बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

टपका आम की ढेरी के साथ वो सावन

राजीव मित्तल
होश संभालने के बाद करीब-करीब 50 आषाढ़ और श्रावण आमों के संग गुजरे। लड़कपन में बैशाख और जेठ की गर्म हवाओं में पेड़ पर लगे टिकोरे मुंह में पानी ला देते थे और उससे पहले चैत में पेड़ों पर छा गयी मंजरी दिल में गुदगुदी पैदा करती थी। अब न तो देसी आम के पेड़ों के झुंड हैं और न देखने-दिखाने का महोत्सवी माहौल। इस बीच बिहार के मुजफ्फरपुर में गुजरे करीब पांच सालों ने आम की कई रसीली वंशावलियों के दर्शन कराए। मालदह, बीजु, जर्दा, शुकुल, सीपिया और कृष्णभोग ने भुला दिया लखनऊआ सफेदा, कलमी और लंगड़े को। दशहरी का नाम लेने की हल्की सी अनिच्छा क्योंकि वो कभी जीभ को भाया ही नहीं। मुजफ्फरपुर की उन गर्मियों की शुरुआत में मकान बदला था। नये घर में जिमी से मुलाकात हुई। शुरू-शुरू का अपरिचयपन थोड़ा लम्बा खिंचा। लेकिन यह पता लगते ही कि पामेरियन वंश के श्वान को आम, खीरा और भीगे चने बहुत पंसद हैं, दोस्ती का रास्ता खुल गया। पहल खीरे और भीगे चने से हुई। धीरे-धीरे हम दोनों को एक-दूसरे का संग-साथ भाने लगा। कुछ दिन बाद बाजार में ठेलों पर आम दिखने लगे। लेकिन उन बम्बईया आमों को खरीदने की कोई ललक नहीं उठी। ब्रह्मपुरा के बाजार में रोजाना तड़के लगने वाली छोटी सी हाट में एक दिन टपका आम की ढेरियां दिखीं तो मन बल्लियों उछलने लगा। फिर तो अगले दो महीने तक जिमी, मैं और टपका या बीजु। ऑफिस से लौटते हुए मंडी से कई किलो टपका खरीद कर जैसे ही मकान के गेट पर स्कूटर रोकता, खुशी से झूम उठता जिमी। गेट खोल कर अंदर स्कूटर खड़ा करने तक उसका लाड़ धमाचौकड़ी की सीमा पार कर चुका होता। उसके बाद वो ताला लगे दरवाजे पर उछल-उछल कर पैर मारता कि दोस्त अब रहा नहीं जा रहा, जल्दी खोलो। दरवाजा खुलते ही वह दौड़ कर आंगन और हर कमरे के चक्कर लगाता। इसके चलते कुछ क्षण अपने सुस्ताने के होते। उसके बाद आम का थैला पानी भरी बाल्टी में उलटता और जिमी साहब आम चूसने को बेकरार। बेकरारी इस हद तक कि न जाने कितनी बार मुंह चाट लेता। तब होती आम खाने की प्रतियोगिता। जैसे ही उसे छिलका उतरी गूदे से लबरेज गुठली मिलती, पूरे आंगन में धमाल शुरू हो जाता। गुठली गेंद की तरह आगे फिसलती रहती और पीछे-पीछे उसे मुंह में भरने के लिये जिमी साहब की लपक -झपक। जब तक वह छह-सात गुठलियों का रसास्वादन न कर लेता उसका जी नहीं भरता था। तक तक आंगन आम के रस से लिथड़ चुका होता था। उसे और अपने को तुरंत ही साफ इसलिये करना पड़ता था कि गेट पर पहुंच चुकी काम वाली के आगे कहीं मजाक न बन जाऊं। जिमी का साथ आम के एक ही मौसम का रहा। उसके बाद की तीन गर्मियां टपका के साथ अकेले ही गुजरीं, अब देखना है कि मेरठ में क्या गुल खिलता है।

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