेस को, पर वह उलटी नहीं क्योंकि एक सिपाही ने अपनी जान पे खेल कर वह पोल किसी तरह से खिसका दिया। 

तोे यह है एक आंदोलनकारी सफर जो अपने मुकाम पर पहुंच गया है। यह तो इतिहास बताएगा कि देश को आजाद कराने में बिस्मिल और उनके युवा साथियों का कितना योगदान था, लेकिन आज़ादी के बाद के हज़ारों हज़ार छात्र आंदोलन और कर्ता धर्ताओं के कारनामे बिस्मिल और उनके तीन साथियों की शहादत को, उनके सपनों को चीथड़े-चीथड़े करने पर आमादा है.. 

आजाद भारत की राजनीति का असर एड्स से भी ज्यादा भयानक होगा, इसका आभास महात्मा गांधी को था तो, पर वह अंतिम दिनों में अपने को उस चौराहे पर पा रहे थे, जहां से कोई रास्ता कहीं को नहीं जाता था।

एक देश के विकास में उसका नौजवान तबका सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है और इसी तबके को इस देश की राजनीति विध्वंस के रास्ते पर ले जा रही है। किसी भी सार्वजनिक स्थान पर, जहां चार-पांच युवकों का झुंड मौजूद हो, आप अपने घर की किसी युवती के साथ बेखौफ बैठ सकते हैं? 

दीपा मेहता की फिल्म फायर हो या ना बनी गंगाजल या हाल में प्रदर्शित गर्लफ्रेंड, उसके लिये हंगामा मचाने में सबसे आगे यही युवा वर्ग रहा, जिसको यही नहीं पता कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। इस वर्ग के खालीपन, बेरोजगारी, समाज और परिवार की जिम्मेदारियों के प्रति उदासीनता का हर राजनैतिक दल बरसों से शानदार इस्तेमाल कर रहा है। और जो पैसों वालों के जिगर के टुकड़े हैं वे नशे में धुत हो बीएमडब्लयू में बैठ फुटपाथ पर रात गुजार रहे लोगों को टमाटर की तरह मसल रहे हैं या राह चलती लड़की को कार में घसीट अपने आंदोलनकारी दिलो-दिमाग को सकून पहुंचा रहे हैं। 

कई साल पहले  चीन के तियेनमेन चौक पर एक आदर्श के लिये जमा छात्रों को वहां की सरकार ने गोलियों से भून डाला था, जिसकी सारी दुनिया में निंदा हुई। लेकिन उसी के बाद चीनी सरकार ने अपने युवा वर्ग को देश के विकास के उस इन्फ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा बना लिया, जो अमेरिका तक को हैरान किये हुए है। 
जेटली साहब देश की विकास गति छह फीसदी रखें या दस फीसदी, राजधानी ट्रेन के रास्ते पर पोल डालने से वह युवा आंदोलनकारियों को नहीं रोक सकते, क्योंकि इस विकास में उनकी कोई हिस्सदारी नहीं है। न लाभ में न हानि में..

जारी..

12/16/17 
ऑपरेशन टेबल पर...

इतनी ठंडी सुबह कि क्या बताऊँ.. जबलपुर का 19 दिसंबर..डॉक्टर पाठक ने ऑपरेशन की तैयारी का मुआयना किया..और किसी दूसरे डॉक्टर ने सर्दी से दांत किटकिटा रहे इस इंसान की रीढ़ की हड्डी में एनेस्थीसिया का इंजेक्शन लगाया..घबराहट के चलते यह भी ध्यान नहीं कि OT गर्म था या नहीं..

कानों में कुछ फुसफुसाहट, औजारों की खनक और हर्निया वाली जगह पर नश्तर का महसूस होना..बस इसके बाद इतनी गहरी और मीठी नींद कि आज दस साल बाद भी उसकी मिठास आंखों में तैरती दिखती है...

बीस साल पहले 21 सेक्टर के खूबसूरत बंगले के पीछे बने आउट हाउस में चंडीगढ़ की पहली बरसातों में रात के दो बजे पथरी के दर्द ने इतना ज़ोरदार हमला बोला था कि उसको झेलने के सारे उपाय कर डाले, पर अगले तीन घंटे चीत्कार करते बीते..उस रात साथ में जनसत्ता के दो ही साथी है..एक तो वही था, जिसने पनाह दी हुई थी, और दूसरा मेरी तरह, वहां डेरा डाले था..उस दर्द में क्या राहत दे पाते भूपेंद्र और हरजिंदर..

पौ फटते ही दोनों ने मेरा एक एक कंधा थामा और अपन ने दांत भींच कर आधा किलोमीटर की दौड़ लगाई..ट्रिब्यून वाले रमेश नैय्यर के घर की सीढ़ियां किसी तरह चढ़ीं और दरवाजा तब तक पीटा जब तक वो खुल नहीं गया..और फिर उनके सोफे पर गिर कर  मेरा दर्द पूरे जोम से चिल्लाया..वो तुरंत नीचे उस फ्लैट में ले गए, जहां डॉक्टर राणा नशे में टुन्न पड़े रहे होंगे..लेकिन उन्होंने थाप पड़ते ही दरवाज़ा खोल दिया..उनके सोफे पर ढेर होते ही मैंने चीत्कार मचानी शुरू कर दी..राणा ने एक छोटी सी शीशी अलमारी से निकाली और उसमें से दो बून्द मुहँ खुलवा कर जीभ पर टपका दीं.. उस दिन देखा होम्योपैथी का चमत्कार..दो सेकेण्ड में चार घण्टे से कहर ढा रहा मेरा दर्द गायब था और में नींद में..दो घंटे बाद उठा तो डॉक्टर राणा ने पथरी के साथ साथ हर्निया के पलने करने का एलान कर दिया..



पथरी के क्रिस्टल तो होम्योपैथी की कुछ खुराकों से खून बहाते हुए पेशाब के रास्ते निकल जाते लेकिन हार्निया को अपन ने गले से लगा लिया..और वो खूब घुमा मेरे साथ

12/19/17
बोलविया में चे के आखिरी दिन..

कास्त्रो का पूरा विश्वास पाने के बावजूद चे की स्थिति क्यूबा में असहज हो चली थी। यही असहजता वर्ष 1964 में अपनी परिणति पर पहुंच गई और चे ने फिदेल कास्त्रो से लम्बे विचार-विमर्श के बाद क्यूबा छोड़ने का फैसला किया...

अब उनके सामने थे अफ्रीका में कांगो तथा अल्जीयर्स और दक्षिण अमेरिका में खुद उनका अपना देश अर्जेन्टाइना, पेरू व बोलविया... जहां चे को सशस्त्र क्रान्ति के हालात माकूल लग रहे थे.. 

