सोमवार, 6 दिसंबर 2010

एक कलंक का कलंकित जाप

राजीव मित्तल
गरुड ने जैसे ही पूछा कि गोधरा गुजरात में है या बिहार में, काक भुशुण्डि ने खेंच कर उस पर अपनी खड़ाऊं दे मारी और दहाड़े-चोप्प, अगर गोधरा का गो भी तेरे मुंह से निकला तो जुबान बाहर कर दूंगा। गोधरा न हो गया जैसे सत्ताई अमरत्व का कोई मंμा हाथ लग गया है। धर्मनिरपेक्षता उनकी थाती हो सकती है बपौती नहीं। इस देश में केवल वही धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं, करोड़ों भारतीयों के लिये भी गुजरात के दंगे किसी कलंक से कम नहीं, पर खाते-पीते, हगते-मूतते उन के दिमाग पर यह शब्द किसी मंμा की तरह सवार नहीं है। जब कहने या करने को कुछ न हो तो किसी दल के सिर पर मंदिर-मंदिर मंडराता है, तो किसी पर विदेशी-विदेशी, किसी पर देशी-देशी तो किसी पर गोधरा-गोेधरा। शरीर 21 वीं सदी में पहुंच गया है पर दिमाग उसी 19वीं सदी में धरा है तो ऐसे असंतुलन में क्या खाक कोई कुछ कर पाएगा। गोधरा के अलावा जमाने में और भी गम हैं प्यारे। निगाह तो उठाओ, गोधरा से तो बाहर निकलो। सारा बिहार लुंज-पुंज हुआ पड़ा है, चाहे मध्य हो या पूर्व, दक्षिण हो या पश्चिम, चम्पारण हो या मिथिलांचल, कहीं भी स्फूर्ति नहीं है, खुशहाली नहीं है। इस बदहाली में सब को बस एक चीज याद है और वो है जाति।
आपने पिछड़ों को जुबान दी, उन्हें उनका हक दिया, वोट डालने की हिम्मत दी, लेकिन साथ ही उन्हें जाति का थोथा अभिमान थमा कर उन्हें आत्मसम्मान से वंचित भी तो कर दिया। उनकी रिहायश कैसी है, उनकी सुरक्षा के क्या हाल हैं, उनकी रोजी-रोटी कैसी चल रही है, उनके बच्चों की शिक्षा कैसी चल रही है, उनके घर की औरत की इज्जत-आबरू की क्या कीमत है-इस बारे में कौन जवाब देगा? इस राज्य का हर महकमा टाट के पैबंद लगाये चल रहा है-क्यों? जैसे अरबपति जिंदा रहने के लिये सोने के कौर नहीं खाता वैसे ही धर्मनिरपेक्षता या राम मंदिर के जाप से दुनिया का कामकाज नहीं चलता। उस गुजराती के माथे पर एक कलंक है तो सिर पर सेहरा बांधने को भी बहुत कुछ है। एक ही दिन में पांच खरब पंद्रह अरब का निवेश केवल माला जपने से नहीं हो सकता। चाहे माला तुलसी की हो या गोधरा की। उसके लिये पहले अपना घर ठीक करना पड़ता है तब हम दूसरे को आमंμिात कर पाने की हिम्मत जुटा पाते हैं। आपके या आपके पूर्ववती कितने सत्ताधिारियों ने उस गोधरा के कलंकी की सी प्रशासनिक क्षमता दिखायी? भूकम्प की मार से बदहाल गुजरात को संभलने में कितने साल लगे? आपको तो हाय झारखंड से ही फुरसत नहीं। दस साल रहा तो था आपके पास, कौन से तारे तोड़ लिये? आप तो अपने ही यहां के उद्योगपतियों, अपने ही राज्य के देश-दुनिया में डंका बजा रहे आला दिमागों को घरबार छोड़ कर भागने से न तो पहले रोक पाए, न अब रोक पा रहे हैं तो उस कलंक का जापा क्यों? काक जी, बस कीजिये, पांच साल और मांग रहे हैं वह। अरे मूरख वो भी मैं ही दूंगा क्या, उसके लिये बिहार की जनता जाने।

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