सोमवार, 20 दिसंबर 2010

देखो वो जा रही है गुलाबो स्पेशल

राजीव मित्तल
देश विभाजन पर खुशवंत सिंह का लिखा उपन्यास ‘ट्रेन टु पाकिस्तान’ अब भी हजारों लाखों लोगों के जेहन में समाया हुआ है। उसी तरह चौपड़ा साहब की ‘बर्निंग ट्रेन’ ने भी थोड़ा-बहुत कमाल दिखाया। अब ‘ट्रेन दु डेलही विद सब्जी’ में जबरदस्त सम्भावनाएं दिख रही हैं, जिसे हालांकि किसी की नजर लग गयी है। लेकिन अब ट्रेन विद सब्जी से जुड़ा एक ऐसा नायाब विचार उपजा है, जो देश का दिलो-दिमाग ही नहीं उसकी केंचुली तक बदल देने की कुव्वत रखता है। रक्ष संस्कृति के वापाति और इल्वल के मस्तिष्क की देन यह विचार ‘धक धक करने लगा’ से भी ज्यादा उत्तेजक है। इन विचारों को एक खत में पिरोते हुए दोनों भाइयों ने उसकी फ्लॉपी माकूल ठिकाने पर पहुंच दी है, जिस पर काफी गंभीर विचार चल रहा है। यह खत ‘टु हूम इट मे कंसर्न’ के नाम है।
कुछ अंशों पर ध्यान दें----ट्रेन की रेफ्रीजरेटर बोगी में दिल्ली तक सब्जी पहुंचाना फूड रेवोल्यूशन से कम नहीं। अगर यह कामयाब हुआ तो एक दिन वो आयेगा जब ह्म काकेशस के गुलाबी कद्दू, डेनमार्क की गोल नीली तोरई, ग्रीनलैंड की भूरी मटर और फ्रांस की बैंगनी गोभी का स्वाद मुसहर की झोंपड़ी में भी ले सकेंगे। लेकिन इस क्रंातिकारी अभियान को अगले ही दिन कुछ असामाजिक तत्वों ने जिस तरह धक्का पहुंचाया, उससे हम स्तब्ध हैं। अगर इस बारे में हमारे ये नेक सुझाव जस के तस मान लिये जायें, तो हमारा-आपका-हम सबका ‘ऑपरेशन हरी-ताजी स्पेशल’ हर हाल में कामयाब होगा। अन्यथा आपका पूरा महकमा आलू-मिर्च के पीछे उसी तरह दौड़ता रहेगा, जैसे हम बचपन में मुर्गी पकड़ने की कोशिश में लगे रहते थे, पर जो कभी हाथ नहीं आयी।
सुझाव इस प्रकार हैं-- 1-सब्जी लदाई वाली ट्रेनों में आम सवारियों को घुसने तो क्या झांकने की भी सख्त मनाही, 2- सब्जियां किसानों से न खरीद कर ट्रेन के डिब्बों के अंदर और उनकी छतों पर उगायी जाएं। नीचे के हिस्से में मिट्टी भर कर आलू, जिमीकंद, घंुइया तो ऊपर मटर, भिंडी, लौकी और कुम्भड़े की बेलें। इस काम को करने के इच्छुक लोगों को जापान भेज कर प्रशिक्षण दिलाया जाए, जहां तरबूज प्याले में और मिर्चा चम्मच में उगायी जाती है। ट्रेन पर उग रही सब्जी देश के कोने-कोने में अपना स्वाद पहुंचाए न कि सिर्फ दिल्ली को, 3-ऐसी ट्रेनों में उपजाऊ मिट्टी के साथ रासायनिक खाद की जगह उत्तर बिहार के पानी का इस्तेमाल हो। ट्रेन के डिब्बों में नांद बना कर सिंघाड़ा और मखाना भी उगाया जा सकता है। लेकिन पानी उत्तर बिहार का ही हो क्योंकि वहां के पानी में आर्सेनिक और आयरन भरपूर होता है, 4-ट्रेनों की रफ्तार इतनी धीमी हो कि मूली का बीज इस स्टेशन पर पड़े तो उस स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते वो मूली बन कोफ्ता बनने की उत्सुकता में खिड़की से झांक रहा हो। इसके लिये देश भर में एक बार फिर नैरो गेज का जाल बिछाया जाए और इंजन में अखबार की रद्दी का इस्तेमाल हो। हालांकि इन दिनों भी ट्रेनों की रफ्तार वही है पर, तब बड़ी लाइन पर लोड काफी बढ़ जाएगा, 5-सब्जियों को अदल बदल कर उगाया जाए। जैसे ‘अप’ में लौकी तोे ‘डाउन’ में बेंगन। इस अभियान को पानी के जहाज और हवाई जहाज के जरिये विदेशों तक फैलाया जा सकता है। कैसे! इस बारे में बाकी सुझाव देशी सफलता के दर्शन करने के बाद। इसके बाद फल और फूलों पर ध्यान देने की जरूरत है।
तब ऐसी ट्ेनों को गुलाबो स्पेशल या खरबूजा स्पेशल नाम देना बेहतर होगा। आखिर में हम एक बात और कहना चाहेंगे जो इस क्रांति को सफल बनाने के लिये बेहद जरूरी है वो यह कि इस देश में ट्रेनों की बड़ी दुर्गत है। जहां चाहे वहां रोक इस पर जूता-लात चलने लगते हैं। इस बारे में बालि की पत्नी और प्रख्यात नारीवादी तारा का कहना है कि ट्रेन या रेलगाड़ी स्μाीलिंग से जुड़े शब्द हैं, इसलिये उनका यह हाल है। इंजन को कोई छूता भी नहीं। ट्रेनों को पुरुषोचित अत्याचार से बचाने के लिये जरूरी है कि जितनी जल्दी हो, संसद में एक ऐसा बिल पास कराया जाए, जिसके अंतर्गत सम्पूर्ण स्μाी ंिलग कवर होता हो। साथ ही ट्रेनों पर हाथ-पांव छोड़ने वालों के खिलाफ कड़े कानून बनाये जाएं क्योंकि तभी शाक-भाजी या फल-फूल की भी इज्जत-आबरू बच पाएगी। जय ंिहद।

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