इस वक्त तक चे विश्व की महत्वपूर्ण हस्ती बन चुके थे। तीसरी दुनिया के देशों के एक तरह से वह प्रवक्ता ही बन गये थे। उनके भाषणों में या तो अमेरिकी साम्राज्यवाद की कटु आलोचना थी या तीसरी दुनिया के देशों की तकलीफें। 

1965 में तीन महीने बाहर रह कर क्यूबा लौटने के बाद उन्होंने अपने अगले रणस्थल का चुनाव कर लिया था और वह जल्द ही लापता हो गये। और ठीक उन्नीस महीने बाद 1966 के नवम्बर माह में बोलविया दिखे।

इस बीच वह कहां रहे, क्या किया, यह जानने के लिये अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने जमीन-आसमान एक कर दिया। अन्त में उसने यही निष्कर्ष निकाला कि क्यूबा के सत्ता संघर्ष में चे मारे जा चुके हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति लिण्डन बी जानसन को भी यही बताया गया। पर अमेरिका के लिये यह राहत कुछ महीनों की ही साबित हुई। 

चे गुएरा उरुगुवे के नकली पासपोर्ट पर बोलविया में घुसे। घने जंगलों, एण्डीज श्रृंखला के ऊंचे-ऊंचे पहाड़, बड़ी-बड़ी नदियों, गहरी खाइयों वाले इस देश में चे को काफी सम्भावनाएं नज़र आयीं, क्योंकि प्राकृतिक सम्पदा और खनिज से भरपूर इस देश का सदियों से दोहन हो रहा था। 

सबसे बड़ी बात उन्हें यह लगी कि पांच देशों से लगे बोलविया में क्रांति की सफलता पूरे दक्षिण अमेरिका को अपनी चपेट में ले लेगी।

वहां चे ने अपना ट्रेनिंग कैम्प नानसाहूआजू नदी की घाटी में बनाया, जहां से करीब थे तीन शहर कोचाबामा, सान्ताक्रूज और सुक्रे, जो सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण थे। 

तीन-चार महीने की कड़ी ट्रेनिंग के बाद गुरिल्ला दस्तों ने बोलवियाई फौजी रिसालों पर हमले बोलने शुरू कर दिये। चे की निगाह में क्यूबा अभियान की शुरुआत की तुलना में बोलविया अभियान बेहतर ढंग से गति पकड़ रहा था। लेकिन आगे चल कर हालात बिगड़ते गये। बीच ऐसी कई घटनाएं हुईं, जिससे दुनिया भर को पता चल गया कि चे बोलविया में हैं। 

अमेरिका तुरन्त हरकत में आया और बोलवियाई फौज की सैकेण्ड रेंजर बटालियन को सीआईए की देखरेख में ट्रेनिंग दिलाने के बहाने बोलविया से समझौता किया। 1967 के अप्रैल में राष्ट्रपति जानसन के सलाहकार वाल्ट रोस्तोव ने उन्हें असलियत बताई कि चे नहीं मरा और वह बोलविया में है।

तब तक चे की मुश्किलें शुरू हो चुकी थीं। उसके छापामार दस्ते के लोग या तो सैनिक झड़पों में घायल होते जा रहे थे या किसी न किसी बीमारी की चपेट में आ कर असहाय होते जा रहे थे। मौतों का सिलिसला भी शुरू हो गया था। लड़ने वालों की संख्या दिन पर दिन कम होती जा रही थी और नयी भरती नाममात्र को थी। उनका स्थानीय जनता से जुड़ाव हो ही नहीं पा रहा था। एक नदी पार करते हुए वह उपकरण भी बह गया, जिसके दम पर चे का क्यूबा से सम्पर्क बना हुआ था। 

सितम्बर आते-आते अमेरिका से ट्रेनिंग पायी साढ़े छह सौ जवानों की बटालियन पूरी तरह सक्रिय हो कर चे और उनके दस्तों के खात्मे में जुट गई। चे की 11 महीने के बोलवियाई अभियान के दौरान लिखी गई डायरी पर आखिरी कलम सात अक्टूबर को चली। 

उस दिन तक चे का दस्ता सैनिक टुकड़ियों से पूरी तरह घिर चुका था और अन्तिम समय हर पल नजदीक आता जा रहा था। उसी दिन चे ने रेंजरों से बचते हुए ला हिगुएरा के गांव में एक बूढ़ी औरत से सैनिक टुकड़ी की बारे में पूछताछ की, पर कोई पुख्ता जानकारी उन्हें नहीं मिली।

आठ अक्टूबर को रेंजरों को सूचना मिल चुकी थी कि चे अपने दस्ते के साथ घाटी के किस हिस्से में छिपे हैं। उसी दिन अन्तिम भिडंत हुई और दोपहर डेढ़ बजे पैरों में कई गोलियां खा चुके चे रेंजरों के हाथ पड़ गये। 

यह था चे का अंत, जिसकी मौत ने उन्हें इस कदर लोकप्रिय बना दिया कि करीब 40 साल बाद जब उनके महाद्वीप के देशों से अमेरिकी दलालों को मार-मार कर भगाया जा रहा था, तो हर किसी की आंखों में चे बसे हुए थे। और आज तमाम दक्षिण अमेरिकी देशों में जो सरकार हैं, वे खुल कर अमेरिकी नीतियों का विरोध कर सत्ता में आयी हैं।

1/9/18

मुज़फ़्फ़रपुर का जिमी


पता नहीं किस तुफेल में ढाई साल पुरानी जमी जमायी किरायेदारी छोड़ इत्ते बड़े घर को डेरा बनाया...कई सारे कमरे...अंदर आंगन..बाहर दालान और उसके भी बाहर लॉन..और रहने वाला फ़क़त मैं। 

मकान मालिक का परिवार ऊपर...सुबह की चाय अक्सर उनके यहां पीता.. लेकिन पता नहीं क्यों, जिमी को पसंद नहीं आया मेरा आना..मुंह बिचका कर भाग जाता..एक दिन ऐसे ही पूछ लिया-इसे खाने में क्या पसंद है! खीरे और पानी में भीगे चने.. वाह! यही तो अपनी भी पसंद है..नीचे अपने दालान में खड़े-खड़े फौरन खीरे की दो फांक कर एक अपने मुंह में डाली और दूसरी उसके सामने रख दी.. पहले तो घूरता रहा, फिर अहसान दिखाते हुए दांतों से कुतरने लगा.. 

अगले दिन तश्तरी भर भीगे चने और खीरे के टुकड़े..तीन दिन बाद ही महाशय जी कमरे के अंदर..अपना रूटीन शुद्ध अख़बारी..रात को काफी देर से घर लौटना, दिन भर सोना..सारे दरवाज़े चौपट खुले रहते..रखवाला जिमी जो था.. मिलने वाले गेट पर खड़े होकर चिल्लाते रहते और जिमी उन्हें चुप कराता रहता ताकि मैं सोता रहूं..

