मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

सीवान फिर तुम्हारे हवाले, मेरे आका

राजीव मित्तल
पहले जब कोई धोबी शक्ति के केन्द्र में लटका जहांगीरी घंटा टनटनाता था तो मुगल साम्राज्ञी नूरजहां तक की जानपर बन आती थी, और अब वहां से किसी फोन की घंटी टनटनाती है तो सीवान के उस जनप्रतिनिधि को फिर शासक का ताज पहना दिया जाता है, जो जनता के लिए खौफ, लोकतंμा के लिए मजाक और राजनीति के लिए माफिया बना हुआ है। इस काम को आराम से करने के लिये पहले डीएम सीके अनिल को और फिर एसपी रत्न संजय को शतरंज के खानों में फर्जी बना पैदल से पिटवा कर बाहर फिंकवा दिया जाता है। और यह सब उस लोकतंμा की रक्षा के लिए हो रहा है, जिसके नाम पर जिंदगी भर माल काटने के लिए गमले में फिर से रोप दिये गए शहाबुद्दीन का फलना-फूलना बेहद जरूरी है।
सवाल यह नहीं कि अब तक सीवान छोड़ भागे-भागे फिर रहे शहाबुद्दीन अब अपनी जमीन पर कौन सा गुल खिलाएंगे, सवाल यह है कि सीके अनिल और रत्न संजय अब आगे लम्बी पड़ी अपनी नौकरी में ऐसी कोई ‘हिमाकत’ करने की जुर्रत कर पाएंगे, जो उन्होंने शहाबुद्दीन की मांद में रहते कर डाली? चुनाव आयोग की पहल पर विधानसभा चुनाव के समय इन दोनों की तैनाती से ही लोग अपने-अपने घरों से वोट डालने निकले थे और राष्ट्रपति शासन लगने के बाद तो इन दोनों अफसरों ने सीवान के महाबली सांसद का जीना हराम कर दिया था, लेकिन आखिर में हुआ क्या! दोनों निपट गए। एक तो बिहार ही छोेड़ गया, तो दूसरे को पिछवाड़े की राह दिखा दी गयी और सीवान फिर जंगल राज के हवाले, जहां हिरन और इंसान का गोश्त एक समान। तो आका, भूल जाओ उन पाजी डीएम और एसपी को, लाल कार्पेट पर ठुमकते हुए आओ और ऐसी दहाड़ मारो कि चिड़िया चहचहाना, गाय रंभाना और मुर्गा बांग देना भूल जाए, बाकी बचा इंसान नाम का जीव, तो अब वह उस डीएम और उस एसपी को कोसने को मजबूर हो जाएगा, जिन्होंने तुम्हारी आंखों में आंखों में डालकर जीने की जुर्रत उससे करायी।
इस देश के लोकतंμा के इतिहास को पलटें तो इसके अनोखे कारनामे कहीं से अनोखे नहीं लगते, हर बार लगता है कि यह तो होना ही था और अब तक ऐसा नहीं हो रहा था जो जरूर कोई साजिश थी। इस लोकतंμा के राजनीतिक समीकरण उतने ही दुरूह हैं जितना मुर्गी और अंडे में पहले कौन का मसला। अब देखिये न इतनी जबरदस्त उखाड़-पछाड़ हो गयी और हर कोई आंखे मटकाता कह रहा है-अरे ऐसा! हमें तो मालूम ही नहीं था। और यह सब इसलिए हुआ, हो रहा है और आगे भी होगा क्योंकि पानी में ठुस्स हो गयी माचिस की डिब्बी जैसी विधानसभा को फिर से जिलाना है और इस बार उसे किसी हालत में ठुस्स नहीं होने देना है-चाहे रात का एक बजा हो या दिन के बारह-इस बार खेल पूरे हिसाब से खेलना है। तो आइये हम सब मिल कर इस ‘शोक’ गीत को गाएं-रामचन्द्र कह गए सिया से इक दिन ऐसा आएगा...........।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें