शनिवार, 4 अगस्त 2012

कितने साल हो गए

राजीव मित्तल


कल भी  हमेशा की तरह कहीं खोया हुआ था..अचानक निगाहें बाजार की रौनक पर ठहर गयीं। दुकानें राखियों से सजी हुई थीं..सभी  पर खूब भीड़..वहां से ऑफिस  पांच मिनट की दूरी पर..उन पांच मिनट में बीते समय के सारे खिड़की दरवाजे अपने आप खुलते चले गए..ऑफिस  पहुंचा तो रक्षाबंधन के लिये छुट्टी के कई आवेदन..शाम को चियां से फोन पर बात हुई..यह वाकया बताया तो बोली..आप इस पर लिखिये..अरे नहीं..कितना कुछ खंगालना पड़ेगा..कितना कुछ छिपाना पड़ेगा..पर, वो अड़ गयी..

राखियां दुकानों पर सजी देख दाहिने हाथ की कलाई पर निगाह गयी..उस पर कई दिन पहले का अमरनाथ यात्रा से लौटे मुकेश का लाल धागा बंधा हुआ था। बदरंग हो चुका है..

कनु.. तुम्हें याद है तुमने कब मुझे राखी बांधी थी और मैंने खूब मिठाई खायी थी..
मीठे के पीछे मेरे पागलपन को लेकर तुम कहा भी  करती थीं..मम्मी..इसकी शादी हलवाई की लड़की से करना।

हम दोनों ने कितना वक्त साथ-साथ गुजारा..

बालविद्या  मंदिर स्कूल के  उस कमरे में दो खिड़कियां थीं ..एक सामने..दूसरी बायीं तरफ.. एक पर तुम और एक पर मैं..दोनों से ही आकाश दिखायी पड़ता था..हम दोनों जब कई-कई दिन एक-दूसरे से बात नहीं कर रहे होते थे..या तो किसी किताब में आंखें गढ़ाए होते या उन्हीं खिड़कियों से बाहर झांक रहे होते..अचानक तुम उठतीं..कुछ बना कर लातीं..और प्लेट मेज पर रख देतीं..कमरा उसी तरह खामोशी से भरा होता..फिर तुम अपनी पढ़ाई में लग जातीं और मैं..और भी  अकेला हो जाता..

जब हम दोनों कनखियों से एक-दूसरे को देख देख अबोलेपन से उकता जाते तो मैं मां से तुम्हारी दो महीने पहले की किसी बात की शिकायत करते हुए आंसू बहाने लगता और तुम मुझे चुप कराने में लग जातीं..कमरा फिर गुलजार हो जाता।

तुम पढ़ाई में बहुत तेज थीं..आंखों की पीड़ा के  बावजूद तुम्हारा रिजल्ट शानदार रहता.. और मैं.. बिल्कुल नामुराद..

तुम्हें याद है कनु..मेरे एक्जाम करीब थे..और मैंने किताब खोल के भी  नहीं देखी थी..तुम अपने कॉलेज के एक टीचर को लायी थीं..ताकि मैं फेल न हो जाऊं..साथ में उनका दोस्त भी  था..तुमने मिलवाया..और आदतन बोल पड़ीं..यह गाता बहुत अच्छा है..तो ट्यूशन की शुरुआत गाने से हुई।

तुम्हारा यही राग था..जिससे भी  मिलवाओ..अपनी दोस्तों से..सभी  के यहां तुम मुझे पकड़ कर ले जाती थीं..तो उनके घरवालों से भी ..बस एक ही बात..इसका गाना..

उन बरसातों में हम दोनों भीगते-भीगते भातखंडे म्यूजिक कॉलेज के प्रिंसीपल के रूम में घुसे थे। अहसान जताते हुए बैठा तो लिया था, पर एडमिशन के नाम पर साफ मना कर दिया..आप दो महीना लेट हो गए हैं..तब तुमने गुजारिश की थी..कुछ सुन तो लीजिये..सुना तो फौरन ले लिया..तुम कितना खुश हुई थीं..

होली से दो दिन पहले तुम अपनी एक दोस्त के घर ले गयीं। तुम तो गीता के साथ पढ़ने बैठ गयीं..उसकी मम्मी मुझे गुंझिया बनाना सिखाती रहीं  और मेरे गाने सुनती रहीं । दो बेटियां..बेटा नहीं था..आवभगत खूब होती..फिर तो अगले दस साल तक गीता के घर का मैं सबसे चहेता प्राणी बन गया था..उसके पापा भी  कितना मजा करते थे न हमारे साथ..नीचे मकान मालिक के यहां तक से वाह-वाह की आवाजें आतीं..
हम कितना साथ-साथ रहते थे..हम दोनों ने न जाने कितनी फिल्में देखीं..और..

जहां जाना हो साथ-साथ..तुम पांच फुट की गिट्टी सी.. ..तुझे देखने को तो गर्दन पूरी ऊपर उठानी पड़ती है।

धत्त..अब मैं तुझे कहीं ले कर नहीं जाऊंगी..सब तेरी ही परवाह करते हैं।

मां कहतीं..इसको भी  अपने साथ पढ़ने बैठा लिया कर..पढ़ते तो हैं साथ-साथ..खरीदी कौड़ियों  के मोल..चौरंगी..बेगम मेरी विश्वास..क्राइम एंड पनिशमेंट..ये सब कहानी किस्से नहीं पढ़ो..कोर्स की किताबें..तब तो यह मुझे भी  फेल करा देगा..

तुम्हें याद है उस तोते की..तुम उसे कुछ न कुछ सिखाने में लगी रहतीं..मैं बम्बई चला गया था..एक दिन तुम्हारा फोन आया..तुम रो रही थीं..तोता उड़ गया राजी..तो मैने तुम्हें कितना समझाया था..वैसे तो हम दोनों रायबरेली से ही तोतों के न रहने, उनके उड़ जाने, बिल्ली का शिकार बन जाने का गम पालते और अगली कोशिश में लग जाते। एक बार मैं पेड़ पर चढ़ कर तीन नवजात उठा लाया था। तुमने कितने दुलार से उन्हें बड़ा किया था..इतने छोटे कि पिंजरे में क्या रखते..उस दिन पंख फड़फड़ाए..उड़ान भरी..निकल लिये..कौन किसको दिलासा देता..

मैं एमए करने बाहर चला गया..जब छुट्टियों में आता..तुम पहले से ही सारे प्रोग्राम तय कर लेतीं..जाड़ों में एक स्वेटर बुना हुआ मिलता..तुम एक अमेरिकी लड़की को ट्यूशन दे रही थीं ..वो कमरे में आते ही योग आसन करने लगती..तुम्हारी एक दोस्त थीं भूमा दीदी..उनके पति केजीएमसी में प्रोफेसर थे..उनके यहां कितना जाते थे..

उन दिनों तुम कई सारे काम एक साथ कर रही थीं..पीएचडी..एक और एमए..और..रशियन में डिप्लोमा..तुम्हारे साथ अक्सर यूनिवर्सिटी जाता..तुम अपने प्रोफेसरों से..दोस्तों से मिलवातीं..

रशियन की मैडम साबिरा हबीब..देखते ही ठान लिया कि एडमिशन तो लेना ही लेना है। तुम्हारे हाथ-पांव जोड़े..बड़े नखरे कर उनसे मिलवाया..एडमिशन हो गया..कुछ दिन बाद हम दोनों रूसी भाषा में बात करने लगे।

बाप रे.. तुमने तो कमाल ही कर दिया था.. तुम्हें अपनी क्लास की एक लड़की बहुत पसंद थी..उसे अक्सर घर लातीं..वो मुझे पसंद करने लगी..मैं बेपरवाह..तुम उसकी हामी जान कर मेरे पीछे पड़ गयीं..घर-भर  को इकट्ठा कर लिया ..अनिल जनविजय से खूब सारी बंगाली मिठाई मंगवायी थी तुमने..
मेरे मना करने पर तुम क्या नाराज हुई थीं..ढाई महीने तक बोलचाल बंद..

एक दिन तुम डॉ. मीरा हो गयीं..नाना जी..जब तुम छोटी सी थीं..फ्रॉक पहनती थीं..तुमको यह कह कर बुलाया करते थे..
बस.. फिर..हम दोनों कहीं खो गए..

हाथ में मुकेश का अमरनाथ से लाया धागा बंधा है..बेजान सा..अभी  उतारने का मन नहीं कर रहा लेकिन..

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012



 
राजा चंदापुर की कोठी 

राजीव मित्तल

चंदापुर रियासत के राजा  फलाने सिंह कैसे भी हों, जगह लाजवाब।  पेड़ों, फूलों की भरमार और घास के कई छोटे-बड़े मैदान।  उनका वैवाहिक जीवन बिल्लौरी जाम की तरह  एक दिन खनाक की आवाज निकालता टूट गया।  बीवी उन्हें वहीं पोर्च के साथ लगे बरामदे में पड़ी किसी आरामकुर्सी पर बैठा कर वो जा..वो जा.. बच्चों समेत.. और तलाक के वक्त उससे ज्यादा की वसूली.. जो.. बाप ने दहेज में पकड़ाया होगा।  मुकदमे के दौरान अक्सर लखनऊ से रायबरेली आती और राजा साहब को थपडि़या कर..नकद नारायण वसूल कर खिसक लेती..