सावन आ गया.. अब देर रात के बजाये दफ्तर से सुबह लौटना होने लगा..एक भोर फुहारों के बीच ब्रह्मपुरा के सब्जी बाजार में देसी अमियों की ढेरी देख दिल लपझप करने लगा.. छांट कर कर कई किलो भर लीं.. 

गेट खोलते ही रोजाना की तरह जिमी की लपक-झपक शुरू.. आम की गंध मिली तो बौरा गया..तेजी से दरवाजे पर पुहंच उछल-उछल कर पैर मारने लगा कि जल्दी खोलो यार, अब रहा नहीं जा रहा..अंदर जा कर सारे आम पानी भरी बाल्टी में उडेले,..फिर छिलका उतार कर गुठली उसे दी..अब तो जी पूरे आंगन में जिमी की स्केटिंग शुरू.. गुठली आगे को फिसल रही और जिमी मुंह खोले उसके पीछे-पीछे.. चार-पांच गुठलियों ने पूरे आंगन को आम के रस से महका दिया..

इस तरह हम दोनों ने पूरी बरसात सुबह-दोपहर आम, खीरा और भीगे चनों का मजा लिया..जिमी साहब ने ऊपर अपने घर भी जाना बंद कर दिया..कोई लेने आता तो गुर्राना शुरू...बाकी समय हम दोनों का गपशप या सोने में गुजरता.. 

मुश्किल आती शाम को जब आॅफिस के लिये स्कूटर बाहर निकालता..वह पैर पकड़ कर झूल जाता.. मैं, स्कूटर और वो, तीनों गेट तक घिसटते जाते..तब तक उसके बरसात के पानी से भीगे पंजे पेंट का हाल चौपट कर चुके होते..पेंट बदल कर, उसे जंगले के अंदर कर ही गेट से बाहर निकल पाता.. सितम्बर खत्म होते-होते इत्ते बड़े घर से मन उकताने लगा..जिसके दो कमरे हमेशा बंद ही रहते..

एक दिन ऑफिस के भूमिहार मनीष को पकड़ कर पुराने घर ले गया तो भूमिहार मकान मालिक का चेहरा खिल उठा..चाय के साथ रसगुल्ले भी खिलाय..और फिर बोला-फिर यहीं आ जाइये-अपके दोनों कमरे बंद ही पड़े हैं..यहां तक कि किराया भी घटा दिया..तो मनीष बोल पड़ा-आप तो भूमिहारों के बाप निकले..

एक सुबह मनीष ने ही सामान ढोने वाले बुला कर शिफ्ट करा दिया..सामान लदता देख जिमी पागल हो गया..एक के पैर पर तो दांत भी गड़ा दिये..मकान मालिक किसी तरह गोद में उठा कर ऊपर ले गये..

पुराने घर में आने के बाद दो-चार बार जिमी को बुलवाया तो खुशी से झूमता आया.. नाश्ता पानी करता..लेकिन लौटता बहुत बेमन से..दफ्तर के रास्ते में ही उसका घर पड़ता था इसलिये जब-तब उससे मिलने चला जाता..खीरे चने ले कर..आवाज सुन कर जिमी हल्ले मचाता ऊपर से आता..फिर लखनऊ-दिल्ली के चक्कर में काफी दिन बाद वहां जाना हुआ।

कई बार घंटी बजाने के बाद भी जिमी की आवाज सुनायी नहीं दी तो अजीब सा लगा.. श्रीवास्तव जी अकेले नीचे आये तो उनसे पूछा-जिमी कहां है? जो सुना उससे कान सुन्न हो गये..हुआ यूं कि मेरे जाने के बाद कोई रिटायर्ड जज उस घर में रहने आ गया था.. जिमी को उस चौखट से काफी मोह था ही, अक्सर वह अंदर भी चला जाता और अपना ही घर समझ सुसु वगैरह कर देता..जज के बेटे को उसका आना बिल्कुल पसंद नहीं आया और एक दिन उसने जिमी पर मिट्टी का तेल डाल दिया। 

घने बालों की वजह से किसी को पता नहीं चला कि तेल ने खाल को जला डाला है.. सड़ने पर घाव से बदबू उठने लगी..काफी कमाऊ जगह मैनेजर रहे श्रीवास्तव साहब आठ साल से बेटे की तरह पल रहे जिमी का घर में ही टटपूंजिया इलाज करते रहे.. जब दुर्गंध पूरे घर को गंधाने लगी तो एक दिन उसे कार में धर 30-35 किलोमीटर दूर सुनसान जगह पेड़ से बांध आए। .... 

अपन के दिमाग में बस यही चल रहा था- पेड़ से बंधा जिमी मरा किस तरह होगा .........काफी देर तक भौंकता रहा होगा.... फिर कूं-कूं..... हो सकता है जीते जी उसे निवाला बनाया गया हो .......। इससे अच्छा तो आप उसे जहर दे देते...यह कह कर लौट लिया। फिर जब तक मुजफ्फरपुर में रहा, उनके लाख बुलाने पर घर तो क्या, उस तरफ जाने वाली सड़क पर भी पांव नहीं रखा। जिमी को अपने से इस कदर जोड़ने के अपराधबोध से अभी तक मुक्त नहीं हूं। कभी होऊंगा भी नहीं।



1/10/18 

पीजी ब्लॉक

सुबह उठते ही तैयार हो कर स्कूटर दौड़ाया बॉटेनिकल गार्डेन की तरफ.... वहां एक दोस्त को पकड़ा....और एक-एक कर आठ गुलदस्ते बनवा लिये.....अलग-अलग फूलों के....फिर रेलवे स्टेशन....पता किया....ट्रेन तीसरे प्लेटफार्म पर....गुलस्ते इतने कि खुद भी चलता-फिरता गुलदस्ता नजर आ रहा......दो-दो सीढ़ियां फलांदते चढ़ा....उतरा.....एक बोगी के सामने कई सारे लड़के-लड़कियां खड़े थे....और वो दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थीं....उतर कर आयीं ....तुम कितने पागल हो....एक-दो नहीं पूरा बाग खरीद लाए....हांफते हुए एक के बाद एक गुलदस्ता उन्हें देता जा रहा....आखिर वो भी कितने थामतीं....बस-बस........अपना ध्यान रखना...एक ही साल की तो बात है.......

चौदह महीने बाद.......

रवींद्रालय में कोई फंक्शन....खत्म होने के बाद बाहर निकलते ही वो सामने......वही दिलकश मुस्कान ....कैसे हो.....मैं पिछले महीने ही लौटी.....पता चला शादी कर ली.....मैं नाइजीरिया न जाती तो तुम डिप्लोमा तो कर ही लेते.....

