बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

प. यूपी यानी वीराने में वीरानी सी

राजीव मित्तल
दो दशक से ज्यादा हो गये पश्चिमी उत्तरप्रदेश की जनता को हाईकोर्ट बैंच की मांग करते हुए-तो करने दो भई। अलग प्रदेश बनाने की मांग नेहरु जी के जमाने से चल रही है-चलने दो। इक्कसवीं सदी नौ साल पुरानी हो चुकी, पर रेलवे का नेटवर्क बाबा आदम के जमाने का है। मेरठ हो या बागपत या बुलंदशहर-यहां से हरियाणा को जोड़ने वाला कोई ट्रैक नहीं। विद्युतीकरण और दोहरीकरण के काम हवा में लटके हुए हैं। बारह साल पहले बागपत को मेरठ से अलग कर जिला बनाया गया। लेकिन वहां इन बारह सालों में जिला अस्पताल ही नहीं है। विकास प्राधिकरण क्या बला है, एक भी तकनीकी उच्च शिक्षा संस्थान नहीं। बुलंदशहर से ज्यादा दूर नहीं है नोएडा, दिल्ली और गाजियाबाद। लेकिन विकास नाम की चीज उतनी ही दूर है। नोएडा से केवल 30 किलोमीटर चल कर आपको इस गंधाते कस्बेनुमा शहर के दर्शन हो जाएंगे। मुजफ्फरनगर उस पतंग की तरह है, जो पता नहीं कब से कट बिजली के तारों में जा फंसी है। दिन, महीनों, साल गुजर गये, बेरंग कटी-फटी पतंग उसी तरह फंसी हवा में फड़फड़ा रही है। गन्ने और शक्कर ने समृद्धि दी है, पर कैसी भी चेतना से परे रखा हुआ है। पैसा है ब्याहता को हेलिकॉप्टर से विदाई के लिये। ट्रैक्टर पर लैपटॉप और स्कॉर्पियो में म्यूजिक सिस्टम लगवाने के लिये। पूरा जिला अपराधों की मंडी बना हुआ है। मेरठ के बाद सहारनपुर पश्चिम उत्तरप्रदेश का सबसे बड़ा शहर है। औद्योगिक विकास की भरपूर सम्भावनाएं। व्यापार, लकड़ी का फर्नीचर, कैमिकल और कागज निर्माण उद्योग। इसके अलावा बेहद उपजाऊ जमीन। पर हाल वही कि वीराने में वीरानी सी छायी हुई है। मुद्दा वही कि बुनियादी सुविधाएं कहां हैं। बिजली का संकट सभी उद्योगों की ऐसी की तैसी किये पड़ा है। सड़कें फटेहाल हैं। यही हाल बिजनौर का है। जवान होने की प्रक्रिया जैसे रुकी पड़ी है। सरकारी अस्पताल डॉक्टर विहीन हैं, बेरोजगारी ने युवाओं को अपराध की दुनिया में धकेल दिया है। गंगा-जमुना से घिरा पूरा पश्चिमी उत्तरप्रदेश का जल स्तर चिंताजनक स्थिति तक पहुंच गया है। एशिया की सबसे बड़ी गुड़मंडी तबेला बन कर रह गयी है। पीजीआई को तो भूल ही जाया जाये। शराब की फैक्टरियां और हापड़ रोड पर करोड़ों की लागत से बने मीट प्लांट इस क्षेत्र के विकास के ‘ज्वलंत’ उदाहरण हैं। फैक्टरी का प्रदूषित जल जमीन के नीचे पहुंच पानी में जा मिला है। इसके चलते कई गांव ऐसे हैं, जहां जहरीले पानी की वजह से शादी-ब्याह बंद हो गये हैं। और बूचड़खाने ऐसे-ऐसे कि जिनकी मीलों फैली दुर्गंध की वजह से बेटी की शादी तय करते समय बाप बस एक ही शर्त रखता है कि लड़का कहीं और जा कर बसे। और हां, सिंथेटिक दूध के धंधे को क्यों बिसरा रहे हो। यह धंधा भी लाखों को करोड़ों में और करोड़ों को अरबों में बदल रहा है। इस बार वोट मांगते समय विकास के किसी मुद्दे को उठाना या उसका वादा करना नादानी होगी।

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