ऐसे राजा को देखे-सुने दशाब्दियां बीत गयीं, पर एक कुत्ते की कहानी पिछले ही साल सुनी, जो अक्सर जंगल के राजा शेर-और उसकी अर्द्धांगनी को खूब गरिया कर दोनों की दुम से अपनी खाज मिटाया करता था..तो शेरनी तो अब थी नहीं, और जनाब राजा साहब का सिर अक्सर हमारे बल्ले से निकली गेंदों से टकराने  से कई बार बाल-बाल बचा।  उनके महल के अंदर घुस कर और  उनकी कार पर तो हमारी गेंदों ने कई बार कलाबाजियां खायी होंगी।  ऐसे  में जब वो किकियाते हुएअपने दीवान जी को बुलाते -भगाओ इन सबको.. तो हम हंसने के इंतजार में उनके सामने सिर झुकाये खड़े रहते।  धड़  और सिर जैसे कद्दू  पे धरा खरबूजा।  शेरनी गयी तो बकरी को ले आए।  दोनों की सुहागरात के दो-चार दिन बाद ही हमने एक क्लब बना कर उन्हीं के बगीचे में  उन्हीं से फीता कटवा  लिया।  अब हम कैसी भी गेंद  को उछाल कर मारने के लिये स्वतंत्र थे।

अब आइये कोठी का मुआयना कर लिया जाए। राजा साहब की रिहायश इक मंजिला इमारत में।  उसके ठीक सामने मेंहदी की नन्ही-मुन्नी बाड़ से घिरा  बड़ा सा लॉन, जो हमारा स्टेडियम  था।   बीच में बजरी वाला रास्ता..जो खूब ऊंचे गेट तक जाता।  उसी रास्ते से लौटिये तो चलते चले जाइये, बजरी की सड़क खत्म.. पहले एक ढलान, ढलान से लगा कुआं।  फिर कुछ दूर तक ईंट-पत्थर का रास्ता।  फिर कच्ची पगडंडी, जो सामने के पांच दो मंजिला मकानों के ब्लॉक से होती हुई इठलाती चलती और कंकड़-पत्थर पर से होती हुई बाहर सड़क का रास्ता दिखाती, जहां से दूसरा मोहल्ला शुरू।

चंदापुर कोठी का परिसर करीब दस एकड़ का। चारों तरफ ऊंची बाउंड्री का घेरा। किरायेदारों में सबसे आखिरी घर टंडन जी का। एक मंजिला। उसमें बेहद खूबसूरत बगीचा।  वहां से शुरू हुआ जाए तो तीसरे ब्लॉक में अपना घर पहली मंजिल पर।  नीचे चटर्जी मोशाय..हमारे और अग्रवाल साहब के घरों के बीच सीढि़यां।  सीढि़यों से नीचे उतरने पर उसके अगल-बगल दो कमरे..किसी आए-गए को ठहराने के वास्ते। अग्रवाल साहब के नीचे त्यागी परिवार।  चटर्जी, अग्रवाल, त्यागी और मित्तल परिवार में खास समानता..हम दो हमारे दो..

घर के ठीक सामने घास का छोटा सा मैदान..बाहर निकल रहे रास्ते के ठीक बगल में दो गैरेज।  उसके बायीं ओर वाले किनारे पर बड़ा सा खपरैल का बेहद पुरातन झड़ीला मकान..उसमें  सपरिवार वकील साहब की बसावट।  बगीचे वाले टंडन जी के तीन बेटे और शायद इतनी ही बेटियां।  यह तो हुआ कोठी वासियों का लेखा-जोखा।  सात-आठ  लगुए-भगुए भी।  कोठी के  दायें  हिस्से की बाउन्ड्री के उस ओर वोकेशनल स्कूल। राजा साहब के महल के सामने के लॉन से लगा घास का मैदान और फिर ऊंची दीवार,पतंग उड़ाने की मुफीद जगह।   गिरे तो  टांग टूटना  या सिर  फूटना तय।  फलांद कर स्कूल में उगीं सब्जियां जब-तब तोड़ीं।  पकड़े गए तो प्रिंसीपल के सामने हाजिर। उस दिन उनके खाने में हमारी तोड़ी सब्जी जरूर होती होंगी। वो दीवार मंदिर तक। उसके बाद ईंटों की बनी नींवों की कतार। वहां राजा साहब कई सारे मकान बनवाना चाहते होंगे, पर बीवी के साथ चल रही कोर्ट की लड़ाई ने कर उनके अरमानों को खाक में मिला दिया।  उस तरफ उसी स्कूल का खेल का मैदान, जहां कोई दीवार नहीं।  सीमा रेखा पर मिट्टी की मुंडेरी, जो हमारे कर्मो से धराशायी हो चुकी थी।  

 सवा तीन कमरों वाले घर में दो टैरेस..सारे कमरों, रसोई, स्टोर के दरवाजों को चूमता बड़ा सा आंगन..ऊपर छत ..सीढ़ी विहीन....दोनों टैरेस दो कमरों से सटे ..बीच में एक बड़ा कमरा।  दाएं साइड वाले टैरेस से कोठी का पूरा नजारा आंखों के सामने। कुएं के सामने से एक रास्ता दायीं ओर जाता हुआ। डेढ़ गज की चौड़ाई वाले कच्चे रास्ते के दोनों और ईंटें लगी हुई और दोनों तरफ कनेर के फूलों की रंग-बिरंगी बहार। शुरुआत होती विशालकाय नीम से।  रास्ता मंदिर तक जाता।  मंदिर के पुजारी और मंदिर के देवी-देवताओं के अगले साढ़े चार साल सुखदायक नहीं रहे। पुजारी पूजा कम करता, खोखियाता ज्यादा  और देवी-देवता मन्नत मांगते नजर आते।  दोनों पक्षों के दुखों का एकमात्र कारण.. मंदिर की दीवार से सटा अमरख का पेड़..ठिगना..गठीला।
कुछ ही दिन बाद नजर आया प्रदीप ।  सेमल के पेड़ के नीचे बैठ कर दोस्ताना हुआ।  खपरैल वाले घर का राघवेन्द यार नम्बर दो।  मोहल्ले की तरफ निकलती सड़क के पार वाले  ईसाई परिवार का दीपक तीसरा यार।  उसके बाद तो यारों की संख्या बारात निकालने लायक हो गयी।  लड़कियों की एंट्री भी खुली रखी।  लेकिन हम सब का साथी..अमरख का पेड़..।

 घर के किसी भी कोने से झांको, इशारे करता नजर आता।  तब दुनिया की कोई ताकत वहां जाने से रोक   नहीं पाती थी।  पिता की बैठक दरवाजे के पास ही, निकलना उनके सामने से ही, जिसमें खतरे ही खतरे। चूंकि महीने के सात दिन उनको ही  सांस के रोगी बेटे को गोद में लिये रहना पड़ता, इसलिये उस पेड़ से  खुन्नस तो होनी ही थी।  दबे पांव नीचे उतरते ही पंख लग जाते और  वहां पहुंच कर ही थमते।  तने के बीच के खोखल में पैर फंसा कर ऊपर की ओर उछलना और दूसरी शाख  पर अपने को टिका लेना।  मिजाजपुरसी के बाद उसकी हर शाख पर  पहले से ही आसन जमाए  गिरगिटान, गिलहरी, टिढ्डों, पतंगों और पक्षियों से मौज-मस्ती।  फिर गिद्ध की आंख तलाशती उस पेड़ के अमृतफल को, जो रोज-रोज की तोड़ा-तोड़ी से अब फुनगी पर ही बचे थे।  तब टहनी हिलाने से लेकर पत्थर चलाने तक..सारे उपाय।  लॉन में जब क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी टूर्नामेंट  किसी कारण बंद पड़े होते तो अमरख का पेड़ हम 10-12 जनों के आमोद-प्रमोद, झगड़े-फसाद  के  लिये  काफी था।  पेड़ क्या, गॉड फादर डॉन वीटो कारलोन था, सारे मर्जों की दवा।  फिर... जाने का समय आ गया...रोते धोते सब संगी साथी,जिसको जाना है जाता है...। लखनऊ से बहुत दूर नहीं..रायबरेली जा कर चंदापुर की कोठी देखने का कई बार मन हुआ, लेकिन बस एक आशंका उधर जाने से रोकती है....हां, बस यही डर कि अगर अमरख का पेड़ न हुआ तो क्या होगा।
   
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मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

एपी सेन रोड




राजीव मित्तल


सर्दियों की वो अंधेरी शाम... चर्र रररररररररर.. जंग खाए लोहे के गेट की आवाज ...सामने लॉन...उसके पीछे पोर्टिको..पोर्टिको के पीछे बरामदा..उधर झांकना भी मत..तुरंत बाएं मुड़ लो....फिर बड़ा सा लॉन....कई पेड़...दीवारें साथ-साथ घूम रहीं....छोटा सा बरामदा...छोटी सी मुंडेरी....एक कमरा...बाबा आदम के जमाने के उस बंगले का ही हिस्सा...लेकिन अलग-थलग..... वो लफंगा इनसान साथ में....कमरे में प्रवेश करते हुए धुकधुकी ....बहुत दिन बाद मिलना हो रहा था.....आवाज खनकी...आइये आइये... एक दांत पर चढ़ा दूसरा दांत चमका.....
यही हैं अरुणा सेनगुप्त....जो लाइन मारने में विश्वास रखते हैं उनके लिये...कुमकुम।

एपी सेन रोड का एक मुहाना चारबाग स्टेशन से अमीनाबाद और दूसरा स्टेशन से हजरतगंज जाने वाली सड़क पर। उसे स्टेशन रोड भी बोलते हैं। इन दोनों मुहानों के बीच की दूरी छह सौ मीटर से थोड़ी ज़्यादा और चौड़ाई इतनी.. कि एक ट्रक निकल जाए। अब तो अक्सर जाम लगा रहता है......तब यह रोड अलसायी सी कुनमुनाती हुई जैसे किसी का इंतजार कर रही हो... इस मुहाने से सिगरेट सुलगायी और खरामा खरामा उस मुहाने तक कश पे कश। दोनों तरफ बंगले....पेड़ों के बीच छुपे से...कुछ दो मंजिला मकान...तीन मंजिला मात्र दो....लेकिन सभी की चहारदीवारी के साथ लगे फूलों के पौधे या आम के पेड़ और तिकोना अर्जुन। देखने लायक रंगत होती मई-जून की दोपहरों में, जब गर्म हवा...दोनों कतारों को लेफ्ट-राइट कराती हुई अपनी खूबसूरती बिखेरने को ललकारती...एक तरफ सुर्ख गुलमोहर तो दूसरी तरफ अमलतास की बासंती बहार...और सड़क पर बिखरी पड़ी लाल-पीली छटा.....स्टेशन रोड वाली तरफ से दाहिनी तरफ कई एकड़ जमीन पर पहला बंगला डॉ. सेन गुप्ता का। सीडीआरआई में जाने माने साइंटिस्ट....

जाड़ों की उस शाम चारबाग के रोशन बाजार में चूंचूं खरहा के माफिक छलांग मारता दिखा.....अफ़िशिअल नेम..मिथलेश चतुर्वेदी...अपन की जिंदगी में ऊदबिलाव की माफिक नामुदार हुआ और बिला गया...अनूप जलोटा का बेहद करीबी...कई सालों से मुम्बई में अभिनयबाजी कर रहा है......अपना कैमरा गुरू भी हुआ करता था .....

आवाज दी...रुकते ही ब्रजभाषा में चौबों वाली गालियां...फिर हरी आंखें सिकोड़ कर दांत चमकाए....तुम साले कुछ कर धर तो रहे नहीं हो....चलो कुमकुम के घर....नाटकों से दिल लगाया जाए। अपना वक्त पीएचडी और प्रोफेसर केके श्रीवास्तव से तौबा बोल मैडम मलिक की याद में गुजर रहा था। एक दम तो घर में घुसने की हिम्मत थी नहीं सो चूंचूं ने किसी दुकान से फोन लगाया...बातचीत से लगा कि मंजूरी मिल गयी है।

अब उसी बंगले के अंदर..उसी कमरे में...खनकती आवाज...अदा के साथ ......आ..प.. भी सृष्टि.. में.. आ..ना.. चाह...............ते हैं! अपन हल्के से डुलडुलाए.....चलिये इसी बात पर आपको कॉफी पिलायी जाए....कल आप आ जाइये...आपको सुधीर जी से मिलवा दूंगी...ये नामाकूल कौन.....चूंचूं ने इशारे से रोका.....कॉफी पी कर खनक से मीठी विदा ली....गेट से बाहर निकल सड़क पर ही चूंचूं का रॉक एंड रोल शुरू.....ये सुधीर साहब कौन हैं? कुमकुम के होने वाले वो और सृष्टि के कर्ताधर्ता....दूरदर्शन में हैं। यूनिवर्सिटी के सामने योगकेन्द्र.....वहीं रिहायश.....

तो जी.... दूसरे दिन से हम रंगमंची हो गए। सुधीर ने पहली प्रस्तुति के लिये उपन्यास तलाशने और फिर उसको रंगमंचीय बनाने का काम अपन को सौंपा....ओहदा...सहायक निदेशक...
उस बैठक में एक और शैदाई...शीतल मुखर्जी...इंटर फेल होने के बाद के इंटर का साथी....तब अपन को बंगाली बनाने में जी जान से जुटा रहता था.....तबाह जीनियस.......चूंचूं से उसकी दुश्मनाई तो कभी दोस्ती....भारी पड़ गयी अपने को....बाद में.....

शरतचंद के चरित्रहीन पर लग कर काम किया...कुछ दिन रिहर्सल भी हुई...अपने को मिला दिवाकर का रोल....खर्चा लेकिन बहुत आ रहा था....तो कोई हल्की-फुलकी चीज तलाशी गयी.....फाइनल हुआ रमेश बक्शी का वामाचार..... मंच पर पहुंचने से पहले ही सृष्टि दमकने लगी थी....बंगला गुलजार होता गया... रोजाना नये-नये चेहरे......नये अंदाज...नयी बातें...नये शिगूफे...किनारे पर ही ढाबा...वहां चाय के साथ बैठकी....शीतल के साथ चरस के दम ....एक सिगरेट के बाद ही दिमाग दौड़ने लगता....वामाचार को फटाफट रंगमंचीय बना दिया......रवीन्द्रालय का मिनी थियेटर चार दिन के लिये बुक.....सबने अपने-अपने टिकट बेच डाले...उन्हीं दिनों उसका लखनऊ आगमन...अपना कारनामा दिखाने को बुलाया लिया ...

चार दिन खूब गहमागहमी के रहे...पांचवे दिन से उजड़े दयार में...कुछ दिन बाद फिर नये स्क्रिप्ट की तैयारी....रात के एक बज जाते...लौटते समय बहुत लम्बा चक्कर लगाने की आदत...शीतल से आर्यनगर में ही विदा ले लेता...वहां एक हवा महल...हवा महल में सोयी राजकुमारी...जिसे कभी पता नहीं चला कि आधी रात कोई एक उसके दरवाजे तक आ कर लौट जाता.....

इस बार चरित्रहीन...फिर सहायक निदेशक...योगकेन्द्र भी जाना शुरू...एक दिन सुधीर बोले...हम तुमको एनएसडी भेज रहे हैं...तैयार हो ना....स्क्रिप्ट के चलते बंगले में कई बार जाना होता...कुमकुम से खूब दोस्ती हो गयी..अपना एक काम और....शीतल और चूंचूं को आपसे में भिड़ने से बचाना...दोनों काफी पहले से कुमकुम के दीवाने थे.....किसी एक ने अपना रकीब मान सुधीर के कान भर दिये......

अब इस गुफ्तगू पर गौर फरमाएं....तुम कुमकुम को क्या मानते हो....अच्छी दोस्त है....मैं सोचता था बहन मानते हो...सुनते ही दिमाग भन्ना गया....वो है मेरे पास...दुनिया भर की लड़कियों को बहन मानने का कोई इरादा नहीं.....दूसरे दिन से जाना बंद ...कई बार बुलावा आया...पर नहीं गया....नहीं गया तो एनएसडी भी गया तेल लेने.....इसी सृष्टि से बाद में अनुपम खेर जुड़े...साइकिल पर यहां-वहां डोला किये...शीतल ने उन्हें रोक कर मिलवाया...उन्होंने मर्चेंट ऑफ़ वेनिस का मंचन किया...अब दर्शक की भूमिका में..साथ में नीना भी थी....

और अब...बस यह पता है कि दो मुम्बई में...दो इस दुनिया से जा चुके....बाकी...उस ग्रुप के 20 और जनों की कोई जानकारी नहीं.....लखनऊ जाने पर एक बार वहां से जरूर गुजरना...बंगले पर निगाह जरूर डालनी...वहां अब कोई आवाज नहीं....गुलमोहर और अमलतास की कतारें साफ कर दी गयी हैं.... एपीसेन रोड...जहां कई झुलसाती हवाओं को छू कर मस्ती छायी है अपने पर...अब उस मुहाने से इस मुहाने तक आते-आते उदासी दसियों गुना बढ़ जाती है. क्या खोया क्या पाया के चक्कर में पड़ने से बचने को उस पर बंद कर दिया है पैदल चलना.....

भारतीय संसद यानि गरीब की जोरू


क्या करेंगे संसद भवन या उसकी गतिविधियाँ

देख कर, सांसदों को दस-पंद्रह रुपये में

मिलने वाला भोजन ज़्यादा मोहक है

राजीव मित्तल

लोकतंत्र की बिसात जिन चार पायों पर टिकी है, उनमें विधायिका भी है, लेकिन हमारे देश की राजनीति ने इसे गरीब की जोरू यानि उस भाभी जैसा हाल कर दिया है, जिसकी हमेशा बेक़द्री ही की जाती है । अब तो इस बात को याद करने में याद्दाश्त भी धोखा देने लगी है कि कभी हमारी संसद में ऊंचे दरजे की बहस हुआ करती थीं...कि संसद की लायब्रेरी में बैठ कर हमारे सांसद अपनी बात रखने को नोट्स बनाने में मशगूल रहते थे या हमारे प्रधानमंत्री विपक्ष के सवालों के जवाब रात रात भर उस विशाल लायब्रेरी की रैकों में सजी किताबों में तलाशते थे। नेहरू युग के बाद से ही मतदाता का काम केवल वोट डालना रह गया है, जीतने वाला शपथ ग्रहण करते ही कोटे का घर, घर की सजावट , टेलिफोन, विमान यात्राओं के टिकट, नौकर-चाकर, अपने क्षेत्र से चमचों की भर्ती और मीडिया में रसूख बनाने में जुट जाता है। उसको संसद भेजा क्यों गया, इसे वो अपनी जोड़-तोड़ की करामात मानता है, अपनी पूजा-पाठ की कृपा मानता है या उस क्षेत्र में अपनी जाति के मतदाताओं का आभार मानता है । अधिकाँश सांसदों ने संसद का अर्थ अपनी हनक दिखाने, अपार सुविधाएं उठाने, कैंटीन में बैठ बहुत कम पैसों में बहुत पौष्टिक खाद्य पदार्थ जीमने और अपने नेता का इशारा मिलते ही संसद को चौराहा बना देने तक सीमित रखा है।

संसद तो रोम की भी होती थी, जहां जूलियस सीजर की हत्या हुई, और संसद कोपेनहेगन की भी होती थी, जहां डेनमार्क की गुलामी झेल रहे आइसलैंड के नाविक डेनिश संसद में आजादी की चाह लिये जब-तब आ जाते और दिन-रात न खत्म होने वाली कविताएं पढ़ते। आखिर में डेनमार्क के सामने कोई चारा नहीं रहा आइसलैंड को सिवाय आजाद करने के। हमारी संसद का इन दोनों बातों से कोई तालमेल नहीं...लेकिन हमें तय तो करना ही पड़ेगा कि कब तक हम लोकतंत्र के इस तीसरे पाये से मजाक करते रहेंगे।

अब हमारी संसद सत्ता-पक्ष और विपक्ष द्वारा अपनी हनक दिखाने का अखाड़ा बन कर रह गयी है, जहां कई सारे पहलवान एक-दूसरे को ललकारते रहते हैं। संसद होती है अपनी बात रखने के लिये, जब बात न मानी जाए तो बहस करने के लिये....वही बहस अब चील-कौवों के बीच मांस के लोथड़े को लेकर छीना-झपटी का रूप ले चुकी है। और जब उससे मन उकता जाए तो बहिष्कार विपक्ष का प्रिय शगल बन गया है तो सत्ता पक्ष का काम..जाव-जाव बहुत देखे हैं तुम्हारे जैसे...टाइप का। संसद के स्तर को इतना नीचे गिरा देने का ही नतीजा है कि हमारी कई संवैधानिक संस्थाएं इस गरीब देश के नागरिकों की जेब पर भार बन कर रह गयी हैं।

आंकड़ों के जरिये हम अपनी पीठ तो ठोक लेते हैं कि हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं या हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी औद्योगिक शक्ति हैं या हम तीसरी-चौथी-पांचवी सबसे बड़ी ये ताकत वो ताकत हैं.....लेकिन हम यह नहीं देख रहे कि हम इन विशेषताओं पर अमल किस अंदाज में कर रहे हैं या हम कितना सकारात्मक लाभ उठा रहे हैं......या ये विशेषताएं हमें कोई गर्व या कोई ऊर्जा प्रदान कर भी रही हैं या नहीं। और अब तो यह सोचने की नौबत आती जा रही है कि क्या हम लोकतंत्र के लायक हैं भी कि नहीं।