और दो साल बाद.........

दिल्ली नवभारत टाइम्स में एक साल गुजार कर लखनऊ नवभारत टाइम्स में.......एक सुबह कुछ लड़कियां पूछते हुए आयीं....आपके लिये मैडम ने यह कार्ड भिजवाया है...........उसी पीजी ब्लॉक में कोई वार्षिक उत्सव.....चुपचाप पीछे बैठ गया....खत्म होने पर उनके सामने......अब तो ज्वायन कर लो हमें... डिप्लोमाधारी हो जाओगे....आपके अंदर कितना जुनून था रशियन को लेकर! 


अब रूसी भाषा की क्लास में....

लखनऊ विश्वविद्यालय में घुसने की यह तीसरी कोशिश......इंटर करने के बाद वहां के चार-पांच चक्कर लगा कर कान्यकुब्ज कॉलेज में.....दोबारा..डॉ. एनएन श्रीवास्तव के सौजन्य से पीएचडी में रजिस्ट्रेशन ...बैठने को लायब्रेरी के पीछे लम्बा-चौड़ा हॉल......मोनेटरी की मोटी-मोटी किताबों में दो महीने झक मार कर हाथ जोड़ लिये....

एक साल बाद नौकरी में...... उन दिनों अपनी बहन जी पता नहीं क्या क्या कर रही थीं.....पीएचडी भी...डबल एम ए भी.....रूसी भाषा में डिप्लोमा भी.........और रूसी साहित्य दीवाना......

काफी मिन्नतों के बाद बहन जी ले गयीं रशियन क्लास में......मैडम........देखते ही..... फूल ही फूल खिल उठे मेरे पैमाने में.....मुगलई चेहरा...छोटे बाल....ठीक कद-काठी.....कुल मिलाकर ऐसी शख्सियत.......कि देखते ही गुनगुनाने का मन करे.....तो आप अपनी बहन जी को लेकर आए हैं सिफारिश के लिये....क्या कर रहे हैं......सूचना विभाग में सब एडिटर.........सरकारी नौकरी में...लगते तो नहीं सर्विस वाले...तब तो आपको नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लाना होगा.....

फार्म और सब कागजात के साथ फिर मैडम के सामने.....पढ़ के ही मानेंगे रूसी....फार्म पर दस्तखत किये......टाइम का एडजस्टमेंट कर लेंगे ना...अब आप मेरे स्टूडेंट हैं.....सब डिप्लोमा वाले बैठे थे तब...अपनी शुरुआत थी प्रोफिशिएंसी से....ये सब आपके सीनियर हैं.....आपकी बहन जी के साथ के.....इज्जत बख्शियेगा इन्हें.....

क्लास का पहला दिन.....पढ़ने .....लिखने की लिपि अलग-अलग......संस्कृत की तरह रूप......सब कुछ अपने मिजाज के खिलाफ......लेकिन क्या स्टाइल था उनका....समझाने का तरीका.... बाप रे बाप....चार-पांच दिन में वाक्य बनाने आ गये....कुछ ही दिन में गलत-सलत बोलना भी.....घर में बहन मंजे हुए अंदाज में रूसी बोलती..... तो भाई क से कबूतर वाले अंदाज में........अब होड़ थी समय से....मैडम के और करीब आना है .....बहन को पछाड़ना है.......पूरा दिन भरा-भरा सा रहता.....

अमृत प्रभात लखनऊ से निकलने लगा था........विदेशी मामलों पर कुछ लिख कर पहुंच गया वहां......सम्पादक को दे दिया.....दो ही दिन बाद छप भी गया......मैडम की नजरों में चढ़ने को जबरदस्त उछाल.......

रूसी भाषा पर अपना हर स्ट्रोक सही पड़ रहा......कुछ दिनों बाद लेकिन मामला गड़बड़ाने लगा.....मैडम कुछ पूछतीं जवाब कुछ होता......कैलाश हॉस्टल के पीछे टीचर्स कॉलोनी......घर बुलाया एक दिन....कॉफी पिलायी...आप बहुत जल्दी ज्यादा से ज्यादा सीखने के चक्कर में पड़ गये हैं...इसलिये यह गड़बड़ी हो रही है.......हम जानते हैं आप बहुत अच्छा करेंगे....लेकिन धीमे-धीमे चलिये.....फिर इधर-उधर की...अपने रीसर्च की.....जो कुप्रीन और राजेन्द्र सिंह बेदी की कहानियों पर.....कई साल साल सोवियत संघ में गुजारे......चलते समय कई सीडी दीं......उच्चारण सही करने को........

जल्द ही यह कठिन विदेशी भाषा बिल्कुल अपनी लगने लगी....सोचना भी शुरू कर दिया......मन ही मन वाक्य बनने लगे.......लेकिन ससुरी इन गर्मी की छुट्टियां का क्या किया जाए .....दो महीने बगैर अपनी टीचर के........ सुबह सात बजे से नौ बजे का टाइम का टाइम काटना मुश्किल....ऑफिस में उनकी याद....रात में बहन से उनकी चर्चा..........दो महीने की शामें गोमती किनारे.... गंजिंग.....जॉन निंग और मेफेयर टॉकीज में किसी तरह खपायीं......

यूनिवर्सिटी खुलते ही फिर सब हरा भरा .....लेकिन अब एग्जाम करीब.......मौखिक परीक्षा में रूसी दूतावास का कोई अफसर.....सामने मैडम की मुस्कुराती आँखें ....घबराना मत बिलकुल... मैं हूं न.......जरूरत से ज्यादा ही झाड़ दी रूसी.......बाद में.....तुम नहीं मानोगे...क्या जरूरत थी इतना सब कहने की....कुछ गलत हो जाता तो.....अब लिखित परीक्षा.....एस्से आया.... मेरा दोस्त.....याद किया था.... मेरा शहर....भाड़ में गयी फिक्र.....अपने दोस्त को स्टेशन से पकड़ पूरा शहर ही घुमा दिया.......

अब...........रिजल्ट आते ही बुलावा ....खूब गुनगुनाते थे न जब मैं सीढ़िया चढ़ती थी.....हाथ में सिगरेट भी...लेकिन....लेकिन तुमने बहुत ही अच्छा किया.......डिप्लोमा भी बढ़िया हो....समझे......फिर एक दिन क्लास में.....अब मैं आप सभी से एक साल बाद मिलूंगी.......



1/16/18 
सर जी, इस में एक बून्द पानी नहीं

एक कहानी.....

घर कहना तो सही नहीं होगा उसको.....वो उसे स्टूडियो कहते हैं....पर सबसे सही शब्द है आरामगाह......सड़क पर ज़रा भी चूके तो आगे निकल जाएंगे....जो मेरे साथ अक्सर होता है....कई बार आगे निकल गलत जगह घूम  जाता हूँ....लौट कर फिर सड़क पर.....और फिर पहले से तय की हुई  अगल-बगल की पहचान पर एक नज़र डाल सही रास्ता पकड़ना...

दायीं तरफ ..एक पतला सा रास्ता...उबड़-खाबड़....उस रात उस रास्ते  पर चलते और फिर उस खंडहर की बाईं तरफ सीढ़ी  चढ़ते मन कांप रहा...लेकिन आख़िरी पैड़ी पर कदम धरते  ही सारी घबराहट दूर हो गयी थी.....उस हँसते चेहरे से जैसे रजनीगंधा के फूल झर रहेे....स्टेशन पर कदम्ब का वृक्ष और यहाँ खुश्बू बिखेरती कई सारी डालियाँ....

जी हाँ, मैंने पेड़ को अपने साथ घूमते देखा है और फूलती रजनीगंधा को गौरैया में तब्दील होते ......कैसे .....
बताता हूँ .....
बाहर लंबा-चौड़ा छज्जा...अन्दर घुसते ही बड़ा सा कमरा...दरवाजे के दोनों तरफ छज्जे की तरफ झाँकतीं खिड़कियाँ....जिनके पल्लों में हाथ डाल कर उस कमरे में ताला मारने के बाद चाभी धरी और उठायी जाती है.....  .....अक्सर नहीं.....ख़ास मौकों पर.....उस कमरे के दोनों तरफ दरवाजे और उन दरवाजों के पीछे कमरे....बाईं तरफ वाला कमरा सोने के लिए....उसमें भी दरवाज़ा....और फिर एक कमरा....फिर एक दरवाज़ा...और उस से उतरतीं दो सीढ़ी....अब रसोई....रसोई में से निकल कर एक छोटे से आँगन में.....पानी के सारे काम वहीं....अब फिर आया जाए बाहर वाले कमरे में.....

अब दायें दरवाज़े से अन्दर चलें ...यहाँ भी कमरा....एक कलाकार का कमरा...उसी से लगी एक कुठरिया....मूर्तिकला के लिए.....इसका एक दरवाज़ा आँगन में भी खुलता है.....शुरू में ही आरामगाह बोला था न ....जो सच में है भी....मानसिक तनाव दूर करना हो....अवसाद दूर करना हो....थकान उतारनी हो.....यहाँ चन्द घंटों के लिए आ जाइए...और बाहर वाले या बाईं तरफ वाले कमरे में पसर जाइए......तय मानिए  कि चैन की सांस लेते हुए बाहर निकलेंगे.....

और मौज मारने की तो अचूक जगह......साबूदाने के बड़े हों..... भजिया.........तले हुए भुट्टे के दाने हों या फिर दाल रोटी...या फिर चिकन-मटन.....और साथ में सोमरस.....दिव्य आनंद......बाहर जो रजनीगन्धा उस रात दिखी थी ना...अन्दर जाते ही वो गौरैया बन जाती है....और उसको लेकर हैरान परेशान वो कदम का पेड़....कलाकार .......छोड़िये...बहुत सारे रूप हैं उसके......घनघोर रूप से शानदार जोड़े की वो संतान देख रहे हैं न आप....जो मुझे नाम से बुलाता है....और दोस्त मानता है मुझे......इसके अलावा कुछ भी न मुझे मंजूर है न उसे......मामला उसी का नहीं.....उन दोनों के साथ भी सब कुछ वही मंजूर है जो जिस रूप में सामने आया....हम चारों ने ही किसी तरह की अपनी तरफ से कोई मिलावट नहीं की है......कोई दूधवाला हो तो यही कहेगा...साब जी... एक बूंद पानी नहीं मिलाया है....चाहो तो अभी का अभी खोआ बना कर देख लो.....

उस रात वहीं सोया गया.....सुबह उठते ही मेज पे धरा मोबाइल टनटनाया.....गौरैया कहीं अन्दर-बाहर होगी....कलाकार ने उठाया....सन्देश था....तुम्हारी बहुत याद आ रही है....आगे  गौरैया लिखा था या जानू ....लिखने वाले को तो याद नहीं.......प्रकृति के नियम से भी चला जाए.....तो जो भी भाव कलाकार के चेहरे पर आये.....वो गौरैया को देखते ही लुप्त हो गए....लेकिन........राजीव जी तुम्हें बहुत याद कर रहे हैं.....के कहने का भाव  कानों  पर पलांश भर ठिठका और फिर अपना काम कर कहीं जा बैठा.......

उसी दिन दोपहर या शाम किसी समय कलाकार ने गौरैया से कहा......तुमको फील तो नहीं हुआ मेरे कहने का......गौरैया एक बार फिर रजनीगन्धा बन गयी......कैसी बात कर हैं सर जी......कुछ हो तो फील किया भी जाए.....लेकिन आपसे बस इतना कह रही हूँ कि मुझसे भी ज़्यादा...यहाँ तक कि मेरे पिता से भी ज़्यादा विश्वास राजीव का  कीजिएगा..........

इस बेहद  छोटे से अघटित घटनाक्रम का व्यवहारिक या सांसारिक पक्ष तो मैं नहीं जानता, लेकिन आदतन युगांधर पलटते पलटते  द्वापर युग में पहुँच गया.......फिर बच्चन जी की ....क्या भूलूं क्या याद करूं....के कुछ पन्ने याद आये.......लेकिन रजनीगन्धा की खुश्बू कहीं नहीं थी....न ही साथ साथ चलता कदम का पेड़....था भी तो एक तरह का आदर्शवाद ....कि हमको कैसा होना चाहिए .......जबकि ये दोनों शख्स दुनिया में रहते हुए भी किसी और ही दुनिया से कई-कई  बार रु-बरु करा जाते हैं.....खुद मैं कई बार अपनी बांह में चकोटी काटता हूँ तो यही पता लगता है कि कोई सपना नहीं देख रहा......

1/17/18
हमारे संपादक नंदकिशोर त्रिखा

बत्तीस साल पहले लखनऊ नवभारत टाइम्स में रामपाल जी के जाने के बाद त्रिखा दिल्ली से स्थानीय संपादक बना कर भेजे गए थे..अभी अभी कुछ मित्रों से उनके न होने का पता चला...

2011 के जाड़ों में आगरा में हुए एक पत्रकार यूनियन के सम्मेलन में अरसे बाद उनसे मिलना हुआ था...

नवभारत टाइम्स में मेरे जैसे निहायत अराजक इंसान से पटरी न बैठने के बावजूद त्रिखा जी हमेशा बहुत अच्छे से पेश आये..