बा मुलाहिजा होशियार




दिन गुनगुनाए

रात गाए

लेन-देन का सिलसिला न हो

खोना-पाना दूब की तरह हो

तुमने सच कहा

तो वक्त क्या कर लेगा

तुम रोज उसकी

आंखों में धूल झोंकती रहो

जो मेरे चारों ओर

बिखरी पड़ी है

वक्त के पास कोई चारा नहीं

लुटे-पिटे

आगे बढ़ते रहने के सिवा

उसके हाथ में

कुछ बचा नहीं

कोई बचाव नहीं

तुम्हारे हाथों की उड़ती धूल से

मैं ठगा सा खड़ा

देख रहा हूं

तुम्हारी जीत को

वक्त को हारते

हार तो मैं भी गया

तुमसे

सच कहूं तो

शेल्फ

सखि की कविता

कब से तलाश थी

उन सबकी

लेकिन कोई पहचान बन पाती

पता नहीं कहां गुम हो गयीं सब की सब

न नाम.. न पता... न चेहरा

कुछ याद नहीं

याद थी तो बस एक शक्ल

बस.. वही मुझ से

पूछती...कहां हैं वो सब

मैं कहां तलाशूं

कैसे तलाशूं

बेचैनी में गुजरते दिन रात

सब कुछ अधूरा सा

उस दोपहर

उन तक पहुंचने को

पढ़ डाले सारे नाम

देख डाले

पता नहीं कौन कौन से चेहरे

मन में ये आस भी

मैं नहीं तो उनमें से

शायद कोई मुझे पहचान ले

छटपटाहट बढ़ती जा रही

तभी..नजरें मिलीं

तो ऐसे

जैसे

इस इंतजार में बैठी हों

कि कब मेरी अंगुलियां उनको छुएं

और कब सब

मेरी गोद में

दुबक कर

सुबकियां भरें

रविवार, 4 दिसंबर 2011

अपनी छवि से जुनून की हद तक जुड़ा इनसान




राजीव मित्तल

कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके न होने की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद ये मुकाम देवानन्द ने ही पाया। ...इसे हम बटवृक्ष वाली खसूसियत भी कह सकते हैं, कि हम उस पेड़ की जगह पर कोई आलीशान बिल्डिंग भी बर्दाश्त न कर पाएं। सदाबहार यही दो शख्स निकले, जिन्होंने अपना जमाना क्रिएट किया। भले ही 86 या 87 साल के हो गए देवानन्द पिछले करीब 30 साल से दर्शक रहित फिल्में बना रहे थे...या वो गले में लिपटे अपने स्कार्फ से...ब्राउन जैकेट से...रंग-बिरंगी कैप से....तिरछी चाल से....या अपनी साठ-सत्तर के दशक वाली इमेज से पीछा छुड़ाने के मूड में कतई नहीं थे......लेकिन उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह अपनी पुरानी सफलताओं की याद में खोए जाम छलकाते हुए आहें नहीं भर रहे थे...न ही भगवान दादा और सी रामचन्द्र की तरह बेचारे कहला रहे थे.....न ही देवानन्द अपने समय की मशहूर तिकड़ी से जुड़े राजकपूर की तरह समय से पहले चले गए और न ही दिलीप कुमार की तरह बरसों की गुमनामी में जाने को मजबूर हुए। देवानन्द कल तक हर उस जगह मौजूद थे...जहां नयी पीढ़ी का दबदबा कायम हो चुका था....उन्होंने रिटायर्ड हर्ट के रूप में क्रीज नहीं छोड़ी।

कई साल पहले लोकसभा चुनाव की रिपोर्टिंग के सिलसिले में होशियारपुर जाना हुआ...वहां से निकले तो और जगह होते हुए वापस चंड़ीगढ़....रास्ते में हम गुरदासपुर से भी गुजरे थे....देवानंद को जन्म देने वाला स्थान...तब भी उनकी फिल्में एक के बाद एक पिटती जा रही थीं...लेकिन देवानन्द बहुत याद आ रहे थे...यादों में चेतन आनन्द और विजयआनन्द भी छाए थे। अपने इन्हीं दोनों भाइयों की बदौलत देवानन्द ने समय को झकझोर देने वाला दर्जा हासिल किया था...चेतन आनन्द ने उनके लिये जगह बनाई तो विजय आनन्द ने फिल्म -गाइड- में देवानन्द को उनकी इमेज से बाहर निकाल कर अभिनय के चरम पर पहुंचा दिया। देवानन्द को शुरुआत में ही गुरुदत्त का साथ मिल गया, जो देव के अभिनय की हर नस और उसकी रेंज से वाकिफ थे.....उनकी निर्देशित दो फिल्मों -बाजी- और -जाल- ने ही देवानन्द को उनकी पहचान दी।

देवानन्द की फिल्मों को जब तक अपने इन दोनों भाइयों का निर्देशन मिला, वह हिन्दी फिल्मों की धुरी बने रहे....याद कीजिये... जब राजकपूर की राजपथ से हो कर आयी भारी भरकम फिल्म -मेरा नाम जोकर- हताशा को पहुंच चुकी थी, न जाने किस रास्ते से आयी -जॉनी मेरा नाम- की धमक चारों तरफ सुनायी दे रही थी...यह विजय आनन्द का कमाल था। अपनी फिल्मों का निर्देशन खुद करने के फैसले ने देवानन्द को न केवल समय से पहले दर्शकों के मन से उतार दिया, बल्कि देव को पर्दे पर देखने की उत्सुक्ता ही खत्म कर दी....उसके बाद से देव 14 रील बरबाद करने वाले से ज्यादा कुछ नहीं रह गये थे...लेकिन फ़िल्में बनाने का जुनून जारी था । देवानन्द अपनी जिद में निर्देशक बन तो गए, पर निर्देशक के रूप में वह अपनी सीमाएं तय नहीं कर पाए....न पटकथा को लेकर....न अभिनय को लेकर...न डायलॉग डिलिवरी को लेकर.... तभी तो वह -देस परदेस- के बाद डिब्बा बंद फिल्मकार बन कर रह गये।

लेकिन सच यह भी है कि 1955 से लेकर 1970 के समय का एक बड़ा हिस्सा देवानन्द के खाते में जाएगा। उसमें ढेर सारा समय था नेहरू जी का, उनके समाजवादी आदर्शवाद का, जिस पर सबसे ज्यादा फिदा थे राजकपूर। उनकी उस समय की कई फिल्में समाजवाद की चाशनी में डूबी हुई हैं। उस तिकड़ी की ही एक और धुरी दिलीप कुमार तब अपने अभिनय से हर ऐरे-गैरे को देवदास बनाने पर तुले हुए थे...तब रोमांस का बेहद दिलकश रूप पेश कर रहे थे देवानन्द.....अपने इस अंदाज के जरिये देवानन्द का अपने चाहने वालों को यही संदेश था कि जीवन में कुछ भी जीवन में घट रहा हो.. प्रेम को मत भूलना क्योंकि प्रेम बहुत बड़ी राहत है...वह कैसी भी जीवन शैली का केन्द्र बिन्दु है। इनसान को संवेदनशील बनाने का एकमात्र जरिया...

उनकी फिल्में दर्शक को कितना सुकून देती थीं...कितनी उमंग भरती थीं...इसको समझा पाना बेहद मुश्किल है। बहुत मामूली हैसियत वाला आवारा युवक कैसे एसडी बर्मन के संगीत से, अपनी अलमस्त अदाओं से, हर हाल में बेफिक्र बने रहने के अंदाज से, लापरवाह दिखने वाली लेकिन बेहद रोमांटिक शख्सियत से...वहीदा रहमान..साधना...कल्पना कार्तिक या नूतन की शोखियों और जॉनीवाकर की हल्की-फुल्की कॉमेडी से दर्शकों को पागल बनाता था, इसको जानने के लिये उनकी उस समय की कई सारी फिल्में देखना लाजिमी है। तभी तो हाईस्कूल के इम्तिहान में आखिरी पर्चा भी खराब जाने के बाद सीधे उस पिक्चर हॉल में घुसा, जिसमें -मुनीम जी- चल रही थी.... और जीवन का सफर कुछ समय के लिये आसान हो गया.......

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

रथ यात्रा की धृंगा धृंगा धिधिन्ना तिन्ना




राजीव मित्तल

फणीश्वरनाथ रेणु बताये रहिन के विदापत नाच में कुल जमा पांच ठो लोग....एक मूलगैन यानि म्यूजिक डायरेक्टर...जिसके पास दो वाद्ययंत्र...मृदंग और मंजीरा.....दो नचइये...और एक बिकटा और एक नायक। .......बिकटा मतलब विदूषक... नाचने वाली ( जो मर्द ही होता है) के पहनने को लाल सालू की घांघरी और पीतल-कांसे के गहने। चेहरे पे कालिख पोतकर...घुटने तक तंग पतलून और हाथ में थुथनीदार छड़....बिकटा के रोल में काने..कुबड़े जैसों को प्राथमिकता।

धृंग-धा..धृंग-धा तिन्ना...मृदंग के ताल निकालते ही मंजीरा बोलता है..... कुन कुन कुन कुन कुन कुन
गननायकं फलदायकं पंडितम् पतितम्....नायक जी के बोल शुरू....
धृंगा धृंगा धृंगा किनका किनका...धिरिंनांगि धिरिनांगि धिरिंनांगि किनका किनका किनका
अब ओय ओय कर रहे बिकटा महोदय की बारी.......

बाप रे कौन दुगर्ति नहीं बोल सात साल हम सूद चुकाओल तबहुं उरिन नहीं बोलौं कोल्हुक बरद सन खटलां रात दिन करज बाढ़ हि गेल थारी बेंच पटवारी के देलियेन्ह लोटा बेंच चोकीदारी बकरी बेंच सिपाही के देलियेन्ह फटकनाथ गिरधारी


विदापत नाच के बीच उनकी रथयात्रा का ऐलान किया गया.....नाच देख रही नटी परेशान कि रथयात्रा तो भुवनेश्वर में भगवान जगन्नाथ की निकाली जाती है...ये ससुरी कौन सी रथयात्रा है। बीच में ही छोड़ घर में घुसी तो नट प्रकट भये .....अरी जल्दी से खाना दे.....नहीं...पहले हमको ये बताओ कि रथयात्रा कौन से देवता की है ...हम भी जाएंगे दर्शन को...अरी अकल है कि सिलबट्टा...ये उनकी रथयात्रा है....जिनकी बवासीर जोर मारती है तो निकल पड़ते हैं.....और अब तो ऐसी यात्राओं की भरमार हो गयी है।

तभी टीवी पर गरुणध्वज रथ पर शैव्य..सुग्रीव..मेघपुष्प और बलवाहक की रास थामे रथयात्री का बहुते लाइव साक्षात्कार.....