त्रिखा जी गुलिस्तां कॉलोनी के अपने आवास पर विभिन्न मौकों पर सत्संग वगैरह कराते रहते थे...और तब मेरे अलावा सारा स्टाफ उनके यहां मौजूद रहता था..त्रिखा जी मुझे केबिन में बुला कर मुस्कुराते हुए प्रसाद देते और पूछते..यह तो खा लेंगे न आप..

कई बार मेरे लेखन से बेहद अपसेट हो जाते तो नवीन जोशी उन्हें संभालते...

उन दिनों टाइम्स ऑफ इंडिया और नवभारत टाइम्स में रविवार की दोपहर सिर्फ और सिर्फ मेरे गायन की हुआ करती थी.. रामपाल जी तो भूले से भी संडे को आफिस नहीं आते थे कि आज तो राजीव ने मजमा जमा रखा होगा...लेकिन एक रविवार त्रिखा जी आ गए...हॉल के अंदर शीतल मुखर्जी का खास ऐसे मौके पे लाया ट्रंजिस्टर चिंघाड़ रहा तो उससे भी तेज आवाज में मेरा गला.. टाइम्स ऑफ इंडिया में बैठा शीतल मुखर्जी वाह वाह कर ताल दे रहा..यहां ध्यान दें कि मैं कुर्सी पे नहीं, बल्कि बड़ी सी गोल मेज पर गायकों की मुद्रा में बैठता था...

त्रिखा जी काफी देर तक दरवाजे पर खांसते रहे खखारते रहे, लेकिन इतने शोर में कहां सुनाई देता है..अंत में त्रिखा जी ने अंदर कदम रखा और सीधे अपने केबिन में..मैंने किसी तरह अपनी आवाज रोकी, ट्रांजिस्टर बंद किया...कुछ देर की घनघोर शांति के बाद त्रिखा जी ने बुलवाया...

राजीव जी यह क्या हो रहा है..तो अपन ने क्या कहा..सुनिये...त्रिखा जी आज तो आपको आफिस आना ही नहीं चाहिए था..संडे तो मेरा दिन होता है..इस बेहद नामाकूल अंदाज़ से खफ़ा हो कर त्रिखा जी जो चाहे कर सकते थे..लेकिन एक तो वो दिन ही बिल्कुल और थे..त्रिखा जी भी उतने ही शानदार इंसान..

करीब दो साल का साथ रहा मेरा उनके साथ..87 में चंडीगढ़ जनसत्ता जाते समय त्रिखा जी ने आफिस में मेरी पार्टी कर मुझे विदा किया था...

आज के चाकर किस्म के पत्रकार कल्पना भी नहीं कर सकते पत्रकारिता के उस समय के बेहद शानदार माहौल का...और वैसा माहौल देने में त्रिखा जी का होना कितना जरूरी होता था...

1/18/18
जनसत्ता-एक्सप्रेस का हॉल

सत्तासी के अप्रैल में लखनऊ नवभारत टाइम्स से विदा ले चंडीगढ़ जनसत्ता में...

एडिटोरियल हॉल एक्सप्रेस और जनसत्ता का एक ही..दस साल से अब तक उस पर इंडियन एक्सप्रेस का ही राज चल रहा था..पर बंटवारे के वक्त कोई खूनखराबा नहीं..

हॉल में घुसते ही दाहिनी दीवार से सटा जनसत्ता का कारोबार...सामने और उसके दाहिनी तरफ एक्सप्रेस का खेला..
दोनों की जनरल डेस्क आमने सामने न होकर थोड़ी तिरछी..तो जैसे मैं संस्करण प्रभारी के रूप में अपनी कुर्सी पर बैठूं तो एक्सप्रेस प्रभारी को देखने के लिये आंखों को दाहिनी तरफ हल्की सी ज़ुम्बिश देना ज़रूरी..

एक्सप्रेस वालों में कई बड़े नाम..संजीव गौड़ और निरुपमा दत्त और जगतार और प्रदीप मैगज़ीन खास तौर पर...तहलका वाले तरुण तेजपाल ने तभी एक्सप्रेस छोड़ टेलीग्राफ ज्वायन किया था..लेकिन उसकी मोटी सी खूबसूरत बीवी गीतन वहीं हमारे बीच..इंडिया टुडे के जाने माने फोटोग्राफर प्रमोद पुष्करणा की बीवी जया रिपोर्टर..

अब मुद्दे पर आया जाए...
प्रभारी की कुर्सी के बिल्कुल सामने की दीवार न देख कर अगर आप हल्का सा दाहिने जाएं तो बड़ी सी खिड़की और खिड़की से सटी मेज..मेज के पीछे कुर्सी और कुर्सी पर लावण्यमयी युवती विराजमान..सांवला रंग..कलफ लगी सूती धोती या साड़ी..
खबरों के तार छांटते एक दिन नज़र उठायी तो खिड़की वाली को ध्यान से देखा..अच्छी लगी..कई कई बार देखा..दो दिन बाद उधर पता चल गया कि कोई देखता है..भले ही नज़रों में मवालीपन न हो पर देखता तो है न..
तीसरे दिन माथे पर बड़ा सा लाल सूरज और मांग में सिंदूर..

लेकिन हमने देखना बंद नहीं किया..और क्यों बंद करूं....आंखों में प्रशंसा का ही तो भाव है न..

नवभारत टाइम्स की फिल्म समीक्षा और फिल्म लेखन की लोकप्रियता की भरपूर सुगंध चंडीगढ़ भी पहुंच गयी थी..सो, आदेश हुआ कि जनसत्ता में जारी रखा जाए..एक दिन सुरक्षा गार्ड के रूप में सरदार हरजिंदर सिंह को पकड़ आतंकवादियों के प्रिय ठिकाने मोहाली पहुंच गया पिक्चर देखने..वतन के रखवाले..लौट कर समीक्षा लिख छपने दे दी..

दो दिन बाद रैक पर रखे अखबारों को दो-तीन एक्सप्रेसी देख रहे..कुछ देर बाद वो मेरे पास आए..उनमें से एक बेहद हैंडसम युवक ने पूछा ..राजीव मित्तल आप ही हैं!!! मेरे हां कहते ही तपाक से हाथ मिलाया...गुरू मज़ा आ गया..ये थे प्रदीप मैगज़ीन...यानी उस युवती के पतिदेव..

अब युवती को देखना बंद कर दिया तो उधर से अक्सर अपनी तरफ देखते पाता..अब उन निगाहों में प्रशंसा का भाव..जय हो वतन के रखवालो..एक रात वैन में साथ हुआ..आप जलवा पर क्यों नहीं लिख रहे..नवभारत टाइम्स में लिख कर आ रहा हूं..ये थीं मुक्ता मैगज़ीन..जिनके टिफिन की प्रदीप के साथ कई बार हिस्सेदारी निभायी..



1/19/18
बॉम्बे में देवदास

बॉम्बे की पहली तीन यात्राएं...
पहली बार इंटर में 
दूसरी बार इंटर फेल
तीसरी बार इंटर पास

फेल इंटर को जब पास किया तो जाहिर था बीए में आते..और बीए में आते आते अपनी दुनिया पूरी तरह काली पीली हो चुकी थी..चकत्ते तक पड़ गए थे..तू तू नहीं मैं मैं नहीं वाला हाल..

कुछ देर क्लास में भटकने के बाद सायकिल उठाता और शारदा नहर की लहरें गिनने बैठ जाता..कुछ देर बाद दो-चार दोस्त तलाशते हुए पहुंच जाते कि कहीं छलांग न लगा दी हो..

दीवाली निकलते ही बॉम्बे..उषा दी को पत्र लिखा...आ रहा हूँ..जवाब में...आ जाओ..
ट्रेन यात्रा में पहली बार इकलौता था..20 घंटे चुप्पी मारे रहा..नासिक आते आते कोट स्वेटर उतर चुके थे..इगतपुरी में टिफ़िन का बचाखुचा खाना इस उलाहने के बाद पकड़ा दिया..अबे कुछ देगा भी..

कल्याण पे उतर उषा दी के उनका कुछ मिनट इंतज़ार किया और फिर तुफैल में टैक्सी पकड़ अम्बरनाथ..टैक्सी जब जंगल और पहाड़ियों से लबालब अम्बरनाथ में घुसी तो इहलाम हुआ कि महामूर्ख हूँ..लेकिन ईश्वर ने साथ दिया और  घर नज़र आ गया, जहां मुझे जाना था..टैक्सी को रोक एक खड्ड में बसे उस घर के दरवाज़े को पीटा..उषा दी दरवाज़े पर..तुम अकेले, वो कहाँ हैं!! अपना मासूम जवाब .. टैक्सी पकड़ कर आ गया, उनका पता नहीं..उषा दी आंखे चौड़ी कर बोलीं..तुम बिल्कुल नालायक ही रहोगे क्या..

बहरहाल, अगले एक महीने उस गोआनी बस्ती से विक्टोरिया टर्मिनस, वीटी से चर्चगेट और चर्चगेट से सात बंगला तक का डोलना कैसा रहा..यह अगले अंक में..

1/19/18

सुर तो ठीक ही लगा था.. फिर....


गमले में फूल पूरी सोच और तैयारी के साथ खिलाये जाते हैं, पर उसी गमले में कई बार हरी घास भी झांकने लगती है, जिसका फूल से, उसके उगने और खिलने या फूल को सहलाती हमारे हाथों की उंगलियों या फूलों को निहारती हमारी आंखों से कोई संबंध नहीं होता। वो घास या तो हमारे रहमो करम पर रहती है या खुद ब खुद मुरझा जाती है.....लेकिन कई बार हम पाते हैं कि अचानक फूलों के पौधों के बीच बेवजह उग आयी घास हमारे दिल में कुछ ऐसा पैठ जाती है कि सारे फूल अपनी खुश्बू के साथ कहीं ओझल हो जाते हैं।


जब मां और सब टीचरें स्कूल चली जातीं, तो हॉस्टल पर कुछ घंटों के लिये अपना साम्राज्य। चाहे जितना गुलगपाड़ा मचाऊं, छत की मुंडेर पर चढ़ पतंग उड़ाऊं.... फुल वॉल्यूम पर गाने सुनूं.....गलियारे में किसी के दरवाजे को विकेट बना कर बल्ले बाजी करूं या अपना सुर कैसी भी उंचाई पर ले जाऊं......या नहाते समय बाथरूम का दरवाजा खुला छोड़ दूं। ऐसी ही दोपहर थी वो...खटखट सुनी तो आवाज को लगाम दी.. दरवाजा खोला। नया चेहरा.....मैं बगल के कमरे में कुछ दिन पहले आयी हू...तुम्हीं गा रहे थे..... जी..जी..जी..हां। मिसेज मित्तल के बेटे हो न......किसी काम से आयी थी...गाना सुन कर रुक गयी... डिस्टर्ब करने के लिये सॉरी।

एक इतवार को दिखीं तो अपने कमरे में बुलाया.....वो गीत आता है?.....सुना दो। सारी लज्जा और शरम के बावजूद दुनिया वालों से जुड़ने को यही तरीका अपनी पसंद का था। गला खखार शुरू हो गया। आधे पर ही था कि उनके आंसू बहने लगे। अब मैं क्या करूं। हुक्का बन गया बिल्कुल। उठीं..मुंह धोकर आयीं। मेरे हसबेंड को बहुत पसंद था। लास्ट ईयर मॉस्को में निधन हो गया। आईएफएस थे। जैसे ही जाने को हुआ....रुको... तश्तरी में मेवों की ढेरी रख हाथों में थमा दी। खूब सारे रिकॉर्ड्स दिखाये...पुराने स्टाइल का ग्रामाफोन। ये सब तुम अपने पास रखो। अगले दिन मां से सुना कि फोटोग्राफी का भी शौक है तो कीव कैमरा भी।

एक दोपहर। अपने कमरे में ले गयीं....दो नये चेहरे घूरते दिखे। इनसे मिलो......। गलाबाजी तय थी। आह-वाह के बाद एक ने भी कुछ सुनाया। गाना सुनाने वाली नये सेशन में हॉस्टलर हो गयी। कमरा एक मंजिल ऊपर। नकचढ़ी लगी। अगस्त में गायन सीखने लगा तो पूरी शाम वहीं का हो गया। भातखंडे ने अपने शेयर काफी ऊंचे पहुंचा दिये। प्रशंसकों की तादाद में जबरदस्त उछाला। उन मैडम की नाक भी सम पर आ गयी। नाक सम पर आ गयी तो पूरा गलियारा उनकी खिलखिल से भर उठा। चूंकि सब मां के गैंग की थीं...तो, इज्जत से पेश आना जरूरी था। अब उनके साथ खूब उठना-बैठना..किताबों की चर्चा..फिल्म देखना...घूमना.. एक दिन उनकी डायरी मांग बैठा और जब मिल गयी तो तकिये के नीचे रख कर कई नींद पूरी कीं।

दिसम्बर में भातखंडे में गायन की परीक्षा.... एक बड़े कलाकार के सामने..... खमाज पकड़ने का हुक्म मिला.. सुना दिया तो कलाकार मुस्कुराये..आपने ठीक गाया?.....जी, बिल्कुल ठीक गाया....तब उन्होंने गा कर सुनाया तो पता चला..अपना धैवत गलत लग रहा था। लेकिन सिखाया ही उसी तरह गया था। अपनी गल्ती मानने को तैयार नहीं था। वो बोले....अपने मन से कुछ सुनाओ। बिलावल में कुछ सुनाया। उन्हें पसंद आया। बोले..अगले सेशन में मेरे पास आना। गला संभाले रखो।