>>वो मेरे सामने>> प्रोग्राम में आपका स्वागत है। अब तक की आपकी यात्रा कैसी रही...चड्ढा जी ने दांत निपोरते हुए मनोहारी सवाल पूछा। क्या कहूं..मजा नहीं आ रहा.....हथेलियां रगड़ते हुए जवाब..... खीर बनने से पहले ही दूध फट गया हो जैसे। चड्ढा जी निपोरू ही बने हुए थे....वो कैसे....?
महाभारतकाल में पुंड्र देश का राजा पौंड्रक अपने को श्रीकृष्ण समझने लगा था और नाम भी वासुदेव रख लिया था.....मोरपंखी भी सजाता था....ऐसे ही हमारी ही पार्टी के एक नेता भी कर रहे हैं। नाम नहीं लूंगा आप समझ गये होंगे।

आप दर्शकों को पिछली रथ यात्रा के बारे में कुछ बताना चाहेंगे? ........तब हम सत्ता में थे... मेरी वो यात्रा विवेकानंद के विचारों से प्रेरित थी। हुएनसांग...फाह्यान से भी काफी प्रेरणा मिली। वास्कोडिगामा के तो क्या कहने। लेकिन रथयात्री जी....वो तो लुच्चा था...हल्दी-जीरे और कालीमिर्च के लिये आया था। चारों अश्व तुरंत हिनहिनाए।

चड्ढा जी ने खींसें काढ़ीं और सवाल बदला....आप हमेशा सड़क मार्ग ही क्यों पसंद करते हैं। मैं जनता से दूर नहीं रह पाता और गांधी के देश में सड़कबाजों की संख्या बहुत है। उन्हें देख कर मेरे मन में अनेक विचार उठते हैं। मुझे देख कर जनता क्या सोचती है..यह जानना बड़ा एक्साइटिंग है मेरे लिये।

सत्ता से बाहर हुए आपको कई साल हो गये...अब आपको कैसा लगता है? ....जो रहे देता-लेता वही नेता.....हमारे लिये गुलाबों की माला क्या सड़े अंडों की बौछार क्या। सब सहज स्वीकार्य है। आप घोड़ों के रथ पर कैसे इतनी लम्बी यात्रा कर रहे हैं....? नहीं..नहीं मैं तो अश्व शक्ति वाले वाहन पर हूं..ये रथ और अश्व ट्रक पर साथ-साथ चलते हैं। मेरी यात्रा उन रास्तों से हो कर हैं जहां जहां भगवान श्रीकृष्ण अपने गरुड़ रथ पर गए थे....जैसे पुंड्र देश... रुक्मणि का नैहर कौंडिन्यपुर... जरासंध का गिरिव्रज.... पांचाली का विराट....अवंति का संदीपनी आश्रम...कामरूप-कमेच्छा...घोरअंगिरस का प्रयाग आश्रम....द्वारका, मथुरा, वृंदावन वगैरह...वही मार्ग, वही अश्व और वही सारथि दारुक....सब कुछ वही रखा है मैंने।

अब तक पूरी तरह भन्ना चुकी नटी फट पड़ी......देख लो इनको....गंगा सड़ी जा रही है, सीता मैया की जन्मस्थली गंदगी का ढेर बन चुकी है.......और इन्हें रुक्मि भौजी का नैहर सूझ रहा है..ऊद का घस्सा.......उसकी बड़बड़ जारी थी...नट हुक्का बना खड़ा था...चैनल से रथयात्री जा चुका था....विदापत नाच जारी थी....
डिमिक डिमिक डिमिक डिम डिमिक डिमिक कि आहो रामा, नैहर में अगिया लगायब रे

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

साहेब की कविता





राजीव मित्तल

एक सरकारी दफ्तर जैसा कुछ....ऐंडी-बेंडी कुर्सियां....तीन टांग की मेजें....फटहे पोंछा जैसा कालीन...यहां-वहां पड़े हत्था टूटे प्याले, जिनके पेंदे की बची चाय में कुछ मक्खियां गोता लगा कर शीर्षासन कर रहीं तो कुछ चटखारे ले कर भन भना रहीं। हॉलनुमा दड़बे में एक और दड़बा, जहां साहब बैठते हैं। शायद बैठे भी हैं...क्योंकि स्टूल पर बैठा चपरासी बीड़ी नहीं पी रहा, खैनी दबाये ओंघा रहा है। साढ़े चार कुर्सियों पर पांच मर्द बैठे हीहीहीही कर रह रहे, सामने फाइलों का अम्बार..... जिनमें से सड़े अचार की खुश्बू आ रही है। पीए टाइप युवती टाइपराइटर पर उंगलिया चलाते जिमिकंद का हलवा बनाने की विधि सोच रही । उम्रदराज महिला स्वेटर बिनते हुए पति की बाहर निकलती तोंद पर कुढ़ रही । तीसरी.... मां आनन्दमयी की मुद्रा में। अचानक साहब ने दरवाजा खोल बाहर झांका, स्टूलिये ने लुढ़कने से बचते हुए मुंह में भरी सुरती गटक ली। माहौल अंटेशन की मुद्रा में..........आगे..........

साहब.....आप सबका काम खत्म हो गया तो शुरू किया जाए आज का कार्यक्रम
सबके मुंह से एक स्वर में हेंहेंहेंहेंहें ......पति की तोंद को किनारे कर वो बोलीं..सर, पिछली बार आपने जो कविता सुनायी थी न.....
भटकटैया के पेड़ पर वो फुदक रही थी
मैं हवा में गोते खा रहा था....
............................................
...........................................
और सर... आखिर में ....
.........राधे राधे किशन किशन ....
तो कमाल का था... यही गुनगुना रही थी अभी ...


मामला हाथ से निकलता देख टाइपराइटर पर धरे हाथ ने जुम्बिश ली......कुछ कुछ कोयल जैसी बोली....सर...
आज तो आपको फिर वही कविता सुनानी पड़ेगी...प्लीज सर...

हिन्दु मुस्लिम सिख ईसाई
आपस में हैं भाई भाई

सर, इस दीवाली पर मढ़वा कर ड्राइंगरूम में टंगवाई है पापा ने....


साहब की आवाज में खुरदुरापन काफी नीचे आ चुका था.....आज तो आप सब की तरफ से कुछ होना चाहिये था....
चलिये.... जब आप इतना जोर दे रही हैं तो.........!!!!
यह कविता मैंने 26 जनवरी पर होने वाले अखिल भारतीय कवि सम्मेलन के लिये लिखी है, पहले आप सब सुनें......उन्होंने चमड़े के ब्रीफकेस से चमड़े की जिल्द वाली डायरी निकाली.....ऊन के गोले झोले में ठूंसती वो बोलीं.....सर प्लीज...एक मिनट....कागज-पेन निकाल लूं .....
सभी मर्द पहले ही टाइपराटर वाली से थोड़ा परे हट कर आसन जमा चुके थे.....

यह कविता मैंने लालकृष्ण आडवाणी, अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को ध्यान में रख कर लिखी है। हमारे मुख्य सचिव को बहुत पसंद आयी है। शायद इस बार कोई केंद्रीय पुरस्कार मिल जाए। हां तो सुनें......

काला धन काला धन
विदेशों में जमा काला धन
काला धन काला धन
लेकिन..................
हम धन को काला क्यों कहें
हम क्यों कहें काला धन
काला होता है मानुष मन
मानुष मन मानुष मन
फिर क्यों मच रहा शोर
क्यों धन को काला करने पे जोर
जब आएगा कभी हमारे पास
शुभ्र सफेद चीनी के दानों की माफिक
मीठा कर देगा हमारा तन मन
काला धन काला धन


कमाल है सर-कमाल कर दिया सर-तारीफ के लिये शब्द नहीं मिल रहे हैं सर.....स्वेटर वाली का रुमाल आंख पर था...
तभी रुंधे गले से पीए ने कहा....सर..मेरे लिये तो यह राष्ट्रगान से कम नहीं..सर..प्लीज...आप तो मुझे अपनी डायरी दे दीजिये...मैं आपकी सारी कविताएं फेसबुक पर डालूंगी।
साहब जी लसलसाए...हां हां क्यों नहीं...लेकिन 26 जनवरी के बाद...

साहब ने घंटी मार कर चपरासी को बुलाया...रामखेलावन के यहां से समोसे ले आओ....चाय सामने बोलते जाना.....चपरासी दरवाजे तक पहुंचा ही था कि स्वेटर वाली बोली...वो चीनी कम डालता है....आज मीठी बनाए.....अब तक पूरी तरह बौरा चुका छोटेलाल बुड़बुड़ाया...घुइंयां बनवाऊंगा मीठी चाय...ससुरों को पता नी क्या हो जाता है महीने के आखिरी दिन....

रविवार, 23 अक्तूबर 2011

तमसो मा ज्योतिर्गमय पर हावी हैप्पी दीवाली




राजीव मित्तल

निर्मल वर्मा ने बहुत पहले लिखा था कि भारत में धन का प्रदर्शन अश्लीलता की हद पार कर गया है। निर्मल वर्मा ने यह तब लिखा था, जब देश में समाजवादी व्यवस्था गहरे तक धंसी हुई थी। आज जबकि हर खुशी हर ग़म बाटा के शो केस में सजे जूतों की तरह माल बन कर रह गए हों, तो पैसे का प्रदर्शन अश्लील ही नहीं, फूहड़ता की हदें पार करता हुआ गलीजता को छूने लगा है। वह चाहे किसी धनपशु के नाती या पोते का जसूठन हो या बिटिया की शादी या बेटे की घुड़चढ़ी! या बॉलीवुड की फिल्में हों-जिनमें शरतचंद के देवदास को लंदन में पढ़ाया जाता है, कलकत्ता में नहीं। उसके गांव का घर एक जमींदार की हवेली नहीं, फ्रांस के लुई चौदहवें का पैलेस और चंद्रमुखी का कोठा साम्राज्ञी नूरजहां का महल लगता है। तो सामाजिक-धार्मिक उत्सवों का हाल यह है कि दुर्गापूजा के अवसर पर घरों में लगाए गए पंडाल पूरे आस-पड़ौस की रातों की नींद हराम करते हैं क्योंकि उनमें घटिया फिल्मों के घटिया गानों की धुनों पर और ज्यादा घटिया किस्म के भक्ति के गाने बजते नहीं बल्कि चिंघाड़ते हैं।

इसी तरह दीवाली अब जगमगाती नहीं, कोई रौनक नहीं लाती, कोई पवित्र भाव मन में नहीं लाती बल्कि कान के परदे फाड़ती है। सड़क पर दगने को बिछी दो सौ-चार सौ मीटर या जेब में धरी रुपयों की गड्डियां कम करने की कुव्वत दिखाने और लिम्का रिकार्ड बुक में नाम दर्ज कराने को चाहे जितने किलोमीटर लम्बी पटाखों की लड़ी हर धड़कते दिल को आतंकित करती है, त्योहार या उत्सव का आनंद नहीं देती। देवदास फंस गया है बॉलीवुड के ग्लैमर में, तो 14 वर्ष का वनवास काट कर अयोध्या लौटे श्री राम के आने की खुशी में घर-घर मनती दीपावली शोर-शराबे, प्रदूषण और पैसे के घनघोर प्रदर्शन की कीचड़ में समा चुकी है।