जनवरी में सेशन शुरू हुए कई दिन निकल गये लेकिन मैं नहीं गया। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्यों नहीं जा रहा हूं। सांस की तकलीफ का बता कर घर वालों को शांत कर दिया। रात आठ बजे के बाद कमरे में ही महफिल लगने लगी। तार कसते जा रहे थे...... नयी झंकार में कुछ अजब झनझनाहट। सारे सामाजिक क्रिया कलाप बंद...कॉलेज और घर..... बस। एक शाम रास्ते में भातखंडे के एक शिक्षक मिल गये.....तुम आ क्यों नहीं रहे हो....महीना भर हो गया......दो नये राग सिखा दिये गये हैं.....मेरे घर आ जाओ कल से...पूरी तैयारी करा दूंगा। यह गल्ती मत करो। हां हूं कर टाला उन्हें...कौन बताता कि किस दौर से गुजर रहा हूं।

इंटर के एग्जाम सिर पर आ गये....हाथ लग गयी अमृतलाल नागर की बूंद और समुद्र। करेले की बेल पहले से लिपटी पड़ी थी अब नीम भी सवार। रिजल्ट आया तो फेल... फिर उसी क्लास में। मां-पिता ने बुरा लगने जैसा कुछ न जताया.. तो.. यहां भी सामान्य होने में देर नहीं लगी।

हर रविवार को अपने घर चली जातीं तो बहुत खाली-खाली लगता। बाकी छह वार स्कूल की छुट्टी साढ़े चार बजे। मां समय पर आ जातीं। अब कान सीढ़ियों की पदचाप पर टिकने को बेताब। यह नहीं, यह भी नहीं....अचानक कोई ऐसा कदम पहली सीढ़ी पर पड़ता कि दिल और दिमाग के सारे सुर-ताल हिलने लग जाते। सीढ़ी कम होती जा रही हैं। दो पैड़ी बचीं..फिर एक....फिर.... अब कदम किधर की तरफ मुड़ते हैं.. दरवाजे की तरफ या अपने कमरे तक जाने को ऊपर की ओर। दिल बाहर निकलने को। दरवाजा खटका तो पूरी कायनात अपनी झोली में...नहीं तो..तो..गहरे डूबने की तैयारी।

अक्तूबर आया तो स्कूल में दशहरे की छुट्टियां। अपना सिर दीवार पर दे मारने का मन करे। एक दिन मां पकड़ कर बैठ गयीं.....राजू ..अब यह सब छोड़ दे...बहुत हो ली भावुकता...वो अब जल्दी ही यहां से जा रही है....उनके चेहरे पर निगाह ठहर गयी......वो घर वालों को बिना बताये शादी करने जा रही है। लड़का पीसीएस है.. बम्बई कस्टम में। इंच-टेप लेकर बैठ गया लेकिन इंटरफेल की नाप किसी तरह पीसीएस को नहीं छू पा रही थी............गमले में बेवजह उग आयी घास पीली पड़ रही है..फूल-पत्तियों पर ध्यान दे यार.......।



1/20/18 
वो वक्‍त
कब होता है
जब मैं 'मैं' होती हूं
और वहाँ
तुम नहीं होते......

कहो न फिर
मैं तुम्‍हें याद कब करूँ
कैसे लिखूँ
आंसू भीगे ख़त

तुम तो तब भी
पास होते हो
जब मैं
अलगनी पर
गीले कपड़े 
पसार रही होती हूँ
या 
साग-सब्‍जी का
हिसाब कर रही होती हूँ

फिर कैसे
पतंग पर 
तेरे नाम एक संदेश लिखूँ 
और ढील दूँ डोर को
तुम तक पहुँचने के लिए
या समुन्दर किनारे
खड़े होकर 
लहरों को तुम्हारा पता दूँ

तुम्हें पता नहीं क्या अब तक 
मैं...यानी तुम 
क्‍या अब भी
दूरी कोई है हमारे दरमियाँ 

…© रश्मि शर्मा

1/20/18
गतांक से आगे...

अम्बरनाथ के जंगलों में..

पहले तब के अम्बरनाथ का जुग्राफिया.. मरगिल्ला सा स्टेशन..पेट और पीठ आपस में चिपक गई हों जैसा प्लेटफॉर्म..वहां से निकल कर अजीबोगरीब बसावट..कोई मकान टेकरी पर तो कोई गहरे खड्ड में..एक साथ तीन मकान बहुत कम..मकानों के बीच पेड़ों और झाड़ियों की भरमार..पांच सौ फुट ऊपर तक जाती पहाड़ी कच्ची सड़क..दो तरफ घना जंगल..

खरे साब कस्टम ऑफिसर.. तो घर भर में आयातित सामान की भरमार..बाथरूम तक में टीवी..हर समय किसी सेठिये की मर्सिडीज़ द्वारे पे..खुद के पास बड़ी सी कार.. चालक ड्राइवरी के अलावा किचेन भी संभालता.. वहां से मेन बॉम्बे की दूरी दो घंटे की..

खड्ड में धंसे इस घर के दाहिनी तरफ के टैरेस से दिखती एक पहाड़ी...उस पहाड़ी पर किसी पीर की मज़ार...रास्ता घने जंगल से हो कर..वहीं बीच जंगल में हज़ार साल पुराना मंदिर, जिसमें खरे साब उल्टी सीधी कमाई को पुण्य में बदलने को छुट्टी वाले दिन लंबी पूजा करते..दो बार साथ में गया तो मैं अंदर न जा कर एक नहर के किनारे किनारे चलता चला जाता और घने जंगल में धंस जाता, जहां एक से एक विचित्र जीव इस जीव को घूरते..

उषा दी सिसोदिया वंश की..खरे साब उनके सामने टेंचू जैसे बने रहते..जब तक उषा दी को मातृत्व वाला दर्द नहीं हुआ, ज़िन्दगी बड़ी चैन से कट रही थी अपनी..न फेल होने का डर, न वो बेनाम दर्द..बस दिन भर हल्ला गुल्ला.और यहां घूम वहां घूम..

मां बनने के दिन नज़दीक आ गए तो उषा दी चर्चगेट के एक शानदार हॉस्पिटल में भर्ती..खरे साब का वहीं उनके साथ रहने का इन्तज़ाम ..बचा मैं, तो दिन में खरे साब की तरफ से पूरी बम्बई टूलाने का पूरा बंदोबस्त, जो अगले 15 दिन बिना बाधा के चला..

लेकिन उन 15 दिनों की कई रातें बड़ी खौफ़नाक गुजरीं, जो दो बजे अम्बरनाथ स्टेशन से शुरू हो जातीं..
इस बारे में अगला अंक....
1/22/18