अब कहां है वो चरखी, जो आंगन में नाचती हुई रोशनी बिखेरती थी, कहां है वो सीटी, जो आवाज करती हुई ऊपर जाती थी और कहां है वो फूलझड़ी, जिसे हाथ में लेकर जलाया जाता था, जिसके प्रकाश में खिलखिलाते चेहरे और दमकते थे। कहां है वो मिट्टी के खिलौने, जो बच्चों के मन को भाते थे, कहां है वो शक्कर के खिलौने और खील-लाई, जो दसियों दिन मुंह को मीठा किये रहते थे और कहां है घर-घर की चारदीवारी की मुंडेरों पर जलते दीयों की वो कतार, जो किसी के आने का भीना-भीना संकेत देती हुई पुकारती थी-तमसो मा ज्योतिर्गमय। हर घर में संवलाती शाम को दीये जल उठते थे, और तमसो मा ज्योतिर्गमय का आह्वान शुरू हो जाता था। अब तो हर किसी का मोबाइल टुनटुनाने लगता है, जिसमें से आवाज निकलती है-हैप्पी दीवाली। यार, अबकी किसके यहां फड़ लगेगी? दारू और मुर्गा तो होगा न! मैडम टिम्सी को जरूर बुलवाना यार-अच्छा, अगेन हैप्पी दीवाली-सी यू।

यह हैप्पी दीवाली का वो ज़माना है, जिसमें पाकिस्तान की मुख्तारन माई को बलात्कारी रौंदते हैं और उसे यह पुरुष प्रधान समाज बहिष्कृत तो करता ही है, और कभी उस देश के सर्वेसर्वा रहे मियां मुशर्रफ अमेरिका पत्रकारों के सवालों से झल्ला कर फरमाते हैं-पश्चिमी देशों में बसने के लिये पाकिस्तान की औरतें अक्सर इसी तरह के हथकंडे अपनाती हैं। तो यह सुन किसी का गला नहीं रुंधता, किसी का दिल नहीं कांपता बल्कि उस बलात्कार पीड़िता को ‘ग्लैमर वूमन ऑफ द ईयर’ के सम्मान और पुरस्कार से नवाजा जाता है। कोई बता सकता है कि मुख्तारन माई से हुए बलात्कार में कौन सा ग्लैमर उस अमेरिकी पत्रिका को नजर आया? अगर मरदों के समाज से भिड़ने की हिम्मत ग्लैमर है तो फिर श्री राम का रावण को मार उसकी कैद से सीता को निकालना और फिर सीता का अपनी शुद्धता साबित करने के लिए अग्निपरीक्षा देना तो अपने आप ही बॉलीवुडी-हॉलीवुडी ग्लैमर का सबब बन जाता है। तो श्री राम जी! हैप्पी दीवाली। चॉकलेट खाएंगे? भाभी जी को ज़रूर साथ लाइयेगा..

अब ऐसी ही एक हैप्पी दीवाली का दहशत भरा अनुभव! कुछ साल पहले देश की राजधानी की उस रात की याद कर अब भी रूह फना हो जाती है। कोई हादसे वाली रात नहीं थी वो, दीवाली की रात थी। बी आई टी वी में सुबह का बुलेटिन निकालने की ड्यूटी थी। आधी रात बीत चुकी थी। कुछ सहयोगियों ने कहीं चल कर चाय पीने का प्रस्ताव रखा। सब ऑफिस की गाड़ी से लद चाय तलाशने दक्षिण दिल्ली की तरफ चले। एकाध किलोमीटर चलने के बाद ही दम घुटने की नौबत आ गयी। आसमान से लेकर जमीन तक धुएं का काला परदा टंगा था, किसी एक जगह नहीं, जहां तक निगाह जा सकती है वहां तक..... और हवा में भरी थी बारूद की गंध। रास्ते के किनारों और सड़क के बीचोबीच कुत्तों के मुर्दा शरीर यहां-वहां बिखरे हुए थे। हो सकता है उनमें कोई भिखारी भी रहा हो। पूरा दिल्ली शहर गैस चैम्बर बना हुआ था। सड़कों पर या तो फुल वोल्यूम में म्यूजिक बजाते नशे में धुत अमीरजादों की आलीशान कारें दौड़ रही थीं या खांसते-कूंखते ठेले वाले, जो दिन में उस इलाके में पैर भी नहीं रख सकते। तो, अब दीपावली भी पैसे वाले शोहदों की जेब में फंस कर रह गयी है, जहां तमसो मा ज्योतिर्गमय के लिए कोई जगह नहीं है। एडवांस में हैप्पी-वेरी हैप्पी दीवाली।

सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

हबीब आवाज़




राजीव मित्तल

यही दिन थे। हवा में खुनकी आ चुकी थी। हिमाचल की पहाड़ियां बिल्कुल आंखों के सामने, इसलिये कुछ ज्यादा ही ठंडक। जनसत्ता में चंड़ीगढ़ की वह शाम, हमेशा की तरह । थानवी जी संपादकीय हॉल में आए। हाथ में रविवार का अंक। अजय श्रीवास्तव से बोले....इसमें हेमंत कुमार पर शिरीष कार्णितकर (ऐसा ही कुछ नाम था) ने लिखा है आप आइडिया ले कर लिख दें...हेमंत दा नहीं रहे। इतना कह कर चले गए। अब हाथ-पांव फूलने की बारी अजय की थी....‘मैं (खाकी निक्करधारी) संगीत के बारे में कुछ जानता-वानता नहीं...आप ही लिख सकते हैं।’ मैंने रविवार को एक तरफ फेंका और लिखना शुरू कर दिया। लिखते समय कई बार आंखें भर आयीं....उनके सूखने-सुखाने का इंतजाम कर फिर पेन चलाने लगता। आज 22 साल बाद वही स्थिति है। अहसास कुछ ज्यादा ही गहरा ... संचार क्रांति ने सब कुछ इस कदर जोड़ दिया है कि अगर हेमंत दा दुनिया से गए थे, लगता है कि जगजीत सिंह बेवक्त महफिल से उठे हैं। हेमंत दा को तो केवल गुनगुनाया ही जा सका, लेकिन जगजीत सिंह से तो याराना सा था बरसों से।

80 के दशक के अंत में पहली बार जगजीत को सुना तो आवाज़ में बेहद अपनापन। अपने ही किसी आत्मीय के घर में बैठकर घंटों उनका पहला एलपी सुनता रहा। जब दोनों तरफ खत्म हो जाए तो सन्नाटा बर्दाश्त नहीं होता था, फिर वही आवाज़ सुनने को तबियत मचल उठती। न जाने कितनी बार सुना। रिकार्ड खराब करना है क्या....यह उलाहना भी सुना। उलाहनों की आदत लग चुकी थी क्योंकि उस घर में कई रिकॉर्ड एक के बाद एक पचास बार सुन घिस चुका था।

साल गुजरते गए...जगजीत की आवाज झंडे गाड़ ही चुकी थी। फिर उन्हीं आत्मीय के यहां जाना हुआ। इस बार रात गहरा चुकी थी। सब सो गए थे। नये घर के शानदार ड्राइंगरूम में रखे म्यूजिक सिस्टम पर अपनी नजर पड़ चुकी थी। किसी को जगा कर उसे प्ले करने की सारी जानकारी लेकर बैठ गया। यह भी सूँघ लिया था कि कई सारे कैसेट वहीं किसी खोह में धूल खा रहे जूतों के डिब्बों में पड़े हैं । उनमें कई जगजीत के भी । सुबह पांच बजे तक सुनने के बाद अपने बैग में वो सब कैसेट भरे और नींद में गाफ़िलों को राम-राम बोल कर निकल लिया।
वह जमाना कानपुर का था। जब कम्पनी बाग में संजय ने शानदार छत पर कमरा दिखाया तो फौरन उसको उकसा कर गाने सुनने का इंतज़ाम किया । जो कैसेट खरीदे गए उनमें जगजीत के चार कैसेटों वाला एल्बम भी था। एचएमवी वालों ने निकाला था। इसके अलावा दसियों कैसेट जूतों के डिब्बे से निकाले हुए।

जगजीत ने बहुत साथ दिया कई वीरानियों में। कानपुर के बाद दिल्ली, फिर मुजफ्फरपुर...जबलपुर। नेशनल का म्यूजिक सिस्टम और डेढ़ सो कैसेट से भरा बैग हमेशा साथ चलते।

जगजीत के पास गजल गायिकी की शानदार आवाज ही नहीं थी, गज़लों का उनका चुनाव और उनकी अदायगी ने उन्हें जन-जन दिलों में समा दिया। संगीत की यह विधा कुल मिलाकर महफिलों तक ही सिमटी पड़ी थी, जिसे मुक्त हवा जगजीत ने ही दिखायी। तलत महमूद की रेशमी आवाज फिल्मों तक ही सीमित रही। बेगम अख्तर , हबीब वली मुहम्मद और मेहंदी हसन धनाड्य शौकीनों के ही गायक बने हुए थे, लेकिन ग़ालिब से लेकर हर छोटे-बड़े शायर को हर किसी की जुबान पर जगजीत ने ही चढ़ाया। उन्होंने अपनी अदायगी में जिन वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया, वह एक तरह की बग़ावत थी संगीत शास्त्र से। लेकिन उनकी इसी बग़ावत के चलते गालिब की शायरी सवा सौ साल बाद फिज़ाओं में फिर नया रंग घोल रही थी। निदां फाजली...कतील शिफाई....बदीर बद्र जैसे न जाने कितने शायर हर दिल अजीज़ बन चुके थे।

जिंदगी तेरी अता है तो ये जाने वाला
तेरी बख्शीश तेरी दहलीज पे धर जाएगा

रविवार, 9 अक्तूबर 2011

जय जवान जय किसान



राजीव मित्तल

दो अक्तूबर को लालबहादुर शास्त्री का भी जन्मदिवस है। लेकिन दिल से या बेदिल से याद महात्मा गांधी ही किये जाते हैं। जेल से ले कर चैनलों पर या स्कूल-कॉलेजों में या चौराहों पर लगी उनकी प्रतिमा की साज-सफाई कर सालाना जापकर्म जैसे-तैसे निपटा ही लिया जाता है। जहां तक शास्त्री जी का सवाल है, हिन्दी के कुछ अखबारों में गांधी जी का फोटो अगर पहले पेज पर, तो शास्त्री जी को कहीं अंदर औपचारिक रूप से टांक दिया जाता है। खैर, शास्त्री जी का महत्व इसलिये नहीं था कि वे देश के प्रधानमंत्री बने। वो तो कई सारे हो लिये, लेकिन 52-53 साल की ऊम्र और उनसे ऊपर वाले जरा सन् 64 की 27 मई को जवाहरलाल नेहरू के न रहने के बाद के क्षण याद करें। क्या उस वक्त ऐसा नहीं लग रहा था कि सारा देश अनाथ हो गया है। नेहरू के बिना भारत की कल्पना भी किसी ने की थी क्या। हर उम्र का भारतीय

उस दिन को अभागा मान बिलख-बिलख कर रो रहा था और यही सोच रहा था कि अब क्या होगा। हर तरफ 1948 की तीस जनवरी की शाम जैसा मंजर नजर आ रहा था। लेकिन 1948 की तीस जनवरी की शाम नेहरू हमारे साथ थे। गांधी के बाद नेहरू..बस। उसके बाद शून्य। गांधी और नेहरू के बाद इसी शून्य को भरने वाले व्यक्ति का नाम लालबहादुर शास्त्री था।

उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद शुरू के महीने कैसे रहे होंगे यह तो याद नहीं, लेकिन यह जरूर लगने लगा था कि नेहरू विहीन भारत समुद्र की लहरों को चीरते पोत की तरह डगमगाये बिना चल रहा है। 1965 का आधा हिस्सा पार होते ही पाकिस्तान से युद्ध छिड़ गया। फिर याद करें वो समय और उन दिनों का मिलान करें 1962 के सर्द दिनों से, जब भारत जूझ रहा था चीन से। तब नेहरू हमारे रहनुमा थे। लेकिन सब तरफ किस कदर अवसाद का माहौल छाया हुआ था। वह अवसाद और उसकी पीड़ा फूट रही थी कैफी आजमी और कवि प्रदीप और न जाने कितने कवियों और लेखकों की कलम से। ....ऐ मेरे वतन के लोगों....गा कर देश भर को लता मंगेशकर की आवाज रुला रही थी। नेहरू जी भर आयी आंखें पोंछ रहे थे। उस पीड़ा को सेल्यूलाइड पर उतार रहे थे चेतन आनंद। उस जैसी पीड़ा का अहसास एक पल को भी हुआ था 1965 में पाकिस्तान से युद्ध करते समय? आजादी के बाद पहली बार सन् 65 के अगस्त और उसके बाद के पांच महीने एक साथ कई धाराओं में भारत और भारतवासियों को जोश के ज्वार से भर रहे थे।

कुल मिला कर डेढ़ साल का शास्त्री जी का प्रधानमंत्री वाला समय मीठी याद बन कई सारी तहों के नीचे दबा पड़ा है। दर्द यही है कि युवा पीढ़ी नहीं जानती और न कभी जान पाएगी उन डेढ़ साल के बारे में। किसी परीक्षा में इस सवाल का जवाब शायद कोई दे दे कि जय जवान जय किसान का नारा किसने बुलंद किया था और हर सोमवार को सारा देश किसके कहने पर एक ही वक्त भोजन करता था ताकि हमें किसी के सामने झोली न फैलानी पड़े।

भुनेगा तो तब ना, जब दाना हो




राजीव मित्तल

देश की दो प्रमुख पार्टियों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में इन दिनों झनक-झनक पायल हो रही है। लेकिन न सुर है न ताल है न घंघरू हैं। मुद्दा है अगले आम चुनाव में प्रधानमंत्री कौन होगा। भारतीय
जनता पार्टी के ख्वाब ज्यादा उछाल मार रहे हैं, मानो प्रधानमंत्री पद सामने रखा हो। इसीलिये पार्टी में रार भी ज्यादा ही मची हुई है, जिसे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने और भी भड़का दिया है। पहले सुप्रीमकोर्ट से तथाकथित राहत और राहत मिलने की खुशी में शाही किस्म का उपवास उनके सपनों को चार चांद लगा रहा है। लेकिन यही चार चांद लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी की रातों को स्याह बनाने पर तुले हैं। मोदी के उपवास स्थल पर पार्टी नेताओं का जो जमावड़ा मनभावन नजर आ रहा था, कुछ ही दिन बाद दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मोदी की गैरमौजूदगी ढोल बजा रही थी कि भारतीय जनता पाटी में प्रधानमंत्री पद को लेकर ताकधिन्नाधिन शुरू हो गयी है। जो हाथ उपवास स्थल पर मोदी के होठों पर जूस के गिलास नवाज रहे थे, वो उन पर मुट्ठियां तानने में लगे हुए हैं।

खेल की शुरुआत हमेशा की तरह बैठे ठाले चुनाव नजदीक जान आडवाणी जी की रथयात्रा के ऐलान से हुई। उनकी रथयात्रा हमेशा कुछ ऐसी करतबी होती है कि और दलों में गायत्री मंत्र का जाप गूंजता है, तो उनकी पार्टी के नेताओं का अमाशय कमजोर होने लगता है। वैसे इस बार की रथयात्रा एक तरह से नख और दन्त विहीन है। बना भले ही लिया हो, लेकिन भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने से कुछ हासिल होना नहीं उन्हें, क्योंकि कई महीनों से अन्ना हजारे की अनामिका पर उछल रहा है वो। फार्मूला -1 रेस जैसा चार्म भी नजर नहीं आ रहा किसी को उनकी रथयात्रा में। न खुद पार्टी में न पार्टीजनों में न जनता में कोई उत्साह। अगले आम चुनाव में पार्टी क्या हासिल करेगी, इसके बारे में अभी तो सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि चमत्कार शब्द न आशंका से जुड़ा है न संभावना से।

सत्तारूढ़ गठबंधन की आगुआई कर रही कांग्रेस का हाल खुद उसको भी पता नहीं। 2009 के चुनाव में खासी सफलता हासिल करने के बाद उसको प्रधानमंत्री तो पिछली पफॉर्मेंस के आधार पर बैठे-बिठाए मिल गये थे, इस बार कुर्सी उनको काट रही है या उन्हें कटवाया जा रहा है या वो खुद कुर्सी से बेजार हैं, यह समझ से बाहर है। सरकार चलाने के लिये मनमोहन सिंह कौन सा जरूरी पुर्जा हैं यह बात कोई मैकेनिक या इंजानियर भी नहीं बता पाएगा। पार्टी की तरफ से मुंह खोलने वालों की बातों से जाहिर हो रहा है कि ढाई साल बाद वाले चुनाव में युवराज को सत्ता सौंप दी जाएगी। पहले दिग्विजय सिंह बोले...अब दादा भी बोल रहे हैं। दिग्विजय का काम कई सालों से बोलने का ही रह गया है, तो बात आई-गई टाइप लगी, लेकिन प्रणव मुखर्जी के बोलने में ठोसपन और अवसाद दोनों थे। सन् 84 में राजीव गांधी और अब राहुल गांधी यानि उनकी हालत आडवाणी ही जैसी। सरकार के कामकाज को कैसी भी संभावना से जोड़ा जाए, तो धूल उड़ती दिखायी पड़ेगी।

अब एक नजर पूरे राजनीतिक हालात पर डाल लें। 2009 में दोबारा सत्ता में आए अतीव उत्साही कांग्रेसी गठबंधन में जैसे हर कोई अपनी कब्र खोदने में लगा हुआ है। बेताल की तरह विक्रम के कंधों पर लदा हर घोटाला यही पूछे जा रहा कि अब और क्या करना है जल्दी बता, नहीं तो तेरा सिर काट दूंगा। इस वजह से हर कोई अपना सिर अपने हाथ में लिये है..तू कौन मैं खामखां वाला हाल।
भाजपा का फीलगुड सिरके की तरह महक रहा है। उसके पुरोधा आरएसएस ने अपनी छवि से कोई समझौता नहीं किया है। लॉटरी के नम्बर मटके से निकालने का काम उसी का है। जिस दिन जिसका नम्बर आ जाए..कुछ समय की जय-जयकार..कुछ समय बाद फिर महक मार रहे सिरके वाले जार में। तीसरे मोर्चे के अगुआ वामपंथी सब कुछ गंवा कर आईसीयू में ही पड़े थे, अब बाहर बरामदे में डाल दिये गये हैं। उस मरीज जैसा हाल, जिसके घरवालों के पास नसिंगहोम होम का बिल जमा करने को पैसे न हों। बाकी दल अपने मोहल्ले में ही जागरण करवा कर पड़ौसियों की नींद हराम कर रहे हैं।

देश का यह राजनैतिक परिदृष्य देश की आजादी के बाद पहली बार देखने में आ रहा है कि किसी पार्टी के पास करने को कुछ नहीं है। इसीलिये रोटी-बेटी-खेती-किसानी-स्वास्थ्य-शिक्षा-लोकपाल-भ्रष्टाचार-सदाचार -मिल-मजदूर-सावन-भादों -बाढ़-अनावृष्टि-चुनाव-वोट-उम्मीदवारी...न जाने कितने मुद्दों को नन्ही सी जान के हवाले कर दिया गया है। और मतदाता इस कदर बेजार है कि कहीं राष्ट्रीय सरकार का मुंह न देखना पड़ जाए, जिसमें हर पार्टी का करछुल कढ़ाई में घूमता है । यानि एक ऐसी सरकार जो सोमवार का व्रत रख सावन तो किसी तरह काट ले, पर भादों की एक बौछार सब कुछ बहा ले जाए। इसी तरह क्वार की खुशियां कार्तिक को गमगीन बनाएं।

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

पेड़ से टपका सर्वे

राजीव मित्तल

अन्ना हजारे अगले महीने से देश भर को जगाने निकल रहे हैं। वो ट्रेन से ये काम करेंगे । आडवाणी जी भी अपनी सर्वप्रिय रथयात्रा का ऐलान कर ही चुके हैं, जिसका मुद्दा है अगले चुनाव में जीत और पिछले चुनाव में पार्टी की दुर्गति......पर उनके दुःख को दूना कर गया नरेन्द्र मोदी का उपवास....उनका बरसों-बरसों पुराना दिल ही जानता है जब वो अनशन तोड़ने को मोदी के मुहं के पास शरबत का गिलास थामे खड़े थे ...... इधर.. मनमोहन सिंह का मुंह दांत का डॉक्टर भी नहीं खुलवा पा रहा ....सोनिया गाँधी और राहुल खामोश हैं.....वामपंथी अपनी पिछली जेब से मार्क्स की तस्वीर निकाल कर निहार रहे हैं....और बाकी पार्टियों का काम भोर के वक्त रंभाने और बाकी समय जुगाली करने भर रह गया है। कुल मिला कर देश की तस्वीर तालाब के किनारे बैठे किसी मछली पकड़ने वाले की सी बनी हुई है।

ऐसे में पेड़ की दो डालों के बीच टिके बर्बरीक वल्द घटोत्कच वल्द भीमसेन को कुछ करने की सूझी। वक्त का पता नहीं....कुछ अंधेरा है कुछ उजाला है...शाम भी हो सकती है..... भोर भी ...क्योंकि इन्हीं दोनों समय सामने के बदबू मारते तालाब के किनारे कतार में लोटा बगल में रख कर प्राकृतिक क्रिया, सामाजिक धर्म और राष्ट्रीय कर्तव्य निपटाए जाते हैं।
यह कलाकारी मेरे दोस्त विनय अम्बर की है, जो मेरे लिखे पर
इतनी सटीक बैठ रही है
कि अब मैं उनको लगातार
परेशान करता रहूँगा....


बर्बरीक ने नजर डाली तो तो पेड़ की शाखें लदी हुई थीं। 25 गौरेया, 28 तोते, 5 कौवे, आठ गिरगिटान, 13 गिलहरी, दो गिद्ध, चार उल्लू, दो कठफोड़वा, सात बंदर और मकड़ियों समेत कीड़े-मकोड़ों की कई प्रजातियां वहां मौजूद थीं। सब आपस में बात कर रहे हैं कि आडवाणी जी को फिर फीलगुड जैसा कुछ हो रहा है क्या .....बर्बरीक उर्फ बॉब ने गुर्रा कर उनकी चिल्लपों शांत करवाई।

आज मैं एक मसले पर आप लोगों की राय जानना चाहता हूं। हमारे देश में चैन की बंसी भी बज बज रही है और तुरही भी , ऐसे में आपको क्या फील हो रहा है.....गौरेयाओं.....पहले आप बात बताएं..आप लोगों से छेड़छाड़ तो नहीं की जाती....अश्लील फिकरे तो नहीं कसे जाते.....जब नर कहीं चला जाता है तो घोंसले में डर तो नहीं लगता....थोड़े में बताएं....गौरया घबरा कर एक-दूसरे की तरफ देखने लगीं...फिर कनखियों से कौवों को देखा और नजरें झुका लीं....

बॉब ने फिर कहा..घबराएं नहीं...खुल कर अपनी बात कहें .....हिम्मत बटोर कर एक ने कहा...हमारे घोंसले के सामने बैठ अमरमणि त्रिपाठी की तरह दांत निकालते हैं मुए ..तुरंत कौवों ने कुदक्कड़ी मारी....और तुम जो हमें देख मलाइका की तरह ठुमकती हो....एक कौवा भन्ना कर बोला.....

त्रिपाठी जी का नाम आते ही बर्बरीक ने तुरंत मामले को मोड़ दिया ....हमारे बीच मौजूद गिरगिटान कुछ बोलें। एक ने अपने को चटपट हरे से लाल किया-हम किन लफ्जों में अपना दुखड़ा सुनाएं? हम इन नेताओं की रंग बदलने की रफ्तार देख अपना रंग बदलना भूल चुके हैं। रंग बदलना ही हमारी पहचान थी...हमारी विरासत थी...जो आज परायी हो गयी है॥हम समझ नहीं पा रहे कि हम कितने और कौन कौन से रंग बदलें। वो कुछ और बोलता, बर्बरीक ने घुड़क दिया.....

इस बार बर्बरीक तोतों को मौका दिया...आप कुछ बताइये...हम तो जी बरबाद हो गये। हमको अपनी जिस तोताश्मी पर नाज था, उसको भी वो हजम कर गये। हमारे पास अपना कहने को अब बचा ही क्या है। हमें तो कोई ज़हर दे दे.......

गिद्धों...अब आप बताओ.....हमारी पहचान इसलिये ही तो है न कि हम जीव-जन्तुओ की सड़ी-गली लाशें खा कर महामारियों से इनसान का बचाव करते हैं। इसके लिये हमारे पंजों और इस मुड़ी हुई चोंच को दाद दी जाती है। लेकिन इन दोनों को अब चिरकुटों ने पेटेंट करा लिया है। अरे...हम तो मरे हुओं को नोचते थे...ये कमबख्त तो जिन्दों को बगैर नोचे भकोस लेते हैं...अब हम जामुन खा कर गुजारा कर रहे हैं....यह कहते कहते उनकी आंखों में आंसू आ गये।

माहौल की नजाकत को देख बर्बरीक ने उल्लुओं को आवाज मारी.....आप भी कुछ कहें....सर जी, हमारा दर्द तो इन सबसे बड़ा है...हम उस शायर को याद करते हैं, जिसने हम पर यह शेर लिख कर हम पर करम फरमाया था.....पूरे पेड़ ने आवाज निकाली...इर्शाआआआआआआआद ...एक उल्लू ने दूसरे को कोहनी मारी...तू गा के सुना.....
बरबाद-ए-गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू........ गाते गाते वो सिसकियां भरने लगा। एक बुजुर्गवार उल्लू बोले....हमारी यह जेनरेशन फ्रस्ट्रेशन में जी रही है सर जी ...क्या बोलें साहब....सन 47 के बाद ऐसे दिन देखने को नसीब होंगे, सपने में भी नहीं सोचा था.....हमारी पौराणिक मनहूसियत पर तो जैसे डाका पड़ गया है। उसका जगह जगह फूहड़ प्रदर्शन किया जा रहा है। अब हमारा ये हाल है कि
कहां जा के मौत को ढूंढिये
कहां जान अपनी गंवाइये

एकाएक बंदरों ने तालियां बजाते हुए नाचना शुरू कर दिया। बर्बरीक बौखला कर पूछा ---ये क्या कर रहे हो नदीदों ....हे हे ही ही.....किसी के घर से उठायी चुनरी पहन कर फुदक रही बंदरिया बोली... कुछ नहीं सर जी, ये सब इसलिये दुखी हैं कि नेता बिरादरी इनकी नकल कर रही है, लेकिन हम उनकी नकल कर मस्तिया रहे हैं। एक बंदर ने सिर पे साफा बांधा और उस बंदरिया के गले में बाहें डाल लचकना शुरू कर दिया...बाकी बंदर शुरू हो गये.....जीतेगा भाई जीतेगा हमारा कड़ियल जीतेगा।

अंत में...... आप इन सबको किसी पेड़ पर न तलाशें.......ये सब अब संग्रहालयों में पाए जाते हैं......हो सकता है वहां भी कुछ पिंजरे खाली मिलें और उसके बाहर तख्ती पर लिखा हो...हमें खेद है कि इस प्रजाति को हम इनकी खालों में भुस भर कर भी बचा नहीं पाए.....जहां तक बर्बरीक का सवाल है...सुना है उनको श्याम खांटू के नाम से मंदिरों में निन्यानवे साल की लीज़ पर जगह आवंटित है....धन्यवाद!

शनिवार, 17 सितंबर 2011

आउट ऑफ कंट्रोल के मज़े



राजीव मित्तल
मोहम्मद अजहरुद्दीन के बेटे अयाजुद्दीन की मौत एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि हम रफ्तार के मज़ों में इतने मशगूल क्यों हैं । रफ्तार की तासीर को समझे बिना हमारे देश के युवा ही नहीं, हमारे नियोजक, बाजार के कर्ताधर्ता और यहां तक कि हमारी सरकार भी रफ्तार के अनियंत्रित खेल में खुल कर अपनी भागीदारी निबाह रही है। उभरता क्रिकेटर अयाजुद्दीन जिस मोटरसाइकिल को चला रहा था, उसको स्टार्ट करते समय ही यह ध्यान रखने की जरूरत होती है कि सौ मीटर दूर तक सड़क बिल्कुल खाली हो, क्योंकि वो मोटरसाइकिल दस सैकेंड के अंदर ही सौ किलोमीटर की रफ्तार पकड़ लेती है। और उसकी अधिकतम स्पीड 250 किलोमीटर प्रति घंटे की है। अयाजुद्दीन के कॉलेज के प्रिंसपिल का कहना था कि उसे कई बार चेतावनी दी जा चुकी थी। लेकिन उसकी नासमझी ने उसे मौत के आगोश में ढकेल दिया।
अब आइये इस महत्वपूर्ण सवाल पर कि क्या हमारे देश की सड़कें या ट्रैफिक इस लायक हैं कि उन सड़कों पर और भेड़िया धसान ट्रैफिक की मौजूदगी में हजार सीसी की मोटरसाइकिल दौड़ायी जाए। इस कदर रफ्तार वाले वाहनों को चलाने के लिये विदेशों में कई नियम कानून हैं। उनके लिये ट्रैक अलग होते हैं। आम सड़कों पर इनको चलाने की सख्त मनाही है। लेकिन हमारे देश में अगर नहीं है तो वह है कोई भी और कैसा भी नियम कानून। ऊपर से इस अराजक माहौल को हवा दे रहा है इस देश का विकसित देशों से होड़ लेता बेहद अनियंत्रित बाजार, जिसने ऐसे वाहनों से देश की सड़कों को पाट दिया है। देश के युवाओं को ललचाने के लिये विज्ञापनों पर अरबों रुपया फूंका जा रहा है। महेन्द्र सिंह धोनी, जॉन अब्राहम, अक्षय कुमार जैसे न जाने कितने आकर्षक और बिकाऊ चेहरों को खोज-खोज कर रफ्तार को आउट ऑफ कन्ट्रोल करने की तो एक तरह से मुहिम ही चलायी जा रही है। विज्ञापन का बाजार आज इतना आकर्षक और जेब भराऊ हो गया है कि क्रिकेट खिलाड़ी, फिल्म अभिनेता -अभिनेत्रियाँ और पेज थ्री के चेहरे तो करोड़ों पीट ही रहे हैं, देश का हर चैनल और अखबार इन विज्ञापनों को हासिल करने के लिये कतार में झोली फैलाए खड़ा है।
दुनिया भर में युवा शक्ति का सिरमौर बन हमारा देश इतरा तो खूब रहा है लेकिन उसे यह नहीं सूझ रहा कि इस ताकत का देश के सर्वांगीण विकास के लिये इस्तेमाल किया कैसे जाए। इसीलिये हम जैसे मानसून की बारिश का पानी का इस्तेमाल करने के बजाए उसे गंदे नाले नालियों में बह जाने दे रहे हैं, उसी अंदाज में हम युवा शक्ति को जाया कर रहे हैं। हम विकास के नाम पर, ग्लोबल बनने के नाम पर एक ऐसे बाजार में तब्दील हो गये हैं, जहां महेन्द्र सिंह धोनी हमारा आदर्श है, और जहां सुजुकि 1000 पर लेटी मॉडल हमारा सपना है। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि धोनी क्रिकेट के मैदान पर है और उस मॉडल को अपने ऊपर लिटाए वो मोटरसाइकिल समुद्र के किनारे खड़ी है, जो बहुत सुरक्षित जगह हैं, और करोड़ों रुपये पाने वाली जगह हैं, लेकिन अयाजुद्दीन जैसे युवाओं के सामने खतरे ही खतरे हैं।
और उन मां-बापों को क्या कहा जाए, जो अपनी औलादों पर ऐसे खतरों की बारिश सी कर रहे हैं, क्योंकि पैसे के अम्बार ने उनके सोचने-समझने की ताकत कुंठित कर दी है। उनके नौनिहाल रफ्तार का मजा बढ़ाने को सुरापान करते हैं और अपनी विदेशी गाड़ियों से रात को फुटपाथ पर सोते लोगों को कुचल मारते हैं या अपनी जान गंवा देते हैं। ऐसी घटनाएं इस देश अब इतनी आम हो गयी हैं कि कोई ध्यान भी नहीं देता। मां-बाप को इसलिये कोई फिक्र नहीं क्योंकि कानून भी उनकी जेब में है।